श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

भव्यत्व को जगाने की साधना : दोष-दर्शन से गुण-दर्शन और गुण-दर्शन से आत्म-दर्शन तक

जैन दर्शन की दृष्टि से मनुष्य का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि मैं संसार में कितना सफल हूँ, बल्कि यह है कि मैं अपनी आत्मा को किस दिशा में ले जा रहा हूँ?

जीव अनादिकाल से कर्मों के साथ जुड़ा हुआ है। संसार के विषयों, व्यक्तियों और परिस्थितियों में राग-द्वेष करता हुआ वह बार-बार उसी संसार में घूमता रहता है। लेकिन उसी जीव में मुक्ति की दिशा में बढ़ने की सामर्थ्य भी है। यही भव्यत्व है।

परंतु भव्यत्व केवल एक संभावना है; उसे जागृत और विकसित करना पड़ता है।

और इसके लिए तीन अत्यंत प्रभावशाली साधन बताए गए हैं—

दुष्कृत की गर्हा, सुकृत की अनुमोदना और अरिहंतादि की शरणागति।

दुष्कृत की गर्हा—अपने दोषों से समझौता बंद करना

हमारे भीतर दोष हैं, यह जानना कठिन नहीं है। कठिन यह है कि हम अपने दोषों को दोष मानकर उनसे भीतर से विरक्त हों।

मनुष्य दूसरे के क्रोध को देखकर कहता है—“कितना क्रोधी है!”

दूसरे के लोभ को देखकर कहता है—“कितना लालची है!”

दूसरे के अहंकार को देखकर कहता है—“इसे तो जरा भी विनय नहीं!”

लेकिन जब वही क्रोध, लोभ और अहंकार अपने भीतर दिखाई देता है, तब हमारा मन तुरंत वकील बन जाता है—

“उसने पहले मुझे उकसाया था।”

“मेरी जगह कोई भी ऐसा ही करता।”

“इतना तो व्यवहार में चलता है।”

यही है अपने दोषों के प्रति राग।

इसीलिए दुष्कृत-गर्हा का सबसे बड़ा बाधक राग है।

जब तक हमें अपने दोषों से मोह है, तब तक हम उन्हें छोड़ना नहीं चाहते। हम केवल उनके लिए सुंदर तर्क बनाते रहते हैं।

सच्ची गर्हा का अर्थ स्वयं को अपमानित करना नहीं है; अपने दोषों को पहचानकर उनसे संबंध तोड़ना है।

राग हटेगा तो सबसे पहले अपना दोष दिखाई देगा

यह बात अत्यंत गहरी है—

राग दूर होने पर स्वयं के दोष दिखाई देने लगते हैं।

जिससे हमें राग होता है, उसके दोष हमें दिखाई नहीं देते। और जिस दोष से हमें राग नहीं रहा, उसे स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं रहती।

इसलिए आत्मसाधना की शुरुआत दूसरों की गलतियाँ गिनने से नहीं, बल्कि स्वयं से पूछने से होती है—

“मेरे भीतर क्या गलत है?”

आज मैंने किससे कठोरता की?

किसके प्रति ईर्ष्या हुई?

कहाँ अहंकार आया?

किस परिस्थिति में लोभ ने मुझे चलाया?

कहाँ मैंने सत्य जानते हुए भी अपने स्वार्थ के लिए उसे दबा दिया?

यही प्रश्न आत्मा को भीतर की ओर मोड़ते हैं।

दूसरा चरण—सुकृत की अनुमोदना

दूसरों के दोष देखना सरल है, लेकिन दूसरों के गुण देखकर हृदय से प्रसन्न होना कठिन है।

क्यों?

क्योंकि यहाँ हमारा द्वेष बीच में आ जाता है।

कोई हमसे आगे बढ़ गया—मन खिन्न।

किसी को सम्मान मिल गया—मन में जलन।

किसी ने बड़ा धार्मिक कार्य कर दिया—मन में तुलना।

किसी के ज्ञान की प्रशंसा हुई—मन कहता है, “इतना भी क्या विशेष है?”

यह सब द्वेष के सूक्ष्म रूप हैं।

इसीलिए कहा गया—

सुकृतानुमोदना का प्रतिबंधक द्वेष है।

अनुमोदना का अर्थ केवल मुँह से “बहुत अच्छा” कहना नहीं है।

अनुमोदना का अर्थ है—दूसरे के गुण को देखकर भीतर से प्रसन्न होना और उस गुण को अपने जीवन में उतारने की इच्छा करना।

यदि किसी में विनय है तो मन कहे—

“यह गुण मेरे भीतर भी आए।”

किसी में तप है तो—

“मुझे भी ऐसी साधना की प्रेरणा मिले।”

किसी में क्षमा है तो—

“मैं भी अपने क्रोध को इतना शांत कर सकूँ।”

यही सच्ची अनुमोदना है।

द्वेष हटेगा तो दूसरे के गुण दिखाई देंगे

हम अक्सर कहते हैं कि “लोगों में आजकल अच्छे गुण ही नहीं हैं।”

लेकिन संभव है समस्या लोगों में कम और हमारी दृष्टि में अधिक हो।

द्वेष की दृष्टि से देखने पर दूसरे की अच्छाई भी छोटी दिखाई देती है।

द्वेष हटता है तो वही व्यक्ति, जिसमें हमें केवल कमियाँ दिखाई देती थीं, उसमें अनेक गुण दिखाई देने लगते हैं।

और यह बहुत बड़ा आध्यात्मिक परिवर्तन है।

क्योंकि जिस दिन हमें दूसरों के गुण देखकर आनंद आने लगेगा, उसी दिन ईर्ष्या की जगह प्रेरणा जन्म लेगी।

फिर दूसरे की सफलता हमारे लिए खतरा नहीं रहेगी; वह हमारी साधना का निमंत्रण बन जाएगी।

तीसरा चरण—मोह हटे और जिनाज्ञा समझ में आए

दोषों से विरक्ति और गुणों की अनुमोदना के बाद अगला चरण है—मोह का क्षय।

मोह के कारण मनुष्य सत्य को जानते हुए भी उसके अनुसार जी नहीं पाता।

हमें पता है कि क्रोध बुरा है—फिर भी क्रोध करते हैं।

पता है कि लोभ अशांति देता है—फिर भी लोभ करते हैं।

पता है कि अहंकार संबंध बिगाड़ता है—फिर भी अहंकार छोड़ना कठिन लगता है।

क्यों?

क्योंकि केवल ज्ञान आ जाना पर्याप्त नहीं है। मोह उस ज्ञान को जीवन में उतरने से रोकता है।

जब मोह का प्रभाव घटता है तब जिनाज्ञा केवल नियम नहीं लगती।

वह दिखाई देने लगती है—

“यह मेरी आत्मा के कल्याण का मार्ग है।”

यहीं से आज्ञा में श्रद्धा और शरणागति का जन्म होता है।

शरणागति का अर्थ क्या है?

अरिहंतादि की शरणागति का अर्थ केवल इतना नहीं कि हम हाथ जोड़कर नमस्कार कर लें।

सच्ची शरणागति का अर्थ है—

जिस दिशा में वे चले, उस दिशा को अपने जीवन की दिशा बनाना।

अरिहंत को नमस्कार करते हुए यदि मेरा भाव केवल इतना है कि—

“मेरा काम हो जाए, मेरी इच्छा पूरी हो जाए, मुझे सुख मिल जाए।”

तो मेरी दृष्टि अभी भी संसार पर केंद्रित है।

लेकिन जब भाव बदलता है—

“हे वीतराग! मुझे भी राग-द्वेष से ऊपर उठने की शक्ति मिले।”

तब भक्ति आत्मकल्याण की दिशा लेती है।

अरिहंत हमारे लिए केवल पूजनीय नहीं हैं; वे आत्मा की संभावित पूर्ण अवस्था का प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

वे बताते हैं—

जिस आत्मा में आज क्रोध है, वही आत्मा क्षमा की पूर्णता तक पहुँच सकती है।

जिस आत्मा में आज मोह है, वही आत्मा मोह से मुक्त हो सकती है।

जिस आत्मा पर आज कर्मों का आवरण है, वही आत्मा सिद्धत्व को प्राप्त कर सकती है।

यही शरणागति का वास्तविक रहस्य है।

 

नवकार हमें क्या सिखाता है?

नवकार में हम किसी की संपत्ति, सत्ता या प्रतिष्ठा को प्रणाम नहीं करते।

हम गुणों को प्रणाम करते हैं।

इसलिए नवकार का निरंतर स्मरण धीरे-धीरे हमारी जीवन-दृष्टि बदल सकता है।

हमारी दुनिया में सामान्यतः सम्मान मिलता है—

धनवान को, शक्तिशाली को, प्रसिद्ध व्यक्ति को, बड़े पद वाले को।

लेकिन नवकार हमें सिखाता है—

वास्तविक वंदनीयता धन में नहीं, गुण में है।

वास्तविक महानता पद में नहीं, आत्मसंयम में है।

वास्तविक प्रतिष्ठा प्रसिद्धि में नहीं, वीतरागता में है।

और यही दृष्टि अंततः हमें संसार के आकर्षण से हटाकर आत्मा की ओर ले जाती है।

🌿 इसलिए भव्यत्व कोई दूर की दार्शनिक अवधारणा नहीं है

भव्यत्व का जागरण हमारे रोजमर्रा के छोटे-छोटे व्यवहारों में दिखाई देता है।

जब गलती होने पर हम बहाना बनाने के बजाय कहते हैं—

“हाँ, गलती मेरी थी।”

तब भव्यत्व जाग रहा है।

जब दूसरे की सफलता देखकर मन से कहते हैं—

“बहुत अच्छा हुआ।”

तब भव्यत्व जाग रहा है।

जब किसी के गुण की प्रशंसा सुनकर भीतर जलन नहीं, प्रेरणा पैदा होती है—

तब भव्यत्व जाग रहा है।

जब गुरु, शास्त्र और जिनाज्ञा को अपने अहंकार से ऊपर रखने की भावना आती है—

तब भव्यत्व जाग रहा है।

और जब अरिहंत को देखकर केवल चमत्कार या सांसारिक लाभ नहीं, बल्कि यह प्रेरणा मिलती है—

“मुझे भी अपनी आत्मा को इसी वीतराग दिशा में ले जाना है।”

तब भव्यत्व वास्तव में जीवन का मार्ग बन रहा है।

🌸 अंतिम आत्मचिंतन

इसलिए पर्युषण जैसे पर्व केवल बाहरी क्रियाओं को बढ़ाने के दिन नहीं हैं।

ये अपने भीतर देखने के दिन हैं।

आज स्वयं से पूछें—

क्या मेरे दोष मुझे दिखाई देते हैं?

क्या मैं अपने दोषों का बचाव करता हूँ या उनकी गर्हा करता हूँ?

क्या मुझे दूसरे के गुण देखकर आनंद होता है?

क्या मैं दूसरे की उन्नति से प्रेरित होता हूँ या भीतर से जलता हूँ?

क्या मेरी भक्ति संसार माँगती है या आत्मपरिवर्तन?

क्या मेरी जिन-वंदना मुझे जिन जैसा बनने की दिशा में ले जा रही है?

यही प्रश्न हमारी साधना की वास्तविक परीक्षा हैं।

क्योंकि भव्यत्व का विकास बाहर से नहीं होता—दृष्टि बदलने से होता है।

राग घटता है → अपने दोष दिखाई देते हैं।

द्वेष घटता है → दूसरों के गुण दिखाई देते हैं।

मोह घटता है → जिनाज्ञा समझ में आती है।

जिनाज्ञा समझ में आती है → शरणागति दृढ़ होती है।

शरणागति दृढ़ होती है → दुष्कृत छूटता है और सुकृत जीवन में उतरता है।

और यही है—

🪷 भव्यत्व को जगाने से भव्यत्व को जीने तक की यात्रा।

पारसमल जैन
जोधपुर

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