श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

असंयम

असंयम का फल क्या होगा ?

एक नगर में एक राजा था, उस की एक दासी थी, वह राजा की सेवा में सदैव तत्पर रहती थी, उसे राजा की पसंद तथा नापसंद का भी पता था।

राजा को फूलों के सेज पर सोना बहुत पसंद था, वह गुलाब के फूलों को ही पसंद करता था तथा फूल ताजे होना चाहिए, सुगंधित होना चाहिए । वह रोज ही सेज तैयार करती, रोज की भाँति एक दिन उसने राजा की सेज को तैयार किया, तथा सोचा कि राजा तो, रोज ही इस सुंदर सेज पर सोता है, आज मैं भी इस पर सो कर के देखु, क्योंकि अभी राजा को अपनी सेज पर आने में देर है, तब तक मैं सोकर के उठ जाऊँगी और वह फूलों की सेज पर सो गई। वह सेज बहुत कोमल थी और दासी को लेटते ही नींद आ गई, इतने में राजा आ गया, उसने देखा कि आज मेरी सेज पर यह दासी सो रही है और उसे क्रोध आ गया, उसने तुरंत ही एक चामकोड़ा मँगाया और उसके शरीर पर जोर से मारता है। जिससे उसके शरीर की चमड़ी निकल आई और वह चीख कर के उठी तो अपने सामने राजा को देखा और राजा ने दूसरा कोड़ा भी उसको मार दिया, राजा ने जैसे ही दूसरा कोड़ा मारा, दासी को हँसी आ गई। राजा ने पुनः तीसरा कोड़ा मारा दासी और जोर से हँसने लगी अंत में राजा को विवेक जागृत हुआ और वह सोचने लगा, कि मैं इसको मार रहा हूँ फिर भी यह दासी हँस रही है, क्या बात है ? राजा ने दासी से पूछा-कि तुम इतने कोड़े खाने के बाद भी हँस रही हो। दासी बोली-हे राजन् ! भगवान ने मेरा विवेक जागृत कर दिया, तुम्हारे कोड़े ने मुझे शिक्षा दे दी, कि जब एक बार इस फूल के सेज पर सोने से इतने कोड़े खाने पड़े, तो जो रोज-२ इस सेज पर सोता है उसे कितने कोड़े खाने पड़ेंगे । इतना सुनतेही राजा चिंतन की गहराई में उतर गया। और उसे वैराग्य हो गया कि एक दिन के असंयम में रहने का इतना फल है तो जो हमेशा असंयम में रहता है, उसको क्या फल मिलेगा ? अतः हमें असंयम को छोड़ संयम को घारण करना चाहिये ।

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तप

सम्यक् तप मोक्षमार्ग में उपयोगी

एक वैज्ञानिक था वह अपनी लेबोरेटरी में किसी खोज (आविष्कार) में तल्लीन था, उसने अपनी पत्नि को पहले से ही संकेत कर दिया था कि देखो, मैं एक अविष्कार कर रहा हूँ, तुम मुझे बीच में डिस्टर्ब (परेशान) नहीं करना, जब तक मुझे कार्य में सफलता न मिल जाये। उसकी पत्नि समझदार थी, उसने वैसा ही किया उसकी लेबोरेटरी में अन्य वैज्ञानिक भी काम करते थे उसने सभी को संकेत कर दिया था, तो उसके सहचर लोग भी उसके पास नहीं जाते थे, उसके बच्चे भी उसके पास नहीं जाते थे। वह अपने कार्य में इतना तल्लीन रहता था कि उसके लिये कुछ भी पता नहीं चलता था कि, बाहर क्या हो रहा है? क्योंकि वह उस आविष्कार को काफी दिन से कर रहा था, पर सफलता नहीं मिल पा रही थी। वह वैज्ञानिक रोज अपनी डायरी लिखता था कि, आज मेरा कितना काम हुआ, कितने से कितने बजे तक काम किया आदि-आदि वह पूरी दिनचर्या को लिखता था। उसकी पत्नि, पति की आज्ञा के अनुसार रोज भोजन का टिफिन लाती थी, निर्धारित स्थान पर रख देती, जहाँ उसका पति रोज काम करने के पश्चात आता और भोजन करता था, साथ ही उसका मित्र भी उसके साथ उसी प्रयोगशाला में काम करता था। उसकी पत्नि बाहर गई हुई थी, उसने देखा, कि मेरे मित्र की पत्नि रोज टिफिन लाती है और रख के चली जाती है, मेरा दोस्त काम में इतना व्यस्त है कि, उसको भोजन की भी चिंता नहीं है। वह दोस्त उस स्थान पर आता है और दोस्त की पत्नि द्वारा लाये गये टिफिन का भोजन आधा करता और आधा दोस्त के लिये छोड़ देता । उसकी पत्नि रोज टिफिन लाती, ले जाती । वह सोचती थी कि मेरे पति रोज भोजन कर लेते होंगे । जब उसका कार्य सफल हो गया तो वह अपने कमरे से बाहर निकला औरउसी समय उसकी पत्नि टिफिन ले कर आई तो पत्नि के हाथ में टिफिन को देखकर अपनी पत्नि से बोला, आज मेरे पेट में दर्द हो रहा है साथ ही भूख भी बहुत जोर से लग रही है, क्या बात है? उसकी पत्नि बोली-मैं तो रोज टिफिन भेजती थी क्या आपने भोजन नहीं किया ? बोला-नहीं, मैं तो रोज भोजन करता था, इसी बीच उसका मित्र आ गया, वह अपने मित्र से भी वही बात कहता है। तो उसका मित्र कहता है, कि आपने चार दिन से भोजन नहीं किया है इसलिये ऐसा हो रहा है। वह बोला-नहीं, मैंने तो रोज भोजन किया है। मित्र बोला-नहीं किया। उसकी पत्नि बोली हाँ, इन्होंने रोज भोजन किया, क्योंकि मैं टिफिन जब घर ले जाती थी, तो आधाखाली रहता था । उसका मित्र बोला- ठीक है, लेकिन वह आपका पति नहीं, मैं भोजन करता था, उसके मित्र को विश्वास नहीं हुआ कि, मैंने इतने दिन से भोजन नहीं किया। वह अपनी डेली डायरी उठाकर देखता तो फिर उसे लगता है कि मैंने इतने दिन से भोजन नहीं किया क्योंकि उसमें चार दिन से कुछ भी नहीं लिखा गया था । इस प्रकार यह भी एक तप था, लेकिन मोक्षमार्ग में इसकी कोई उपयोगिता नहीं थी क्योंकि वह संसार, शरीर के लिये था, आत्मा के लिये नहीं ।

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तप की महिमा

एक बार की बात है कि अकबर ने बीरबल से कहा बीरबल, तुम्हें मेरे एक प्रश्न का जवाब देना है। बीरबल ने कहा-कहिये हुजूर, क्या प्रश्न है ? अकबर ने कहा बीरबल, यह कोयला है इसे साफ करना है। बीरबल ने कहा ठीक है इसके लिये मुझे ८ दिन का समय देना होगा। वह विचार करता है कि कैसे साफ करें ? साबुन से साफ करें, सर्फ से साफ करें या क्रीम लगा के, और यह सोचते सोचते उसने एक युक्ति निकाल ली क्योंकि वह ज्ञानी था और उसने अकबर से कहा हुजूर, मैंने इसकी युक्ति निकाल ली। लेकिन इसका उत्तर मैं सभा में दूँगा। अकबर ने कहा- ठीक है। दूसरे दिन राज दरबार लगा हुआ था। बीरबल राज दरबार में पहुँच गये हैं। सभी सोच रहे थे, क्या यह साबुन लगायेगा, क्रीम लगायेगा या सर्फ से सफेद करेगा?और बीरबल उस सभा में रखे कोयले में अग्नि लगा देता है । कुछ समय में वह अंगारा बन जाता है और कुछ समय बाद वह शांत हो जाता है तब बीरबल कहते हैं- हुजूर ! कोयला सफेद हो गया है। इसी प्रकार हम भी तप रूपी अग्नि में तपेंगे तो हमारी कर्मरूपी कालिमा नष्ट हो जायेगी । और भी आत्मा उज्ज्वल हो जायेगी ।

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