श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

आँखों की शर्म तो इतिहास बन गई

 

हे श्रद्धावान श्रेष्ठजन!
समय ने जैसे ही करवट बदली, प्रकृति में भी व्यापक उथल-पुथल मच गई। आशाओं का सूर्य मानो अस्त हो गया और गहरी निद्राएँ भी हवा में विलीन हो गईं। आज शारीरिक आँखें तो झपकती रहती हैं, परन्तु संवेदनाओं की आँखें सूखती जा रही हैं। नैतिकता की नदी मानो सूख चुकी है और मन के उफान ने आँखों की शर्म पर ऐसा पर्दा डाल दिया है कि रिश्तों की गहराई भी समुद्र की अतल गहराइयों में खोती जा रही है।
जीवन इच्छाओं का एक गुलदस्ता है—कुछ इच्छाएँ महकती हैं, कुछ मुरझा जाती हैं, कुछ उलझाती हैं और कुछ चुभ जाती हैं। जब मनुष्य का अभिमान आकाश को छूने लगता है, तब समय मुस्कुराकर उसे उसकी वास्तविकता का परिचय करा देता है।
अहंकार के नगाड़े जब अत्यधिक शोर मचाने लगते हैं, तब जीवन को त्रासदी के तूफानों से बचाना कठिन हो जाता है। आत्मा की अदालत सब कुछ देख भी रही है और जान भी रही है, किन्तु मौन धारण किए हुए है। परिवार व्यवस्था बिखरती जा रही है। स्त्री और पुरुष दोनों ही भौतिक दृष्टि और आकर्षण की अग्नि में भावनात्मक मूल्यों को झुलसा रहे हैं।
हे विवेकशील भव्यात्माओं!
आज मनुष्य अनेक प्रकार के विचारों से घिरा हुआ है। आधुनिकता ने रंग-बिरंगी चकाचौंध का ऐसा संसार खड़ा कर दिया है कि सादगी और सहजता सिकुड़ती जा रही है। शरीर की मर्यादाएँ सीमित होती जा रही हैं और विकृत विचारों ने मनुष्य के अंतर्मन को आंदोलित कर दिया है।
स्त्री का सहज सौम्य स्वरूप बदलता दिखाई दे रहा है। पुरुष और स्त्री दोनों के स्वभाव में असंतुलन बढ़ रहा है। विनम्रता का स्थान आक्रामकता लेती जा रही है और संवेदनशीलता के स्थान पर प्रदर्शन की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। परिणामस्वरूप जीवन की मधुरता, वाणी की मिठास, चेहरे की मुस्कान और आँखों की लाज धीरे-धीरे बहती चली जा रही है।
हे धर्मप्रेरक मधुभाषी सज्जनों!
अवसर कभी कहकर नहीं आता; वह अतिथि की भाँति अचानक जीवन में प्रवेश करता है। व्यक्ति भी इस संसार में एक अतिथि ही है। वस्तुएँ, घटनाएँ और यात्राएँ भी जीवन के क्षणिक अतिथि हैं, किन्तु यही हमारे कर्मों का निर्माण करती हैं।
समय और कर्म किसी को क्षमा नहीं करते। चुगली की धार इतनी तीक्ष्ण होती है कि वह रक्त संबंधों को भी काट देती है। प्रत्येक श्वास के साथ हमारी प्राणशक्ति क्षीण होती जा रही है। इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग ही वास्तविक बुद्धिमत्ता है।
हे संयमी साधक एवं विनम्रजन!
एक दिन झुर्रियों से भरा एक वृद्ध अपने विचारों के दर्पण में अपने आँसुओं और अपनी खोती हुई गरिमा को खोज रहा था। प्रकृति ने उससे कोमलता से पूछा—”क्या सोच में डूबे हो?”
वृद्ध बोला—”यह आधुनिकता की दौड़ है। नया युग, नए विचार, नई सोच, नई कल्पनाएँ, नई चाल और नए पहनावे के साँचे में ढलकर मनुष्य अहंकार और कठोर वाणी की लपटों में जलता जा रहा है।”
आधुनिकता के इस उफान में गरिमा और मर्यादा के वे पौधे नष्ट हो गए, जिन पर कभी निस्वार्थ प्रेम और अटूट विश्वास के पक्षी आकर बैठते थे। वे एक बार उड़ गए तो फिर लौटकर नहीं आए।
आज स्थिति यह है कि आँखों की शर्म इतिहास बनती जा रही है। यदि उसे ढूँढ़ना हो तो इतिहास के पन्नों में तलाशना पड़ेगा।
पूज्य धर्मप्रेमी सज्जनों एवं मातृशक्ति को नमन
अपने 91वें जन्मोत्सव के इस पावन अवसर पर आप सभी को सादर प्रणाम एवं जय जिनेन्द्र।
आपका स्नेह, आपकी मधुर वाणी, आपकी धार्मिक आस्था, आपकी विनम्रता और आपका अमूल्य आशीर्वाद मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि आपकी कृपा से मेरी लेखनी में सदैव मधुरता, शब्दों में गहराई, सेवा में समर्पण और हृदय में प्रेम का बसंत बना रहे।
आपके हृदय की शुभ तरंगों, अंतर्मन की पवित्र भावनाओं, कंठ की मधुर वाणी और करतालों की मंगल ध्वनि के साथ ऐसा आशीर्वाद मिलता रहे कि मेरे जीवन में सदैव अमृतमयी वाणी और सत्प्रेरणा का प्रवाह बना रहे।
सादर प्रणाम।

छगन लाल जैन
‘हरसाना वाले’

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