वरक के बारे में जानकारी पाने के लिए मैं अहमदाबाद के तंग बाज़ार में जा पहुँचा। माणिक चौक, दोशी वाडा-नी-पोळ होता हुआ मैं टकसाल पहुँचा। दूर से ही ‘टुक-टुक’ की आवाज से यह सहज ही अनुमान लगाया जा सका कि यहाँ कहीं वरक बनाने के लिए चाँदी की कुटाई / पिटाई हो रही है। इस तरह की आवाज कई बार आगरे में सुन रखी थी। आगरा के किनारी बाज़ार में जब कभी मैं प्याऊ वाली गली से गुजरता तभी वरक बनते / कुटते देखता तो था, लेकिन कभी इस सम्बन्ध में अधिक जानकारी पाने का प्रयत्न नहीं किया था। जिस छोटे से कारखाने / दुकान पर में पहुँचा, वहाँ लगभग पन्द्रह-सोलह लोग काम कर रहे थे। अधिकतर श्रमिक चाँदी की कुटाई करने में व्यस्त थे। मैं वहाँ जा कर खड़ा हो गया और उन्हें देखने लगा।
मुझ अजनबी को वहाँ खड़ा देख बाकी सब भी मुझे देखने लगे। क्षण-भर को अपना काम बन्द करके एक ने मुझसे पूछा- “कहिये, क्या काम है?” मैंने कहा- मुझे वरक के बारे में जानकारी लेनी है। तभी वह कहने लगा काफी पहले देरासर वाले भी आये थे, उन्होंने वरक़ की पाबन्दी कर दी थी मन्दिरों में। मैंने कहा कि मैं देरासर की ओर से तो नहीं आया हूँ; लेकिन इसके बारे में कुछ जानना अवश्य चाहता हूँ। इस पर उसने कहा- किसी भी बात को जानना तो अच्छी बात है और इसके बाद उसने बताना शुरू कर दिया।देखिये, यह एक स्पेशल कागज़ की चौपड़ी (पुस्तिका) जैसी होती है। इसमें 260 कागज होते हैं। यह दो अलग-अलग साइजों में आती है। छोटी साइज की एक चौपड़ी की कीमत सोलह सौ रुपये तथा बड़े साइज की चौपडी की कीमत दो हज़ार रुपये है। हर कागज़ के बीच में चाँदी की छोटी-सी पट्टी (स्ट्रिप) रखी जाती है। इसे इस प्रकार रखा जाता है कि हरेक एक के ऊपर एक रहे। चाँदी की पतली पट्टियों मशीन से बनायी जाती हैं। वहाँ से बनी बनाई (रिबन जैसी) पट्टियाँ यहाँ आती हैं।
उनके छोटे-छोटे टुकड़ों से बरक्क़ बनाया जाता है। वरक़ को हाथों से कूट कर ही बनाया जा सकता है। दिल्ली में एक ने वरक़ बनाने की मशीन भी लगाई थी, लाखों रुपयों की; लेकिन फेल हो गयी, क्योंकि उससे बना वरक़ बिल्कुल पतरे जैसा (मोटा) बनता था, जिसका कोई उपयोग नहीं।
आठ ग्राम चाँदी के 135 वरक़ बनते हैं। इस वरक का इस्तेमाल तम्बाकू में मिलाने के काम आता है। तम्बाकू में चाँदी मिलाकर खाने से ठीक रहता है, नहीं तो वह गरमी करती है।
बीच में टोकते हुए मैंने कहा इसका मिठाई, दवाई में भी प्रयोग करते हैं और देरासरों में भी। फिर मैंने पूछा कि आप इसे बेचते कहाँ हैं? तो बताया कि वे इसे अहमदाबाद में ही बेच देते हैं। फिर मैंने उनसे उस कागज को देखना चाहा, जिसमें चाँदी को रखकर कूटते हैं। उन्होंने मुझे वह चौपड़ी ही उठा कर दे दी। मैं बीच-बीच में उनसे सवाल-जवाब भी करता रहा और चौपड़ी भी देखता रहा। स्पेशल कागज़ की उस चौपड़ी के ऊपर और नीचे कव्हर के माफिक चमड़ा लगा था। उस चमड़े की कव्हर-युक्त चौपड़ी में चाँदी के टुकड़े रख देने के बाद पूरी चौपड़ी को चमड़े के एक ‘स्पेशल बैग’ में रख दिया जाता है। बैग के मुँह को बन्द करके लोहे के हथौड़े से बैग की कुटाई की जाती है। बीच-बीच में बैग को घुमाते रहते हैं। इतना सब जान लेने के बाद मैंने असली बातें जानना चाहीं। मैंने क्रमशः कई प्रश्न किये – यह स्पेशल पेपर किससे बनता है, कहाँ से आता है? चौपड़ी पर जो कव्हर है वह तथा बैग किस चीज का बना है- चमड़े का या फिर कुछ अन्य वस्तु है? क्या इस चमड़े की जगह रेगज़ीन इस्तेमाल नहीं की जा सकती? स्पेशल पेपर कहाँ से मँगाते हैं?
इन सब प्रश्नों का उसने बड़ी तसल्ली से क्रमशः उत्तर दिया। उसने बताया- “यह तो पता नहीं स्पेशल पेपर किस चीज से बनता है; लेकिन होता बहुत महँगा है। दो हज़ार रुपयों में 260 कागज़ ही आते हैं। इसके ऊपर जो कव्हर है, वह चमड़े का होता है- किसी जानवर के चमड़े का ही। बैग भी चमड़े का होता है। चमड़े की जगह रेगज़ीन प्रयोग में नहीं हो सकता है। यह स्पेशल कागज़, बैग (चमड़े वाला स्पेशल बैग) यहाँ तक कि हथौड़ा भी हम सब दिल्ली से मैगाते हैं। वैसे यह कानपुर, वाराणसी तथा जयपुर में भी मिलता है। अहमदाबाद में यह कुछ नहीं बनता है। कुछ सालों से कभी-कभी हथौड़ा यहाँ बनवा लेते हैं।
मैंने उससे दिल्ली का वह पता जानना चाहा, जहाँ से वे यह सब सामान मंगाते हैं; लेकिन उसने कहा कि वहाँ का पता उसे नहीं मालुम है। ‘स्पेशल कागज़’ किससे बनता है, वह यह भी बताने में असमर्थ रहा, लेकिन मेरे माँगने पर बतौर ‘सेम्पल’ उसने मुझे एक पुराना कागज़ दे दिया। बैग का भी मैंने निरीक्षण किया। मुझे तो उस बैग का मटीरियल चमड़े जैसा ही लगा। फिर मैंने कहा कि इस चमड़े की वजह से ही देरासर वालों ने वरक के इस्तेमाल पर पाबन्दी लगा दी होगी। तभी अन्दर से एक दूसरे व्यक्ति ने कहा- “इतने भर चमड़े से क्या हो गया? लोग देरासर जाते समय भी तो चमड़े की चप्पलें पहन जाते हैं। तब इतने से चमड़े के इस्तेमाल से इतना परहेज क्यों?” पहले व्यक्ति ने उसे और अधिक कुछ कहने से रोक दिया। लेकिन मुझे लगा कि उसका प्रश्न अनुचित नहीं है। फिर मैंने पूछा- क्या देरासर वालों ने वरक़ का इस्तेमाल बन्द कर रखा है? तो उसने उत्तर दिया इस्तेमाल चालू है। वह तो तभी पाबन्दी की बात चली थी; लेकिन इस्तेमाल रुका नहीं था।इतनी सब जानकारी ले लेने के बाद मैंने आभार व्यक्त किया तथा उस स्पेशल पेपर को साथ ले कर घर वापस आ गया। घर आकर उस पेपर के कुछ भौतिक परीक्षण किये। परिणाम निम्न प्रकार हैं-
यह स्पेशल पेपर हल्दी जैसे पीले रंग का है। इससे बहुत हल्की-सी गंध भी आती है। मोटाई लगभग सामान्य पेपर जैसी ही है; लेकिन यह सामान्य पेपर से कहीं अधिक मजबूत है। यह लुगदी से नहीं बना है। थोड़ा कड़क है। पानी से भिगोने पर यह बहुत मुलायम हो जाता है। इस पेपर पर छोटे-छोटे सेल्स (कोशिकाएँ) जैसे गोले बने हुए हैं, वे साँप की केंचुल के ऊपर जैसे लगते हैं।
यह हल्का पारदर्शी है। तेल एवं पानी की पारगम्यता शून्य है। कागज़ के एक तरफ पानी या तेल डालने से दूसरी तरफ की सतह गीली नहीं होती है। इसे जलाने पर यह प्लास्टिक (मोमिया) की तरह सिकुड़ता है।
हालाँकि यहाँ पूछताछ से यह तो पता नहीं चला कि यह स्पेशल पेपर किस चीज का बना है, लेकिन उपर्युक्त निरीक्षण / परीक्षण से यह स्पष्ट है कि यह लुगदी से बना पेपर नहीं है। आगरा से प्राप्त अधिकृत / विश्वस्त सूचना के आधार पर यह पेपर है ही नहीं, बल्कि भेड़ के चर्म से प्राप्त एक झिल्ली है। अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वरक्क़ बनाने में जो तथाकथित स्पेशल पेपर प्रयोग होता है वस्तुतः वह भेड़ की झिल्ली है। इस चौपड़ी के ऊपर तथा नीचे चमड़ा होता है तथा पूरी चौपड़ी को चमड़े के बैग में रख कर कूटा जाता है। इस सबके बावजूद भी वरक्र चाँदी का ही रहता है।
प्रश्न यह रहता है कि इसे प्रयोग में लाया जाना चाहिये या नहीं? इस सम्बन्ध में अभिमत यह है कि प्रथमशः वरक़ के प्रयोग की कोई विशेष आवश्यकता न तो हमारे खाने में ही है और न ही देवस्थानों में। चूँकि इसके निर्माण में चमड़े का प्रयोग होता है, अतः देवस्थानों में इसका प्रयोग नहीं किया जाना चाहिये। खाने में भी इसका प्रयोग आसानी से रोका जा सकता है।
लेकिन साथ ही एक अन्य बात यह है कि ऐसा प्रतीत नहीं होता है कि इस कार्य में इस्तेमाल होने वाले चमड़े मात्र को प्राप्त करने के लिए किसी जानवर को मारा जाता हो। मेरे ख्याल से जानवर तो माँस पाने के उद्देश्य से ही मारा जाता होगा। यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि यह मात्र मेरा अनुमान ही है। वस्तुस्थिति तो वहीं से पता चल सकती है, जहाँ से झिल्ली तथा बैग बनते हैं। चूँकि चमड़े का प्रयोग चप्पल, जूतों में तो होता ही है; जिसे बहुत से शाकाहारी भी पहनते हैं, तबला तथा ढोलक बनाने में भी चमड़ा प्रयोग में आता है। ये ढोलक आदि वाद्य यंत्र पूजा एवं भजन के समय उन मंदिरों में भी प्रयोग में आते हैं, जहाँ वरक का इस्तेमाल नहीं होता है, अतः देवस्थानों में चमड़ा वाद्य यंत्रों के जरिये अधिक जल्दी पहुँचता है। उसे बन्द करने के लिए भी सशक्त अभियान छेड़ा जाना चाहिये।
डॉ. अनिल कुमार जैन
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