श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

नया समाज बनाना है तो पहले नया मन बनाना होगा

आज दुनिया पहले से अधिक शिक्षित है, अधिक संपन्न है, अधिक तकनीकी रूप से विकसित है। हमारे हाथ में मोबाइल है, घर में सुविधाएँ हैं, यात्रा के साधन हैं, जानकारी का अथाह भंडार है।

फिर भी एक प्रश्न बार-बार सामने खड़ा हो जाता है—

क्या मनुष्य पहले से अधिक शांत, संतुष्ट और संस्कारी हुआ है?

यदि ईमानदारी से उत्तर खोजें तो पाएँगे कि बाहरी प्रगति बहुत हुई है, परन्तु आंतरिक विकास उसी गति से नहीं बढ़ पाया।

आज समाज की सबसे बड़ी समस्या साधनों की कमी नहीं, बल्कि संस्कारों की कमी है।

नया युग, नई चुनौतियाँ

आज का युवा प्रतिभाशाली है।

उसके पास ज्ञान है, अवसर हैं, आत्मविश्वास है।

लेकिन उसके सामने कुछ ऐसी चुनौतियाँ भी हैं, जो पहले कभी नहीं थीं।

मोबाइल की दुनिया ने संवाद बढ़ाया है, लेकिन आत्मीयता कम कर दी है।

सोशल मीडिया ने मित्रों की संख्या बढ़ा दी है, लेकिन सच्चे संबंध कम कर दिए हैं।

प्रतिस्पर्धा ने सफलता दी है, लेकिन कई बार शांति छीन ली है।

इसलिए आज की सबसे बड़ी आवश्यकता केवल करियर निर्माण नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण है।

समाज को बदलने से पहले स्वयं को बदलना होगा

हम अक्सर कहते हैं—

समाज बिगड़ रहा है।

नई पीढ़ी बदल गई है।

लोगों में पहले जैसी संवेदनाएँ नहीं रहीं।

लेकिन शायद हमें एक प्रश्न स्वयं से भी पूछना चाहिए—

क्या मैं वह व्यक्ति हूँ जैसा समाज को बनाना चाहता हूँ?

यदि हम चाहते हैं कि बच्चे सत्य बोलें, तो हमें स्वयं सत्यनिष्ठ बनना होगा।

यदि हम चाहते हैं कि युवा माता-पिता का सम्मान करें, तो हमें अपने बड़ों का सम्मान करते हुए दिखना होगा।

यदि हम चाहते हैं कि समाज में प्रेम बढ़े, तो हमें स्वयं कटुता छोड़नी होगी।

समाज भाषणों से नहीं, उदाहरणों से बदलता है।

परिवार : संस्कारों की पहली पाठशाला

किसी भी राष्ट्र का भविष्य विद्यालयों में नहीं, परिवारों में बनता है।

बच्चे हमारे शब्दों से कम और हमारे व्यवहार से अधिक सीखते हैं।

यदि घर में प्रेम होगा, तो बच्चा प्रेम सीखेगा।

यदि घर में सम्मान होगा, तो वह सम्मान सीखेगा।

यदि घर में केवल आलोचना, क्रोध और विवाद होंगे, तो वही उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाएँगे।

इसलिए नई पीढ़ी को संस्कार देना है तो पहले घरों में सौहार्द का वातावरण बनाना होगा।

प्रतिस्पर्धा नहीं, सहयोग सिखाइए

आज बच्चों को आगे बढ़ना सिखाया जाता है, लेकिन साथ लेकर चलना कम सिखाया जाता है।

सफलता अच्छी बात है, लेकिन सफलता के साथ संवेदनशीलता भी आवश्यक है।

एक विद्यार्थी यदि कक्षा में प्रथम आए और साथ ही अपने मित्र की सहायता भी करे, तो वह केवल बुद्धिमान नहीं, संस्कारी भी है।

एक व्यापारी यदि लाभ कमाए और साथ ही ईमानदारी भी बनाए रखे, तो वह केवल सफल नहीं, आदर्श भी है।

सोशल मीडिया पर नहीं, वास्तविक जीवन में महान बनिए

आज लोग अपने जीवन से अधिक अपनी छवि को सजाने में लगे हैं।

दिखावा बढ़ रहा है और सरलता घट रही है।

याद रखिए—

लोग आपकी तस्वीरों को कुछ क्षण याद रखेंगे, लेकिन आपके व्यवहार को वर्षों तक याद रखेंगे।

अच्छा मनुष्य बनने का प्रयास कीजिए, प्रसिद्ध मनुष्य बनने का नहीं।

क्षमा और संवाद : टूटते समाज की दवा

आज रिश्ते छोटी-छोटी बातों पर टूट रहे हैं।

अक्सर समस्या गलतियों से नहीं, संवाद की कमी से पैदा होती है।

जहाँ संवाद बंद होता है, वहाँ संदेह शुरू होता है।

जहाँ संदेह बढ़ता है, वहाँ दूरी बढ़ती है।

और जहाँ दूरी बढ़ती है, वहाँ संबंध टूट जाते हैं।

इसलिए मतभेद होने पर भी बातचीत बंद मत कीजिए।

क्षमा करना सीखिए।

क्षमा केवल दूसरे को मुक्त नहीं करती, स्वयं को भी मुक्त करती है।

नए समाज के पाँच आधार

यदि हम सचमुच संस्कारमय समाज बनाना चाहते हैं, तो पाँच बातों को जीवन का हिस्सा बनाना होगा—

१. सत्य बोलना।

२. वचन में मधुरता रखना।

३. बड़ों का सम्मान करना।

४. आवश्यकता पड़ने पर दूसरों की सहायता करना।

५. प्रतिदिन कुछ समय आत्मचिंतन करना।

ये पाँच बातें किसी बड़े आंदोलन से अधिक प्रभावशाली सिद्ध हो सकती हैं।

युवाओं के लिए एक संदेश

प्रिय युवा मित्रों,

आप केवल अपने परिवार का भविष्य नहीं हैं।

आप समाज का भविष्य हैं।

आपके निर्णय आने वाले समय का वातावरण तय करेंगे।

इसलिए केवल सफल बनने का लक्ष्य मत रखिए।

ऐसे मनुष्य बनिए जिनकी सफलता से समाज को प्रेरणा मिले।

ऐसे नागरिक बनिए जिनके कारण परिवार मजबूत हों।

ऐसे व्यक्तित्व बनिए जिनके कारण लोग अच्छाई पर विश्वास करना सीखें।

एक अच्छा समाज अच्छे कानूनों से नहीं, अच्छे लोगों से बनता है।

अच्छे लोग अच्छे संस्कारों से बनते हैं।

और अच्छे संस्कार तब बनते हैं जब मनुष्य प्रतिदिन स्वयं को सुधारने का प्रयास करता है।

इसलिए आज से संसार को बदलने का संकल्प मत लीजिए।

केवल स्वयं को थोड़ा बेहतर बनाने का संकल्प लीजिए।

जब एक व्यक्ति सुधरेगा, तो एक परिवार सुधरेगा।

एक परिवार सुधरेगा, तो एक समाज सुधरेगा।

और जब समाज सुधरेगा, तब आने वाली पीढ़ियाँ गर्व से कह सकेंगी—

“हमें केवल सुविधाएँ नहीं मिलीं, हमें संस्कार भी विरासत में मिले हैं।”

यही सच्ची प्रगति है, यही सच्ची सफलता है, और यही एक उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला है।

पारसमल जैन
जोधपुर

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