जैन समाज एक अल्पसंख्यक समाज है और वर्तमान समय में उसके समक्ष सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक आंतरिक विभाजन है। आज समाज विभिन्न पंथों और परंपराओं में विभाजित दिखाई देता है। यह विभाजन केवल श्रावकों तक सीमित नहीं है, बल्कि साधु-साध्वियों के बीच भी पंथगत भिन्नताएँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।
दिगंबर और श्वेतांबर परंपराओं के साथ-साथ दिगंबर समाज में तेरापंथी और बीसपंथी तथा श्वेतांबर समाज में मंदिरवासी और स्थानकवासी जैसी विभिन्न परंपराएँ हैं। ये सभी परंपराएँ अपनी-अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक विशेषताओं के कारण सम्माननीय हैं। किंतु जब पंथगत पहचान सामाजिक एकता से बड़ी हो जाती है, तब समाज की सामूहिक शक्ति प्रभावित होने लगती है।
आज अनेक तीर्थस्थलों पर जैन समाज आपसी मतभेदों और विवादों का सामना कर रहा है। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि संख्या की दृष्टि से पहले से ही छोटा समाज यदि अनेक भागों में बँटा रहेगा, तो उसकी सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक शक्ति स्वाभाविक रूप से कमजोर होगी।
वर्तमान समय की आवश्यकता है कि हम अपने मतभेदों से ऊपर उठकर अपनी साझा पहचान को प्राथमिकता दें। हम सभी भगवान महावीर के अनुयायी हैं और हमारा मूल धर्म जैन धर्म है। इसलिए हमारी पहली पहचान किसी पंथ से नहीं, बल्कि जैन होने से होनी चाहिए।
आज जैन समाज की जनसंख्या निरंतर घट रही है, जबकि उसकी धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संपदा बढ़ रही है। ऐसे समय में समाज की एकता और संगठन पहले से अधिक आवश्यक हो गए हैं। यदि हम संगठित रहेंगे तो अपनी विरासत, संस्कृति और मूल्यों की रक्षा अधिक प्रभावी ढंग से कर सकेंगे।
मेरा समस्त जैन समाज से विनम्र आग्रह है कि हम अपनी-अपनी परंपराओं और मान्यताओं का सम्मान करते हुए भी सामाजिक एकता को सर्वोपरि रखें और पूरे गर्व के साथ कहें—
“हम केवल जैन हैं।”
यही भावना आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक सशक्त और प्रेरणादायी संदेश बनेगी तथा समाज को अधिक संगठित और सुदृढ़ बनाएगी।
मेरा उद्देश्य किसी भी पंथ या परंपरा की आलोचना करना नहीं है, बल्कि जैन समाज में एकता, सद्भाव और परस्पर सहयोग की भावना को मजबूत करना है। यदि मेरे विचारों से अनजाने में किसी की भावनाओं को ठेस पहुँची हो तो मैं विनम्रतापूर्वक क्षमाप्रार्थी हूँ।
आइए, समय की पुकार को समझें और एक स्वर में कहें—
“हम केवल जैन हैं।”
जय जिनेंद्र।
महावीर जैन, एडवोकेट
सामाजिक कार्यकर्ता
मथुरा