श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

जैन समाज की वर्तमान स्थिति : कुछ विचारणीय बिंदु (2)

(1) हिंसा से अनभिज्ञ संत

पिछले लगभग 50 सालों में जितना अधिक मूर्तियों, मंदिरों और तीर्थों का निर्माण हुआ है उतना संभवतः कभी नहीं हुआ। मुडासा निवासी जीवराज पापड़ीवाल एक अपवाद हैं जिन्होंने संवत् 1548 में एक लाख मूर्तियों की प्रतिष्ठा कराई थी तथा उन मूर्तियों को देश के अनेक स्थानों पर भिजवाया था। अब ये कार्य आवश्यकता के कारण कम और नाम कमाने के लिए अधिक होने लगे हैं। अधिकतर ये सभी कार्य संतों की प्रेरणा से ही होते हैं। उनका तर्क रहता है कि जैन धर्म इससे ही जिन्दा रहेगा। एक दूसरा तर्क यह भी है कि यदि किसी एक व्यक्ति को भी इन तीर्थों और मंदिरों के दर्शन करने से मोक्ष की प्राप्ति हो गई तो सारी हिंसा से कहीं लाख गुना अधिक पुण्य मिलेगा। हमारा कहना है कि जब किसी को मोक्ष मिलेगा तब मिलेगा, उससे पहले तो घोर हिंसा के भागी हो ही गये।

उनको यह तो मालुम है कि निर्माण कार्यों में हिंसा होती है, लेकिन वे इस बात से अनभिज्ञ बने रहते  हैं कि इन कार्यों में वास्तव में कितनी हिंसा हो रही है। यदि सौ वर्ग गज के क्षेत्र में एक मंदिर बनाया और उसके आधे हिस्से में बेसमेंट बनाया या फिर मंदिर का लेवल ऊपर उठाने के लिए मिट्टी डलवाई है तो उसमें कितने त्रस जीवों की हिंसा होगी, इसका एक अनुमान तो लगा ही सकते हैं। एक ग्राम मिट्टी में दस अरब से लेकर सौ अरब तक त्रस और स्थावर सूक्ष्मजीव पाये जाते हैं जिन्हें माइक्रोस्कोप से देखा जा सकता है। इसमें जीवों की लगभग चार हजार से चालीस हजार प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यदि 10 फुट x 10 फुट x 10 फुट मिट्टी हटानी पड़ी तो सौ अरब में सौ अरब का गुणा करने पर जो राशि आयेगी, उतने जीवों की हिंसा होगी। भवन निर्माण के लिए जो पत्थर प्रयोग में लाये जायेंगे उनमें स्थावर जीवों और कुछ त्रस जीवों की जो हिंसा होगी वह अलग। यदि भूमि पर एक पेड़ लगा है और उसे काटना पड़े तो हम हजारों सैनी पंचेन्द्रिय जीवों सहित करोड़ों स्थावर जीवों की हिंसा भी कर रहे हैं। पेड़ के काटने पर या खानों से पत्थर निकलने पर पर्यावरण में परिवर्तन कितना आएगा और कितने जीव नष्ट होंगे, इसका भी शोध होना चाहिए। पत्थरबालू, सीमेंट आदि के ट्रांसपोर्टेशन के कारण जो प्रदूषण होगा वह अलग।

हमारा निवेदन इतना ही है कि अनावश्यक निर्माण कार्यों या सिर्फ दूसरों से अधिक दिखने की होड़ के कारण निर्माण कार्यों से बचना चाहिए जिससे इन त्रस और स्थावर जीवों की हिंसा से बच सकें। कोई कह सकता है कि आप अपने घर निर्माण कराने में इतना सोचते हैं क्या? हमारा मानना है कि इसमें भी विवेक रखना चाहिए। जैसा कि श्री जिनेंद्र वर्णी जी ने कहा कि जितना हो सके उतना हम गृहस्थों को भी हिंसा का अल्पीकरण करना ही चाहिए। साधु महाव्रती होते हैं, उन्हें तो बिल्कुल ही बचना चाहिए।

पंचकल्याणकों में हाथी और घोड़ों का इस्तेमाल भी होता है। उन पशुओं को कितनी यातनायें दी जाती हैं, उसकी तरफ तो किसी का ध्यान भी नहीं जाता है। जयपुर के एक एडवोकेट इन पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ वर्षों से कार्य कर रहे हैं। समारोहों में सम्मिलित होने वाले इन हाथी और घोड़ों को न तो भरपेट खाना दिया जाता है और न ही बीमार होने पर उनका समुचित इलाज कराया जाता है। जयपुर में हाथिओं का एक पूरा गाँव ही है। आमेर में पर्यटकों के मनोरंजन के लिए उनका इस्तेमाल किया जाता है। कई बार रिपोर्ट सामने आई हैं कि इनमें से अधिकतर हाथी बीमार हैं। अभी हाल ही में यहाँ रोबोट हाथी को लाया गया है। दक्षिण के हिन्दू मंदिरों में भी रोबोट हाथियों का प्रयोग किया जाने लगा है। यह एक अच्छी शुरुआत है। क्या अहिंसक जैन समाज भी इस तरफ ध्यान देगा?

(2) पैसा बोलता है

लोग कहते हैं कि पैसा सब कुछ नहीं है, लेकिन फिर भी पैसा बहुत कुछ होता है। चाहें राजनीतिक़ क्षेत्र हो या फिर धार्मिक, वर्तमान में देखने में तो यही आ रहा है।

पैसे में सही को गलत और गलत को सही ठहराने की ताकत है। पैसा है तो मूर्ख, दुराचारी, अत्याचारी भी पुजते हैं, टीवी पर उनका नाम आता है, टीवी खरीदा जा सकता है, समाज और देश में उनको ही इज्जत मिलती है जिनके पास पैसा है। धार्मिक क्षेत्र में पैसे से श्रीजी का अभिषेक करने का पहले मौका मिलता है, बड़े-बड़े पोस्टरों में इज्जत के साथ नाम छपता है।

आज अनेक जैन टीवी चैनल हैं, प्रायः सभी पर प्रायोजित कार्यक्रम ही आते हैं। जो संत अधिक पैसे खर्च कर / करवा सकता है उसके प्रवचन आसानी से प्रसारित किये जाते हैं। यही हाल जैन पत्र-पत्रिकाओं का भी है। जो कोई उनको पंद्रह-बीस हजार दे दे, उसका विशेषांक निकाल देंगे। सम्पादकीय में उसके गुणगान करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे और ऐसा बतायेंगे कि भगवान् महावीर के बाद वे ही एक अकेले महानतम व्यक्ति हुए हैं जिनका विशेषांक निकाल रहे हैं। आज संपादकों में इतनी भी नैतिकता नहीं बची है कि जिनके आचरण की कुछ समय पहले तक आलोचना और निंदा करते थे, आज वे पैसे मिलने के कारण उनकी प्रसंशा करने में लगे हैं। उनकी सही को सही और गलत को गलत कहने की हिम्मत पैसे के आगे समाप्त हो जाती है। ‘धर्म मंगल’ की संपादिका प्रा. सौ. लीलावती जैन अपनी जान पर खेल कर कुछ लिखती थीं। यदि कोई शोधकर्ता उनके पुराने अंकों को देखे और आज के पत्र-पत्रिकाओं के विशेषांकों को देखे तो कन्फ्यूज्ड हुए बगैर नहीं रहेगा।

कुछ पत्र-पत्रिकायें स्वयं को इसलिए निष्पक्ष कह देती हैं क्योंकि उनको उनसे पैसे नहीं मिल पाये हैं। जिस दिन उनसे पैसे मिल जायेंगे वे भी उनका गुणगान करने लगेंगे।

आज अनेक लोभी विद्वान् भी हैं जो कभी जिनकी आलोचना करते थे, अब इनकी प्रशंसा करने में लगे हैं, उनकी खूबियाँ बताने लगे हैं। पैसा मिला, विचार बदले।

विद्वानों में एक कला तो होती ही है वे दुराचारी को महान और मूर्ख को विद्वान् बना सकते हैं। कालिदास का किस्सा तो सभी को मालुम ही है कि किस प्रकार राजकुमारी से बदला लेने के लिए विद्वानों ने मूर्ख कालिदास को महान विद्वान् सिद्ध कर दिया था। जब विद्वानों से पूछो कि पहले आप कुछ और कहते थे और अब उसके विपरीत कहते हो, ऐसा क्यों? तो उनके पास सटीक उत्तर है, पुराणों में भी प्रायश्चित की व्यवस्था है, माघनन्द का उदाहरण हमारे सामने है, पहले व्यक्ति गलत हो सकता है लेकिन बाद में बदल सकता है। मैं भी मानता हूँ कि ऐसा हो सकता है, इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं। लेकिन आज प्रायः ऐसा होता नहीं है।

पिछले दिनों राजस्थान सहित देश के अनेक हिस्सों में कई संतों के अनुचित कारनामे सामने आए। कुछ को संदिग्ध अवस्था में पकड़ा गया था। उनका बहिष्कार ही नहीं, कपडे पहनाने तक की बात भी चली थी। विद्वान् भी लामबन्द हो गये थे। अब स्थिति बदल गई है। अब तो विद्वान् भी उनके आगे नतमस्तक हो रहे हैं और गुणगान करते हैं, उनके सानिध्य में आयोजित संगोष्ठियों और अन्य कार्यक्रमों में सम्मलित हो रहे हैं क्योंकि उन्हें मालुम है कि बदले में उन्हें उपहार, भेंट आदि मिलने वाले हैं। दूसरी ओर मुनि सरलसागर जी जैसे मुनि बहिष्कृत हैं जिन्होंने ‘नग्नत्व समीक्षा’ सहित जैन धर्म में व्याप्त आडम्बरों पर अनेक समीक्षायें लिखीं थीं।

अधिकतर लोगों को उनके बारे में कुछ पता भी नहीं होगा।

कोई कुछ भी कहें, आज जैन धर्म का अस्तित्व खतरे में है। जैन धर्म अब पुस्तकों में ही रहेगा, आचरण में नहीं। मेरा अनुमान है कि जैन धर्म सन् 2050 तक समाप्त हो ही लेगा। और जब इसकी समाप्ति का इतिहास लिखा जायेगा तब इस समाप्ति के लिए वर्तमान के अनेक संतों, विद्वानों और पत्रकारों के योगदान को भी याद किया जायेगा।

(3) साधु-साध्विओं का फुअड़पन

अभी हाल ही में एक वीडियो सामने आया है जिसमें एक साधु आचार्य अपने ग्रुप की साध्विओं के साथ खड़े हैं और होली खेल रहे हैं। वैसे अभी होली आई भी नहीं है, उससे पहले ही होली का आनंद ले रहे हैं। होली पर तो संभवतः और अधिक मनोरंजक कार्य हों। साधु और साध्विओं के हाथों में प्लास्टिक की बोतलें हैं जिनमें रंग वाला पानी है। वे एक दूसरे पर रंगीन पानी डाल रहे हैं। रंगीन पानी से गीले हुए साधु और साध्वियाँ आनंद प्राप्त कर रहे हैं। ऐसे संतों की कमी नहीं है जो इस प्रकार के विभिन्न अनुचित कार्यों में लिप्त हैं। यह सोचने की बात है कि क्या ऐसे संत जैन धर्म को आगे ले जा सकते हैं या फिर जैन धर्म को नष्ट करने में सहयोग प्रदान कर रहे हैं?

डॉ. अनिल कुमार जैन
जयपुर

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