हायकू के नाम से जानी जाने वाली जापानी पारंपरिक कविता में तीन पंक्तियाँ होती हैं। इसमें आमतौर पर 17 शब्दांश होते हैं, जिन्हें 5-7-5 लय में रखा जाता है। प्रत्येक पंक्ति में एक निश्चित संख्या में शब्दांश होते हैं, जिसमें पहली पंक्ति में पाँच, दूसरी में सात और तीसरी में एक बार फिर पाँच शब्दांश होते हैं।
हायकू में कम शब्दों में गहराई के साथ शिक्षाप्रद प्रेरणास्पद विचार होते हैं।
आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज ने हायकू सन् 1996 में गिरनारजी यात्रा के दौरान लिखना प्रारंभ किया, उनमें से कुछ हायकू प्रस्तुत हैं :
1️⃣ मेरी दो आंखें
मेरी ओर हजार
सतर्क होऊं।
2️⃣ तेरी दो आंखें
तेरी ओर हजार
सतर्क होजा।
3️⃣ विष का पान
समता सहित भी
अमृत बने।
4️⃣ तटस्थ व्यक्ति
डूबता न हो, तो
पार भी ना हो।
5️⃣ मलाई कहां
अशांत दूध में सो
प्रशांत बनो।
6️⃣ फूलों की रक्षा
कांटों से हो, शील की
सादगी से हो।
7️⃣ झूठ भी यदि
सफेद हो तो सत्य
कटु क्यों ना हो।
8️⃣ दो जीभ ना हो
जीवन में सत्य ही
सब कुछ है।
9️⃣ अनेक यानि
बहुत नहीं किंतु
एक नहीं है।
1️⃣0️⃣ बचो बचाओ
पाप से पापी से ना
पुण्य कमाओ।
संकलनकर्ता: उर्मिला जैन, मुक्तानंद नगर जयपुर