श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

कहानी सबसे सुहानी

दुर्लभ संयम

तप कल्याणक के अवसर पर एक मनोरम दृश्य सभा में उपस्थित किया गया। वह यह कि जब तीर्थंकर ऋषभ कुमार को वैराग्य प्राप्त हुआ । तब लौकांतिक देवों ने आकर उनके वैराग्य की स्तुति की। ऋषभ कुमार वन गमन हेतु जब पालंकी पर आरूढ़ हुये तो देवगण पालकी उठाने को उद्यत हो गये। और मनुष्य भी पालकी उठाने के लिये तत्पर हो गये । तब सवाल उठा कि पालकी पहले कौन उठाये। यह निर्णय नाभिराय ने दिया कि जो भगवान के साथ में संयम धारण करने की योग्यता रखता है। वह पालकी पहले उठायेगा। तब इन्द्र ने कहा-हे मानवों। हमारी स्वर्ग की विभूति आप ले लो और उसके बदले में मनुष्य पर्याय हमको दे दो। लेकिन पहले मुझे पालकी उठाने का अवसर दे दो। इस प्रसंग को देखकर प्रत्येक प्राणी को संयम के प्रति बहुमान पैदा हो गया कि यह संयम बहुत दुर्लभ है। जैसा कि दशलक्षण पूजा में कहा है । “सुरग नरक पशुगति में नाहीं”। अर्थात् यह संयम, मनुष्य पर्याय को छोड़कर अन्य पर्याय में प्राप्त नहीं होता ।

संयम की महिमा

राजा की आज्ञा से यमपाल नामक चण्डाल प्रतिदिन अनेक जीवों को शूली पर चढ़ाया करता था, एक दिन यमपाल चण्डाल को दिगम्बर मुनि का दर्शन हो गया, उसने अपने जीवन में मुनि का दर्शन पहली बार किया था । इसलिये अपने आपको धन्य मानता हुआ मुनिराज के निकट बैठ गया। मुनिराज ने ध्यान खोलकर चण्डाल की ओर दृष्टिपात किया और सोचा कि यह निकट भव्य है। ऐसा विचार कर धर्मोपदेश दिया उसके फलस्वरूप यमपाल चण्डाल ने नियम लिया कि मैं अष्टमी, चतुर्दशी के दिन जीव हिंसा नहीं करूँगा । चुतर्दशी का दिन आया, राजा के लड़के ने कुछ अपराध किया तो राजा ने उसे मृत्यु दण्ड की घोषणा कर दी यमपाल चण्डाल को बुलाया गया । यमपाल ने मना किया कि मैं चतुर्दशी के दिन जीव हिंसा नहीं करूँगा। यह सूचना राजा को दी गयी राजा ने सुनकर आदेश दिया कि राजकुमार और यमपाल को नदी में फेंक दो, सिपाहियों ने ऐसा ही किया किन्तु यमपाल ने प्रतिज्ञा को भंग नहीं किया। नदी में डालते ही यमपाल की देवों ने रक्षा की और पानी में ही सिंहासन की रचना कर दी। राजकुमार को नदी में डालते ही जलजन्तु निगल गये । राजा ने यह आश्चर्यकारी घटना को सुना तो यमपाल के पास जाकर क्षमा माँगी। यह था संयम का प्रभाव ।

स्पर्शनेन्द्रिय के वशीभूत, नागदत्ता

नासिक्य नगर में सागरदत्त सेठ की सेठानी नागदत्ता थी। उसके दो सन्तानें थी – श्री कुमार और श्रीषेणा। सेठानी अपनी गायें चराने वाले नन्द नाम के युवा ग्वाले पर आसक्त थी। उसने प्रथम तो सेठ को मरवा डाला, पुनः पुत्र को मारने में उद्यत हुई। पुत्र पहले से अपनी माता के कुकृत्य से अत्यन्त दुःखी था। उसने माता को बहुत कुछ समझाया भी, किन्तु उस पापिनी ने उल्टे उसे मारने का निश्चय और भी दृढ़ कर लिया। किसी दिन वह अपने प्रेमी नन्द को कह रही थी कि तुम श्री कुमार को मार डालो। इस रहस्य को पुत्री श्रीषेणा ने सुन लिया। और अपने भाई को सावधान किया। गाय चराने को एक दिन माता ने ग्वाले को न भेजकर पुत्र को भेजा, पुत्र समझ गया कि आज धोखा है। वह जंगल में गया। वहाँ उसने अपने वस्त्र एक ठूंठ को पहना दिये और स्वयं छिप गया। पीछे से ग्वाला आया। ठूंठ को कुमार समझकर उस पर भाले का प्रहार किया। तभी कुमार ने निकल कर उसी भाले से उस ग्वाले को मौत के घाट उतार दिया। पुत्र के घर आने पर नागदत्ता ने पूछा -कि-नन्द कहाँ है? पुत्र ने उत्तर दिया कि इस बात को तो यह भाला जानता है। नागदत्ता समझ गई कि कुमार ने नन्द को मार डाला है। क्रोध में आकर 88

कहानी सबसे सुहानी

वह पापिनी मूसल से श्री कुमार का मस्तक फोडने के लिये उद्यत हुई तभी पुत्री श्रीषेणा ने आकर उसी मूसल से माता नागदत्ता को मार दिया। इस प्रकार वह पापिनी पर पुरूष आसक्त नागदत्ता स्पर्शनन्दिय के विषय में आसक्त होकर सारे कुटुम्ब का नाश कर नरकगामिनी हो गई ।

रसनेन्द्रिय के वशीभूत, भीम राजा

काम्पिल्य नगर का राजा भीम था वह दुर्बुद्धि मांसभक्षी हो गया था। नन्दीश्वर पर्व में उसे मांस का भोजन नहीं मिला तो उसने रसोइये से कहा कि कहीं से मांस लाओ । रसोइया को इधर-उधर खोजने पर भी जब मांस नहीं प्राप्त हो सका तो वह श्मशान से एक मरे बालक को ले आया और उसने उसका मांस पका कर राजा को खिला दिया। राजा तब से नरमांस का लोलुपी हो गया । रसोइया उनके लिए गली-गली में घूमकर छोटे-छोटे बच्चों को कुछ मिठाई आदि का लालच देकर इकट्ठा करता और अंतिम बालक को पकड़ कर मार देता था और मांस राजा को खिलाता था। नगर में चंद दिनों बाद इस कुकृत्य का भंडाफोड़ हुआ और नगरवासियों ने राजा तथा रसोइये को देश से निकाल दिया । दोनों पापी जंगल में घूमने लगे। राजा ने भूख से पीड़ित हो रसोइये को मारकर खा लिया। अन्त में, वह नरभक्षक पापी, वसुदेव द्वारा मारा गया और अपने पाप का फल भोगने के लिए नरक में पहुँचा ।

घ्राणेन्द्रिय के वशीभूत, गंधमित्र

अयोध्या के नरेश विजय सेन के दो पुत्र थे, जयसेन और गंधमित्र । एक दिन राजा ने बड़े पुत्र जयसेन को राजपद एवं छोटे पुत्र को युवराज का पद दिया और स्वयं मुनि दीक्षा लेकर वन में चले गये । गंधमित्र विविध प्रकार के फलों को संघने में ही आसक्त रहता था । एक दिन रानियों के साथ वह सरयू नदी में जलक्रीड़ा कर रहा था। जयसेन ने मौका पाकर नदी के प्रवाह की ओर भयंकर विष जिसमें छिडका गया था, ऐसे फूल प्रवाहित कर दिए। गंधमित्र ने उन फूलों को सूंघा जिससे वह प्राणरहित हो गया और घ्राणेन्द्रिय के विषय सुगंध की आसक्ति के कारण नरकगति में उत्पन्न हुआ ।

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