श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

इष्टोपदेश

इष्टोपदेश – आचार्य श्री पूज्यपाद देव रचित अध्यात्म प्रधान लघु रचना है, मात्र इक्यावन श्लोक में निबद्ध हैं, भाव प्रमेय अनंत है। आत्म साधकों के लिए प्रतिदिन पठनीय अनुकरणीय अध्यात्म प्रवेशिका एवं श्रेष्ठ मोक्षमार्ग दर्शिका इसी कृति का आचार्य विभवसागर जी महाराज ने 2019, मई माह में इन्दौर नगर में अध्यात्म वाचना का आधार ग्रन्थ बनाया था। इसी इष्टोपदेश प्रवचन टीका शास्त्र का डिजिटल पत्रिका में प्रतिमाह एक श्लोक का प्रकाशन प्रारम्भ कर रहे है ।

1.मंगलाचरण

यस्य स्वयं स्वभावाप्ति, रभावे कृत्स्न कर्मणः।
तस्मै संज्ञान रूपाय, नमोस्तु परमात्मने ।।

अन्वयार्थ – (यस्य) जिस भगवान् के (कृत्स्नकर्मणः) समस्त कर्मों का (अभावे) अभाव हो जाने पर (स्वयं) अपने आप (स्वभावाप्तिः) स्वभाव की प्राप्ति हो गयी है (तस्मै) उस (संज्ञानरूपाय) अनन्तज्ञान स्वरूप (परमात्मने) परमात्मा के लिए (नमः अस्तु) नमस्कार हो।

बोलो ! नमोस्तु परमात्मने, परमात्मा के लिए नमस्कार हो, नमः नमस्कार (अस्तु) हो किसके लिए, परमात्मने चतुर्थी विभक्ति का एक वचन, परमात्मने, (परमात्मा के लिए नमस्कार हो।)

जैसे – अपन लिखते हैं, “नमः वीतरागाय” अब सिद्ध हो गया, नमोस्तु परमात्मा के लिए क्यों? हम जैसा होना चाहते हैं वैसा जो हो चुके हैं उनके लिए नमस्कार! मैं परमात्मा होना चाहता हूँ! तुम परमात्मा हो चुके हो, इसलिए तुम्हें नमस्कार हो।

नमोस्तु परमात्मा, कैसे परमात्मा ? संज्ञान रूपाय- सम्यग्ज्ञान स्वरूप, केवलज्ञान स्वरूप, परमात्मा, ज्ञान शरीरी त्रिविध कर्म मल, वर्जित सिद्ध महन्ता। ते हैं, निकल अमल परमातम, भोगें शर्म अनंता। ज्ञान स्वरूपाय, ज्ञान ही जिनकी आत्मा है, शरीरी (आत्मा) शरीरी, जिसमें शरीर हो वह आत्मा, तो कैसा? ज्ञान स्वरूप, अंतिम पद क्या हैं?

कृत्स्न कर्मणः अभावे, त्रिविध कर्म मल वर्जित तीन प्रकार के कर्म होते हैं-

1. द्रव्य कर्म मल

2. भाव कर्म मल

3. नो कर्म मल

तीनों तरह के मल से रहित, कर्मों के अभाव हो जाने पर सप्तमी विभक्ति, अभाव हो जाने पर स्वभाव प्रकट हुआ है। स्वभाव पाया नहीं है, प्रकटाया है। दोनों में अंतर क्या होगा? पाया अथवा प्रकटाया? कोई व्यक्ति कहते पाया, कोई कहते प्रकटाया यहाँ पर क्या लिखा? प्रकटाया। भगवान् में सुख नहीं पाया नहीं प्रकटाया है।

आप सुख पाना चाहते हो? कभी नहीं मिलेगा। पाने वाले को नहीं मिलता। मिलेगा भी तो छूट जायेगा, सुनो इसमें लिखा है, आप्ति आप्ति का मतलब है, प्रकटाया।

प्रकटाया और पाया दोनों में क्या अन्तर है? ऊपर पानी की टंकी है, नीचे पानी का कुआँ है, टंकी में पानी आया दिनभर यूज आया, शाम को खाली क्यों हो गया? टंकी ने पाया है, और कुएँ ने प्रकटाया है। जो प्रकटाता है, उसका स्थाई रहता है, इन्द्रियों से सुख पाया जाता है। संसार का सुख पाया जाता है और आत्मा का सुख प्रकटाया जाता है। दोनों में अंतर आ गया, गर्मी लग रही, पंखा चालू कर दो, क्या हुआ, लाइट चली गयी, क्या हुआ? सब छूट गया। पाया तो छूटा, लेकिन प्रकटाया तो स्थिर हो गया। क्योंकि आत्मा का सुख, आत्मा ने प्रकटाया इसलिए आत्म सुख प्रकटाया जाता है। और इन्द्रिय सुख पाया जाता है।

भौजन परोसना, जरा सा नमक डाल देना। क्या हुआ? सुख पाया जा रहा है, और नमक डालने वाले ने ज्यादा नमक डाल दिया तो, क्या हो गया? ये पाया था न, सो चला गया? जो सुख पाया जाता है, यह छूट जाता है, जो प्रकटाया जाता है, वह स्थिर हो जाता है।

सिद्धों ने सुख प्रकटाया है, अरिहंतों ने सुख प्रकटाया है, हम और आपने सुख पाया है, पाया सुख स्थिर रहने वाला नहीं है।

अभी आप रसगुल्ला खायेंगे आप को मीठा लगेगा। लेकिन आज रसगुल्ला रसगुल्ला ही खाओ, आप कुछ देर में थक जाओगे। दो, चार, छः, आठ कितने खा पाओगे? थक जाओगे। सुख पाया था, छूट जायेगा। लेकिन जब आप स्वाध्याय करते हो, सामायिक करते हो, ध्यान करते हैं। तो सुख भीतर से प्रकट होता है, जो भीतर से सुख प्रकट होता है, वह सदा शाश्वत रहता है, स्थिर रहता है।

आज आप प्रवचन सुन रहे। आप को स्पर्शन इन्द्रिय का सुख मिल रहा क्या? रसना इन्द्रिय का सुख मिल रहा क्या? नहीं मिल रहा। घ्राण इन्द्रिय का सुख मिल रहा क्या? नहीं मिल रहा। चक्षु इन्द्रिय का सुख मिल रहा क्या? नहीं। कर्ण इन्द्रिय का सुख मिल रहा क्या? नहीं मिल रहा। क्योंकि हम से अच्छे गाने सुनाने वाले मुम्बई में बहुत हैं, और यदि आपको अच्छा लगता है, कर्ण इन्द्रिय का सुख है, तो मैं आप को और सुनाता हूँ।

यार ज्ञान, शक्ति कोटी, सूर्य रन्नू मीर दे, मत्तु यार दिव्य ध्वनि लोक हित व माडिदे।
मोरु लोक दल्ली यार, कीर्ति व्याप्त वागि दे, अंत देव, देव रल्ली, रन्नतले उवागि दे।।

अच्छा लगा। लेकिन समझ में आया क्या? तो कर्ण इन्द्रिय का सुख तो बना लेकिन आत्मा का सुख इससे प्रकट नहीं होगा। आत्मा का सुख तो, जब ज्ञान में आता तो प्रकट होता, जो ज्ञान में आया, भावश्रुत ज्ञान हुआ। सुना द्रव्यश्रुत। समझा भावश्रुत। हमने दिया, अचेतन। तुमने प्रकटाया सो चेतन। समझ लिया सो चेतन। सुना सो अचेतन । शब्द पुद्गल हैं। पुद्गल को सुना, अचेतन को सुना। समझा सो चेतन। सुना सो द्रव्यश्रुत ज्ञान, समझा सो भाव श्रुत ज्ञान। भाव श्रुत ज्ञान सुनने से नहीं मिलता !

भैया ! कितनी ही अच्छी गाय ले लेना, लेकिन घी नहीं देगी। दही नहीं देगी। गाय दूध ही देगी, दही नहीं देगी। उसी तरह से, चाहे वह तीर्थंकर हों, चाहे वह विभव सागर हों, आप को द्रव्यश्रुत ज्ञान ही देंगे, भाव श्रुत ज्ञान तो स्वयं बनाना पड़ेगा। श्रद्धान बनाओगे, समझ बढ़ाओगे, तो वही ज्ञान भावश्रुतज्ञान हो जाता है। वही दूध घी बन जाता है।

उसी तरह से द्रव्य श्रुतज्ञान, भावश्रुत ज्ञान बन जाता है। जब श्रद्धा के साथ हम अपना लेते हैं, तो भाव श्रुत ज्ञान हो जाता है। तो स्वभाव को पाया कि प्रकटाया? स्वभाव प्रकटाया जाता है।

“उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव भाव हैं,”

कौन से भाव हैं? स्व (आत्मा) ये आत्मा के भाव हैं। मेरी आत्मा के भाव हैं, तुम्हारीआत्मा के भाव है, यही लिखे हैं, जो लिखा है, वह भीतर में प्रकट होना चाहिए! इन्होंने क्या किया? स्वयं स्वभाव को प्रकट किया है, सो परमात्मा हो गये। और हम क्या कर रहे? विभाव को प्रकट कर रहे हैं। इन्होंने स्वभाव को प्रकट किया सो परमात्मा। विभाव को प्रकट करे सो बहिरात्मा। प्रकट दोनों कर रहे हैं, जब तक विभाव है, तो बहिरात्मा, स्वभाव प्रकटा तो परमात्मा। स्वभाव को प्रकटाने कि साधना करने वाला अंतरात्मा। विभाव को मिटाने का प्रयत्न, स्वभाव को प्रकटाने का जो प्रयत्न कर रहा वह अंतरात्मा। विभाव में लीन बहिरात्मा, स्वभाव में लीन परमात्मा और दोंनो के बीच विभाव को मिटाने का, स्वभाव को प्रकटाने का जो प्रयत्न कर रहा वह अंतरात्मा ! अपन कौन हैं?

भैया अपने अंदर एक लक्ष्य है, कि हमें विभाव को मिटाना है, और स्वभाव को प्रकटाना हैं। अपन क्या है? अंतरात्मा! आज आपके लिए इतना तत्त्वज्ञान उपलब्ध हुआ है, ये विषय बहुत मंगलकारी है, अकेले, मुम्बई नहीं पूरे विश्व का कल्याण कराने वाला है, तो धर्म का तीर्थ कौन चलायेगा हम चलायेंगे हम चलायेंगे।

हम वक्ता बनेंगे, श्रोता बनेंगे और आचरण कर्ता बनेंगे, अब अपने जीवन में, कभी ये प्रश्न नहीं आना चाहिए, कि हम सभा में नहीं जायेंगे तो क्या हो जायेगा? धर्म तीर्थ का लोप हो जायेगा।

महानुभाव !

आप धर्म तीर्थ का लोप करना चाहते हैं क्या? इतनी बड़ी धर्म हत्या स्वीकार नहीं करेंगे, कि धर्म तीर्थ का लोप हो जाये, इसी महामंगल भावना के साथ हम सभी मिलकर  के, धर्म तीर्थ को चलायेंगे, इसी शुभ संकल्प के साथ ! इष्टोपदेश का मंगलाचरण हुआ।

ओम् नमः

श्री राजेन्द्र कुमार जैन (संयोजक)
82, शक्ति नगर, गोपालपुरा बाई पास,
जयपुर – 302015

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