श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

चातुर्मास के चार चरण

चातुर्मास हर वर्ष आता है। चातुर्मास का समय साधुओं के कारण ही माना जाता है। क्योंकि बारिश के चार महीनों में साधु सर्वत्र विचरण न करके, एक स्थान पर ही रहते हैं। पर श्रावको का ऐसा नियम नहीं होता। वह साधुओं का चातुर्मास करवा के, धर्म का विशेष लाभ उठाता है। और कहने में यही आता है कि आजकल चातुर्मास में व्यस्त हैं। अपने जीवन में हम लोगों ने ना जाने कितने चातुर्मास करा लिये पर चातुर्मास को व्यवस्थित तरह से नियम पूर्वक नहीं बिताया होगा। जो कार्यक्रम चल रहे हैं उसमें भाग ले लिया, बस इसके अलावा स्वयं से विचार नहीं किया होगा कि वास्तव में चातुर्मास में मुझे कितनी साधना करनी है। चातुर्मास 105 दिन का होता है उसमें से निश्चित करें कि प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ माह में क्या-क्या करना है। चातुर्मास स्थापना आसाढ सुदी चतुदर्शी से प्रारंभ होती है और तीसरे दिन से सावन शुरु हो जाता है।

बारिश का मौसम है पेट की पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है, व्यापार भी कमजोर हो जाता है। अतः तन और धन दोनों तरह से त्याग प्रारंभ हो जाना चाहिये। शरीर से खाने का विकल्प छोड़ो बाहर से कमाने का विकल्प छोड़ो अतः

सावन में भक्ति

भादों में त्याग

क्वार (आश्विन) में संयम

कार्तिक में वैराग्य

इन चार महीनों में इनकी विशेष साधना करनी है बाकी जो धर्म हम कर रहे हैं उन्हे तो करना ही है।

सावन में भक्ति

आत्मा और परमात्मा के प्रति होने वाली श्रद्धा और आस्था को प्रगट करने का माध्यम भक्ति है। जिन परमात्मा के प्रति श्रद्धा है, उनका गुणानुवाद करने का मन स्वयमेव होता है। उनके गीत गुनगुनाने का मन करता है। उनकी प्रशंसा और तारीफ करने का मन करता है। उनकी पूजा और अर्चना करने का भाव होता है। इन सब कार्यों के माध्यम से भक्ति की भावनायें बाहर में प्रगट होती हैं। मन में भक्ति है पर वचन से बोलने पर पता चलता है। और काया के बार-बार झुकने पर पता चलता है। भक्ति के भाव अंदर में कितने भरे हुये हैं। और जब तक मन वचन काया तीनों के द्वारा भक्ति ना की जाये भक्ति में पूर्णता नहीं होती।

जब भक्त के अंदर भक्ति उमड़ती है तो उसका रोम-रोम बोलता है। कृष्ण की भक्ति जब मीरा ने की तो सारे संसार को पता चल गया। राम भक्त हनुमान ने राम भक्ति में संपूर्ण जीवन समार्पित कर दिया। सीता ने भक्ति से णमोकार मंत्र पढ़ा तो अग्नि का नीर हो गया। मेढक की भक्ति ने उसे स्वर्ग पहुंचा दिया। अर्थात भगवान हमारे रोम-रोम में बस जायें, सावन में ऐसी भक्ति करें। भगवान के सामने बैठकर भजन पढ़े विनती पढ़े, जिनवाणी में भक्तामर आदि प्रभु भक्ति के बहुत सारे पाठ है वे विशेषतया पूजा करें। आप देखेंगे कि भक्ति करने के बाद आत्मा कितनी प्रसन्न होती है। भक्ति करने से पाप कर्म का नाश, पुण्य की प्राप्ति सम्यग्दर्शन की प्राति होती है। सावन में स्वयं को पावन करने में भगवान की भक्ति आवश्यक है।

भादों का त्याग

भादों का महीना त्याग के नाम से ही विख्यात है। जितना त्याग भादों के महीने में गृहस्थ करते हैं उतना पूरे वर्ष में नहीं हो पाता। लेकिन वो त्याग केवल दशलक्षण पर्व के दस दिनों में किया जाता है। मेरी चर्चा भादो के पूरे महीने से है। त्याग करना ज्यादा कुछ नहीं बस अपने बोझ कम करना है। संसार में रहते हुये वस्त्र, भोजन, मकान, दुकान, परिवार, सोना-चांदी, दास दासी आदि का इतना बोझ इकट्ठा कर लिया है कि जीवन में आत्मा परमात्मा याद ही नहीं आते। दिल में बाहर की ही चिन्ता सदा रहती है। यदि त्याग जीवन में अपनाया जाये, तो आप पायेंगे कि जीवन में हल्का पन आ गया। अत्यधिक बोझा हमारी इच्छाओं के कारण इकट्ठा हुआ है। इच्छाओं को सीमित करें तो बाह्य वस्तु स्वयंमेव कम हो जायेंगी और तब सच्चा त्याग प्रतिफलित होगा। जितनी वस्तुओ का त्याग होगा, उतनी वस्तुओं से होने वाला कर्म बंध कम हो जायेगा और संवर निर्जरा भी प्रारंभ हो जाती है। त्याग इंसान को भगवान बना देता है। आप भगवन बनने लायक त्याग नहीं कर पा रहे तो कम से कम देवता बनने लायक त्याग अवश्य करें।

त्याग का शुभारंभ उन वस्तुओं से करों कि जिससे आपके जीवन में बाधा न आये जैसे-एक महीना क्रोध नहीं करेंगे, एक महीना दो समय भोजन करेंगे पर चाय आदि तरल पदार्थ की छूट रखके। एक महीना श्रृंगार आदि का भी त्याग कर सकते हैं। नये वस्त्र आभूषण खरीदने का त्याग कर सकते हैं निंदा बुराई करने का त्याग कर सकते हैं। यदि आपने इतने कार्य करके भादो का महीना पूर्ण कर लिया तो घर में रहकर साधु स्वभाव वाले बन गये। घर में रहकर आप धर्मात्मा बन गये। धर्मात्मा दिखना और धर्मात्मा होना दोनों में अंतर है। बाह्य का त्याग अंतरंग की भावनाओं को दिखाता है। अतः भादों का महीना त्याग में बितायें।

आश्विन (क्वार) में संयम

घोड़े में लगाम, हाथी में अंकुश गाड़ी में ब्रेक जो काम करते हैं वही काम, जीवन में संयम करता है। जब तक घोड़े की लगाम हाथ में है, हाथी अंकुश में है, और गाड़ी का ब्रेक सही है, तीनों मंजिल पर पहुंचा देते हैं, ऐसे ही इंसान के जीवन में संयम है तो इंसान भी संसार की ठोकर खाने से बचेगा। और अगला जन्म भी सुधर जायेगा। संयम 12 प्रकार का है पांच इंद्रिय एक मन पर संयम, पांच स्थावर और त्रस काय की रक्षा करना। आंख, नाक, कान, जिव्हा और शरीर को अपने वश में करना जो ये कहे वह नहीं करना जो आत्मा कहे वह करना है। इंद्रिया और मन दिन भर संसार के भोगों की मांग करता है। इंसान उसकी पूर्ति के लिये सारी जिन्दगी लगा देता है, पर फिर भी ये पूरी नहीं हो पाती।

इच्छाओं ने इस जीवन को बस एक भिखारी कर डाला।
भिखारी बना दिया इन इंद्रियों ने। हम जितेन्द्रिय के भक्त हैं, अर्थात् भगवान ने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त की, हम उनके भक्त हैं, हमारे जीवन में कुछ संयम आना चाहिये। हर रोज स्वादिष्ट भोजन न करें रूप को देखने के लिये आंखो को वश में करें, नाक को वश में करने को खुशबू वाली वस्तुओं का प्रयोग न करें, एक महीने के लिये फिल्मी संगीत सुनने का त्याग करें, ब्रह्मचर्य आदि का पालन करें इससे मन वश में होगा, प्राणियों की रक्षा करें।

मन में सोचने में संयम रखें, वाणी से बोलने में संयम रखें, और शरीर पर संयम रखें। मन पर संयम होगा तो चिन्ता नही होती, वचन पर संयम होगा तो लड़ाई झगड़ा नहीं होगे, और काय पर होगा तो बीमारी नहीं होगी अतः जीवन को अच्छा और सच्चा बनाने के लिये संयम अति आवश्यक है।

कार्तिक में वैराग्य

जीवन में त्याग आ गया संयम आ गया भक्ति भी कर ली। ये सब राग को ऊपर से छोड़ना हुआ। अभी हमने पेड़ की शाखा फल फूल और पत्तियों को पानी दिया है। जड़ अभी शेष है। अभी उसे छोड़ा है जो आंखो से दिख रहा है, अब उस को छोड़ना है जो आंखों से नहीं दिख रहा है। भक्ति में दृढ़ता त्याग में गहराई और संयम में मजबूती तब आयेगी जब अंदर में वैराग्य होगा। बिना वैराग्य के भक्ति, त्याग और संयम कभी नही छूट सकते हैं। इसीलिए धर्म की जड़ वैराग्य को पानी देना आवश्यक है।

वैराग्य किसे कहते हैं? वस्तु को अनित्य, क्षणभंगुर, अशुचि और अशरण रूप देखना वैराग्य है। जिन-जिन वस्तुओं में व्यक्ति को राग है उनकी सच्चाई देखने से राग कम होता है और वैराग्य आता है आंखो पर हरा चश्मा लगाओ सब वस्तुये हरी नजर आती हैं चश्मा उतार कर देखो तो असली रंग रूप दिखता है। ऐसे ही हम मोह का चश्मा लगाकर संसार को देखते हैं तो सब कुछ अच्छा और अपना लगता है। यदि मोह हटा कर अपने ही शरीर को देखा जाये तो यह गंदगी का पिटारा है। जब अपना शरीर ही गंदगी से भरा है और कभी भी धोखा दे सकता है तो अन्य पर भरोसा कैसे किया जा सकता है। इस तरह संसार की वस्तु का अध्ययन हर पहलू से किया जाये तो निश्चित ही, राग कम होगा, वैराग्य से हमारे आत्म धर्म में दृढ़ता आयेगी। आत्मा को पाने के लिये बाहर मोह कम करना जरूरी है।

वैराग्य को बढ़ाने वाली बारह भावना माता के समान काम करती हैं। जिस तरह मां शरीर को पुष्ट करती है उसी तरह बारह भावनाओ का चिंतन हमारी आत्मा के भावों को पुष्ट करता है। कार्तिक के महीने में इस पर विशेष ध्यान देकर वैराग्य को बढ़ाना चाहिये।

आध्यात्मिक पर्व को आत्मा से मनाये आडंबर से नहीं

रत्नों में जिस तरह हीरा है, मनुष्यों में चक्रवर्ती है, तिर्यंचो में शेर है, आकाश में सूरज है उसी तरह पर्वों में दशलक्षण महापर्व है। समय, घड़ी, घंटा को हम खराब नहीं कह सकते। किन्तु महापर्व के आते ही आत्मा मन भाव सब परिवर्तित हो जाता है। अपने आप त्याग आचरण में परिलक्षित होने लगता है। पर्व तो अनेको हैं पर जो भावनायें दशलक्षण महापर्व पर होती हैं, वर्ष के अन्य पर्वों में नहीं होती इसीलिये इसे महापर्व कहा है।

पर्व कई प्रकार के होते है सामाजिक पर्व, राष्ट्रीय पर्व, अनादिनिधन पर्व, अध्यात्मिक पर्व, भक्ति पर्व सामाजिक पर्व जैसे होली रक्षाबंधन आदि सभी किसी घटना क्रम से जुड़े होते है उस घटना के पश्चात उस घटना से मिलने वाली शिक्षा को दोहराने के लिये यह पर्व आते हैं। भगवान महावीर मोक्ष गये उस दिन दीवाली पर्व, राष्ट्रीय पर्व जैसे 15 अगस्त, 26 जनवरी अथवा किसी विशेष नेता से जुड़ा हुआ दिन। स्वतंत्रता दिवस स्वतंत्र होने की खुशी में मनाया जाता है तथा 26 जनवरी गणतंत्र भारत का संविधान भारत में लागू हुआ था इस खुशी में मनाया जाता है।

अध्यात्मिक पर्व दशलक्षण पर्व के सिवाय अन्य पर्वों में लोग नये कपड़े पहनते हैं, मिठाइयां खाते हैं, रिश्तेदारी में मिलने जाते हैं। पर यह पर्व न खाने आता है, न कपड़े पहनने आता है, यह पर्व तो त्याग और संयम का जीवन सिखाने आता है। वर्ष भर में जितनी गल्ती, अपराध हुये हैं उनका प्रायश्चित प्रतिक्रमण और पश्चाताप कराने आता है। आत्मा में लगे पापों का नाश करने आता है, विचारों की शुद्धि से आत्मा को स्नान कराने आता है। आत्मा को परमात्मा बनाने आता है। अतः मन त्याग और संयम में लगे इस पर्व को इस तरह से मनायें।

बड़ा ही महत्व है

कार्य करने में सर्व का

शरीर में नर्व का

पर्वों में दशलक्षण महापर्व का

बड़ा ही महत्व है।

गणिनी आर्यिका
रत्न 105 श्री स्वस्ति भूषण माताजी

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