जीवदया केवल किसी जीव के दिखाई देने पर उसे बचा लेना नहीं है। जीवदया का अधिक गहरा और व्यापक अर्थ यह है कि हमारे अपने व्यवहार, घर की व्यवस्था और दैनिक जीवन के कारण अनावश्यक रूप से किसी जीव की उत्पत्ति, पीड़ा, हिंसा या मृत्यु की परिस्थिति ही उत्पन्न न हो।
यही कारण है कि “उपचार से भली सावधानी” का सिद्धांत जीवदया में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि घर में ऐसे वातावरण को बनने ही न दिया जाए जिसमें सूक्ष्म या स्थावर जीवों की अनावश्यक उत्पत्ति हो, तो बाद में उन्हें हटाने, मारने या नष्ट करने की आवश्यकता भी कम हो जाती है।
जीवदया की पहली सीढ़ी—जीव उत्पन्न न हों, ऐसी व्यवस्था करना
सामान्य दृष्टि से हम प्रायः जीवदया को केवल प्रत्यक्ष प्राणी की रक्षा के रूप में देखते हैं—जैसे किसी कीड़े को देखकर उसे बचा लेना। परंतु इससे आगे की दृष्टि यह पूछती है कि वह जीव हमारे घर में आया ही क्यों?
जहाँ गंदगी, नमी, बासी भोजन, खुले खाद्य पदार्थ, रुका हुआ पानी और अंधकार रहता है, वहाँ अनेक प्रकार के सूक्ष्म जीवों के लिए अनुकूल वातावरण बन जाता है।
इसलिए घर की स्वच्छता केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं है; जीवदया की दृष्टि से भी यह एक महत्वपूर्ण सावधानी है।
स्वच्छ घर में अनावश्यक जीवोत्पत्ति की संभावनाएँ कम होती हैं। इस प्रकार सफाई का उद्देश्य केवल अपने लिए सुविधा पैदा करना नहीं, बल्कि दूसरे जीवों के लिए ऐसी परिस्थिति न बनाना भी है जिसमें बाद में उनके विनाश की नौबत आए।
पानी का विवेकपूर्ण उपयोग भी जीवदया है
पानी जीवन का आधार है। जहाँ अत्यधिक नमी रहती है, पानी जमा रहता है या अनावश्यक रूप से पानी बहता रहता है, वहाँ अनेक सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति और वृद्धि की संभावना बढ़ती है।
इसलिए पानी का उपयोग आवश्यकता के अनुसार और विवेकपूर्वक करना चाहिए।
इसका अर्थ यह नहीं कि पानी का उपयोग ही न किया जाए। अर्थ यह है कि—
आवश्यकता से अधिक पानी न बहाया जाए।
पानी को अनावश्यक रूप से जमा न रहने दिया जाए।
फर्श अथवा घर के ऐसे स्थानों पर लगातार नमी न बनी रहे।
पानी के उपयोग के बाद स्थान को यथासंभव व्यवस्थित रखा जाए।
यहाँ जीवदया का भाव बहुत सूक्ष्म है—हम अपने उपयोग की वस्तु को इस प्रकार न बरतें कि उससे अनावश्यक जीवोत्पत्ति की श्रृंखला प्रारंभ हो जाए।
भोजन का एक कण भी उपेक्षित न हो
भोजन करते समय, परोसते समय अथवा पकाते समय अन्न का एक-एक कण संभालना केवल अन्न का सम्मान करना नहीं है। बिखरे हुए खाद्य कण अनेक जीवों को आकर्षित कर सकते हैं।
मान लीजिए भोजन की मेज पर रोटी का छोटा टुकड़ा गिर गया। हमें वह नगण्य दिखाई देता है। लेकिन वही कण चींटी आदि जीवों के लिए भोजन का कारण बन सकता है और कुछ समय बाद वहाँ अनेक जीव एकत्रित हो सकते हैं।
इसलिए भोजन के समय सजगता आवश्यक है।
अन्न गिर जाए तो उसे वहीं पड़ा छोड़ देना लापरवाही है; उसे उचित ढंग से संभालना जीवदया की सावधानी है।
इसी प्रकार भोजन करते समय थाली, फर्श और आसपास के स्थान पर अनावश्यक रूप से अन्न न बिखरे—इसका ध्यान रखना चाहिए।
झूठा भोजन और बासी भोजन—छोटी आदत, बड़ा परिणाम
थाली में बचा हुआ झूठा भोजन यदि लंबे समय तक पड़ा रहे तो वह जीवों को आकर्षित कर सकता है। इसी प्रकार बासी अथवा समय से अधिक रखा हुआ खाद्य पदार्थ भी जीवोत्पत्ति का कारण बन सकता है।
इसलिए—
जितनी आवश्यकता हो उतना ही भोजन लें, भोजन को व्यर्थ न छोड़ें और खाद्य पदार्थों को उनकी उचित समय-सीमा के भीतर व्यवस्थित रखें।
यहाँ एक अत्यंत सुंदर जीवन-सिद्धांत सामने आता है—
भोजन की मर्यादा केवल अपने स्वास्थ्य के लिए नहीं, जीवों की रक्षा के लिए भी आवश्यक है।
हवा और सूर्यप्रकाश का महत्व
घर को पूरी तरह बंद रखना भी उचित नहीं। खिड़की-दरवाजे बंद रहने से प्राकृतिक हवा और सूर्यप्रकाश का प्रवेश रुकता है तथा घर में नमी और सीलन बढ़ सकती है।
इसलिए घर में उचित वायु-संचार और प्राकृतिक प्रकाश का ध्यान रखना चाहिए।
यहाँ भी उद्देश्य केवल घर को आरामदायक बनाना नहीं है। प्राकृतिक प्रकाश और उचित वायु-प्रवाह घर के वातावरण को ऐसा रखने में सहायता करते हैं जिसमें अनावश्यक जीवोत्पत्ति की संभावना कम हो।
अर्थात् घर की बनावट और दैनिक व्यवस्था भी जीवदया का एक माध्यम बन सकती है।
रसोईघर में विशेष सावधानी
रसोई वह स्थान है जहाँ भोजन, पानी, नमी और गर्मी—ये सब एक साथ उपस्थित होते हैं। इसलिए यहाँ थोड़ी सी असावधानी भी अनेक जीवों को आकर्षित कर सकती है।
रसोई में—
खाद्य पदार्थ खुले न छोड़ें।
डिब्बे और बर्तन ठीक से बंद रखें।
आटा, अनाज, मसाले आदि को व्यवस्थित रखें।
बर्तन और आसपास का स्थान साफ रखें।
गिरी हुई खाद्य सामग्री को पड़ा न रहने दें।
ऐसी वस्तुओं को लंबे समय तक न रखें जिनमें खराबी अथवा जीवोत्पत्ति की संभावना हो।
रसोई की स्वच्छता वास्तव में अन्न की शुद्ध व्यवस्था के साथ-साथ जीवदया की व्यवस्था भी है।
गहरे रंग और बारीक डिजाइन वाले फर्श से सावधानी
इस विषय में एक बहुत सूक्ष्म बात कही गई है। फर्श का ऐसा रंग या डिजाइन जिसमें छोटे जीव आसानी से दिखाई न दें, व्यवहारिक दृष्टि से कठिनाई पैदा कर सकता है।
यदि फर्श पर छोटा जीव हो और वह उसी रंग या डिजाइन में छिप जाए तो चलते समय उसके ऊपर पैर पड़ने की संभावना बढ़ सकती है।
इसलिए जीवदया की दृष्टि से घर की व्यवस्था करते समय केवल सुंदरता नहीं, दृश्यता और सुरक्षा को भी ध्यान में रखना चाहिए।
यह विचार बहुत महत्वपूर्ण है—
जो चीज सुंदर दिखती है, वह आवश्यक नहीं कि जीवदया की दृष्टि से भी उपयोगी हो।
घर की सुंदरता ऐसी होनी चाहिए जो सावधानी को बढ़ाए, घटाए नहीं।
प्रकृति के प्रति सजगता—जहाँ हाथ-पैर चलें, वहाँ दृष्टि भी चले
कोई भी प्रवृत्ति करते समय—चलना, बैठना, सामान रखना, सफाई करना, दरवाजा खोलना, वस्तु उठाना आदि—यदि हम बिना देखे करते हैं तो अनजाने में किसी जीव को कष्ट पहुँच सकता है।
इसलिए जैन जीवन-दृष्टि में प्रवृत्ति से पहले सावधानी और प्रवृत्ति के समय जागरूकता का विशेष महत्व है।
चलते समय केवल अपने गंतव्य को न देखें; अपने कदमों के आसपास भी ध्यान दें।
बैठते समय केवल सुविधा न देखें; जिस स्थान पर बैठ रहे हैं उसे भी देखें।
सफाई करते समय केवल गंदगी हटाने की जल्दी न करें; यह भी विचार करें कि कहीं कोई जीव तो नहीं है।
यही प्रमाद से अप्रमाद की ओर जाने का मार्ग है।
कचरा भी जीवदया का विषय है
कचरा केवल घर से बाहर निकाल देने की वस्तु नहीं है। उसका उचित स्थान पर, उचित ढंग से विसर्जन करना भी आवश्यक है।
यदि कचरा कहीं भी फेंक दिया जाए तो वह—
जीवों को आकर्षित कर सकता है,
सड़न और दुर्गंध पैदा कर सकता है,
नमी और जीवोत्पत्ति का कारण बन सकता है,
दूसरे स्थान पर अनावश्यक जीवों की उत्पत्ति का वातावरण बना सकता है।
इसलिए कचरे का समुचित और यथासंभव सावधानीपूर्वक निस्तारण करना चाहिए।
जीवदया केवल करुणा नहीं, दूरदृष्टि है
इस पूरे विषय का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि जीवदया का सर्वोच्च रूप केवल घटना घट जाने के बाद प्रतिक्रिया करना नहीं है।
एक व्यक्ति घर में चींटी देखता है और उसे बचाने की कोशिश करता है—यह दया है।
दूसरा व्यक्ति यह सोचता है कि चींटियाँ यहाँ क्यों आईं? भोजन कहाँ गिरा? नमी कहाँ है? कौन-सी व्यवस्था बदलने से भविष्य में यहाँ जीवों का अनावश्यक जमाव नहीं होगा?—यह दया के साथ विवेक और दूरदृष्टि है।
इसलिए जीवदया के दो स्तर समझे जा सकते हैं—
पहला—उत्पन्न जीव की रक्षा।दूसरा—अनावश्यक जीवोत्पत्ति की परिस्थिति को रोकना।
दूसरा स्तर अधिक व्यापक सावधानी की माँग करता है।
जीवदया की पूरी भावना घर की व्यवस्था में उतरनी चाहिए
यदि जीवदया केवल पूजा, प्रवचन या धार्मिक चर्चा तक सीमित रह जाए और हमारी दैनिक जीवन-पद्धति में उसका प्रभाव दिखाई न दे, तो उसका वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
जीवदया तब जीवन का हिस्सा बनती है जब—
घर साफ हो, परंतु सफाई में असावधानी न हो।पानी का उपयोग हो, परंतु अपव्यय न हो।भोजन बने, परंतु अन्न न बिखरे।भोजन रखा जाए, परंतु अनावश्यक रूप से खुला न रहे।घर सुंदर हो, परंतु ऐसी सजावट न हो जिससे जीव दिखाई ही न दें।चलें तो सावधानी से चलें।कचरा निकालें तो उचित स्थान पर निकालें।रसोई चलाएँ तो जागरूकता से चलाएँ।
अर्थात् जीवदया कोई एक काम नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक सावधान पद्धति है।
उपसंहार
“उपचार से भली सावधानी” का सिद्धांत हमें बहुत गहरी शिक्षा देता है—जिस अनर्थ को पहले से रोका जा सकता है, उसे बाद में सुधारने की आवश्यकता क्यों आने दें?
जीव को देखकर दया जागना अच्छी बात है; लेकिन उससे भी आगे की बात है कि हमारी असावधानी से जीव संकट में पड़े ही नहीं।
इसीलिए स्वच्छता, संयमित पानी का उपयोग, अन्न की रक्षा, भोजन की उचित व्यवस्था, हवा-प्रकाश का प्रवेश, रसोई की सावधानी, उचित फर्श और सजावट, प्रत्येक प्रवृत्ति में जागरूकता तथा कचरे का उचित विसर्जन—ये सब अलग-अलग घरेलू नियम नहीं हैं।
इन सबके भीतर एक ही मूल भावना प्रवाहित होती है—“मेरे सुख और सुविधा के कारण किसी अन्य जीव को अनावश्यक कष्ट न हो।”
यही भावना जब व्यवहार में उतरती है, तब जीवदया केवल विचार नहीं रहती, वह जीवन की संस्कृति बन जाती है।
🙏
पारसमल जैन
जोधपुर