“गुरु पूर्णिमा” विभिन्न दर्शन, संप्रदाय, धर्मों में मनायी जाती है। जैन धर्म का इतिहास भी प्राचीन है। भगवान महावीर स्वामी को केवलज्ञान हो गया परन्तु दिव्य देशना नहीं खिरी। यदि प्यासे को पानी न मिले तो तड़पन होती है आकुलता होती है। यद्यपि समवशरण में किसी को कोई कष्ट नहीं होता परन्तु भगवान की वाणी को सुनने हर मन आतुरित रहता है। 12 वर्षों से जिन्होंने एक शब्द भी नहीं बोला, भक्तों के मन प्यासे थे कि अब तो प्रभु कुछ बोलेंगे। हमारी धर्म पिपासा को शान्त करेंगे। परन्तु वे निराश ही रह गये परन्तु आशा प्रबल थी कि आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसो कभी न कभी तो देशना खिरेगी। कहा जाता है -“आशा पें आसमान टिका रहता है।” बस महावीर भगवान की देशना अवश्य होगी। भक्त, श्रद्धालु पिपासु थे। यदि आप होते तो कहते चार बार आ चुका आचार्य भगवान् बोलते ही नहीं तो अब आना बन्द कर दूँगा। क्योंकि आपकी श्रद्धा कच्ची है भक्ति में कुछ कमी है प्रमाद व अज्ञानता छायी है। परन्तु भगवान महावीर के भक्तों से सभा भरी ही रहती थी। सभी पपीहे की तरह प्रभु की वाणी सुनने प्यासे थे। पूरे 65 दिन हो गये और वाणी नहीं खिरी। तभी सौधर्म इन्द्र का आसन कंपायमान होता है। इन्द्र अवधिज्ञान लगाता है कि आखिर क्या बात है तो पता चलता है भगवान की देशना तो इन्द्रभूति गौतम के निमित्त से ही खिरेगी। अब प्रश्न यह था कि गौतम अभिमानी था उसे समवशरण तक कैसे लाए ऐसा सोचकर इन्द्र एक कुरुप अत्यन्त वृद्ध ब्राह्मण का रुप धारण करता है और चल देता है गौतम के आश्रम की ओर। जहाँ गौतम अपने शिष्यों को वेदाभ्यास करा रहे थे। इन्द्र वृद्ध ब्राह्मण वेश में वहाँ पहुँच जोर जोर से चिल्लाते है गौतम ! गौतम ! गौतम ! उस वृद्ध की आवाज सुन एक शिष्य दौड़कर आता है और कहता है बूढे क्यों हमारे ज्ञानाभ्यास में विघ्न डालता है तुझे मालूम नहीं हमारे गुरु जी अभी वेदाभ्यास करा रहे है। हाँ-हाँ जानता हूँ! जानता हूँ तभी तो यहाँ आया हूँ। चल मेरा हाथ पकड़ ले और ले चल अपने गुरु के पास। शिष्य उसे वृद्ध समझसाथ ले जाता है। गौतम के पास पहुँचते ही वृद्ध कहता है, हे गौतम! मैंने सुना है तू बहुत विद्वान ज्ञानी है इसलिये एक प्रश्न जो मेरे गुरु ने पूछा है वह मुझे समझ में नहीं आ रहा है वह तुम से समझना चाहता हूँ। गौतम जिन्हें ज्ञान का बहुत अभिमान था वे कहते है- हॉ-हाँ मैंने सारे वेद, पुराणों का अध्ययन किया है। कहो तुम्हारा प्रश्न क्या है? वृद्ध प्रश्न कहता है –
त्रैकाल्यं, द्रव्य षट्कं, नव पद सहितं जीवषट्काय लेश्याः ।
पञ्चान्ये चास्तिकाया व्रत समिति गति ज्ञान चारित्र भेदाः ।।
इत्येतन् मोक्षमूलं त्रिभुवन महितैः प्रोक्त मर्हद-भरीशैः।
प्रत्येति श्रद्द्धाति, स्पृशति च मतिमान यः स वै शुद्धदृष्टिः ।।
गौतम जैसे ही सुनता है सोच में पड़ जाता है इतने वेद, पुराण पढ़ लिये परन्तु कहीं छह द्रव्य, नौ पदार्थ, षट् निकाय के जीव, छह लेश्या, पाँच अस्तिकाय आदि पढ़ने में नहीं आये। परन्तु ज्ञान का अभिमान था उत्तर तो मालूम नहीं था परन्तु गौतम कहता है इतना छोटा सा प्रश्न अभी उत्तर दे सकता हूँ परन्तु तुम्हारें गुरु के पास चलकर ही इसका उत्तर दूँगा। बोलो तुम्हारे गुरु का आश्रम कहाँ है-इन्द्र कहता है चलिए बस पास में ही विपुलाचल पर्वत पर मेरे गुरु का आश्रम है इन्द्र जो कि वृद्ध के रुप में था अब तो उसकी चाल ही बदल गई 16 वर्षीय कुमार की तरह चलने लगा| गौतम को आश्चर्य होता है वे जैसे ही समवशरण के सामने पहुँचते हैं मानस्तम्भ को देखते ही मान गलने लगता है अरे। मैं किस मिथ्याभिमान में था। समवशरण की विभूति को देख आश्चर्य में पड़ जाता है। किसी शास्त्र में उल्लेख मिलता है गौतम 60,000 प्रश्न महावीर स्वामी से करते है तब वैराग्य होता है और दीक्षा लेते है तथा कहीं-कहीं उल्लेख मिलता है कि दीक्षा लेने के उपरान्त 60,000 प्रश्न पूछे। गौतम का मान गलित होता है और वे महावीर स्वामी की स्तुति करने लगते है-
जयति भगवान हेमाम्भोज प्रचार विजृम्भिता,
वमर मुकुट क्षायोदगीर्ण प्रभा परिचुम्बितौ ।।
महावीर भगवान के चरणों में सर्वस्व समर्पण कर देते है। दीक्षा लेते ही उन्हें मनः पर्यय ज्ञान हो जाता है। 63 ऋद्धियों के स्वामी होकर प्रथम गणधर के रुप में प्रतिष्ठित हो जाते है और दिव्यदेशना प्रारम्भ हो जाती है। आज के दिन गुरु केरुप में प्रथम गणधर की प्राप्ति हुई। इसलिये यह दिन “गुरु पूर्णिमा” के रुप में मनाया जाता है। गुरु की अनुकंपा जीवन में निराली होती है। इसलिये प्रभु के पहले गुरु का स्मरण किया जाता है कहा जाता है-
गुरु गोविन्द दोउ खड़े, काके लागू पाय।
बलिहारी गुरुदेव की गोविन्द दियो बताय ।।
गुरु की महान अनुकंपा है जो चरणों में स्थान दिया, माँ की तरह अंगुली पकड़कर चलना सिखाया, जीवन की A,B,C,D सिखायी है मेरे लड़खड़ाते कदमों को मजबूत किया। ज्ञान देकर जीवन में ज्ञान रुपी दीप ही प्रज्जवलित कर दिया है।
अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया।
चक्षुरुन्मिलीतं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः ।।
आज की बेला में जितने भी उपकारी आचार्य भगवन्त हुए है उनके चरणों में त्रय भक्ति पूर्वक बारंबार नमस्कार करता हूँ। सब कुछ नष्ट हो जाए परन्तु गुरु की नजरे मेरे ऊपर से न उठे। आज तक जो रत्नत्रय व मोक्ष मार्ग पर चलने का संबल दिया वह साहस दिन दूना रात चौगुना तब तक बढ़े जब तक निर्वाण न हो आपका वरदहस्त मुझ पर बना रहे। चाहे आचार्य आदिसागर हो या आ. शान्तिसागर जी हो, आ. महावीर कीर्ति हो या अन्य हो आपमें मुझे वे तथा उनसे आप दिखते रहे। रत्नत्रय पुञ्ज आचार्य, उपाध्याय, मुनि सब एक है। णमो लोए सव्वसाहूणं में सब गर्भित हो जाते है। जब रत्नत्रय पर दृष्टि होती है तो आचार्यों में भेद नहीं सब समान है।
गुरुवः पातु नो नित्यं ज्ञान दर्शन नायकाः।
चारित्रार्णव गंभीरा मोक्ष मार्गोपदेशका ।।
इन गुणों से युक्त सब गुरुओं को नमस्कार हो। एक में सबके दर्शन कर लेना तो आपके नेत्र सम्यग्दर्शन से पावन हो जायेंगे। 3 कम 9 करोड़ विद्यमान मुनिराजों को हम नमस्कार करते है। स्वप्न में भी ज्ञात व अज्ञात भाव से भी अविनय, अदानदर न हो उनके प्रति श्रद्धा भक्ति से शीश सदा झुका रहे। तो हमारी “गुरु पूर्णिमा” मनाना सार्थक होगा।
गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ है गढ़ गढ़ काड़े खोट।
अंतर हाथ पसार कै बाहिर मारे चोट ।।
गुरु श्रीफल की तरह होते है जीवन निर्माण कठोरता में होता है। मिट्टी की ईंट को जितना पकायेंगे वह उतनी ही मजबूत बनेगी। यदि गुरु कठोर न हो तो अनादि के संस्कार छूटते नहीं। जब अपने गुरुदेव को गाथा सुनाते थे तो थर-थर कॉपते थे। उदगांव में भी उतना ही डर लगता था। तो पूज्य गुरुदेव कहते है तुम्हें डर है इसलिये उन्नति हो रही है। सुधार के रास्ते डर से खुलते है गुरु कठोर न हो तो काम ही न चले। बच्चे को माँ न डाटे तो जीवन बिगड़ जायेगा। मिट्टी खा खाकर बीमार जो जायेगा। टीचर न डाटे तो बच्चे पढ़ेंगे नहीं और exam में फैल हो जायेगे। कठोरता ही सुधार का रास्ता है। कठोर रहेगे तो शिष्य पककर निखर जायेगे। व्रत, नियम, संयम में वे मजबूत हो जायेगे। जब देखो ज्ञानाराधन, तप, जाप, व्रत में रत मिलेगें। वे तप गये है शिष्य भी मन को गुरु आज्ञा में ढाल लेता है। गुरु पूर्णिमा तब सार्थक होगी जबकि आप कोई गुरु बना ले क्योंकि जिसके जीवन में गुरु नहीं उसका जीवन शुरु नहीं, गुरु जीवन निर्माण ही नहीं करते अपितु निर्वाण की यात्रा भी करा देते है।
“गुरुपूर्णिमा” पर गुरु दक्षिणा के रुप में यही चाहूँगा कि आप स्वाध्याय करें, प्रवचन सुने, आहार दान करें और संतों की सेवा कर कुछ पुण्य की कमाई कर लें। बाहर के नोट की कमाई सरल है परन्तु पुण्य की कमाई विरले ही कर पाते है।
प्रवचनकार
परम पूज्य श्रमणाचार्य श्री
१०८ विराग सागर जी महाराज