श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

अन्न से ब्रह्म की यात्रा

हमारे शास्त्रों से निसृत ज्ञान और गुरुभगवन्तो की वाणी से अन्न का महत्त्व हम सुनते हुए आये है।
अन्न केवल उदरपूर्ति का साधन नही है, अपितु ईश्वरप्राप्ति का साध्य है। अन्न केवल क्षुधा शांत करने का जरिया नही अपितु अपने अन्तस्थ में विराजमान अधिदेव से आत्मसाक्षात्कार करने का माध्यम है।

कलियुग में अन्न को केवल पेट भरने तक सीमित कर दिया या फिर बाह्य सुंदर और सुडौल शरीर प्राप्ति का साधन मान लिया है।

हमारे गुरुभगवन्त और ऋषि मुनियों ने अन्न से ब्रह्म की यात्रा को तय किया है अर्थात अन्न के बल पर ईश्वरानुभूति ,ब्रह्मानुभूति की है। संयमित और सात्विक अन्न के बल पर उन्होंने निरापद जीवन और दीर्घायु प्राप्त की।

शुद्ध और संयमित अन्न के बल पर स्मरण शक्ति को चिरंजीवी बनाया।
शुद्ध अन्न से अभिप्राय पवित्र साधनों से, परिश्रम से कमाया धन, ईश्वर भाव से तैयार भोजन के बल पर हमारे महापुरुषों ने अपने आभामंडल के तेज और वाणी के ओज से लाखों जनो को अनुयायी बनाया।

आहार शुद्धो सत्वशुध्दि,
सत्वशुद्धि ध्रुवा स्मृति।
स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः।।

 

अर्थात:-
*आहार शुद्धौ सत्वशुद्धिः: शुद्ध (सात्विक, पवित्र और उचित) आहार करने से अंतःकरण यानी मन व बुद्धि शुद्ध होते हैं।सत्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः: अंतःकरण की शुद्धि से बुद्धि स्थिर और परमात्मा/लक्ष्य में निश्चल हो जाती है।
स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः: जब ऐसी स्मृति (चेतना) प्राप्त हो जाती है, तो मनुष्य के सभी संशय, भ्रम और सांसारिक बंधन (ग्रंथियां) टूट जाते हैं और उसे परम शांति (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।

भगवद्गीता में भी उल्लेख आता है कि हमे कैसा भोजन करना चाहिए जिससे हमारा इन्द्रीयबल ईश्वरोन्मुखी हो
आयुःसत्त्वबलारोग्य सुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराःसात्त्विकप्रियाः ॥

आयु, सत्व, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति बढ़ाने वाले, रसयुक्त, चिकने, स्थिर तथा मन को प्रिय लगने वाले भोजन सात्त्विक होते हैं।

हमारे यंहा कहते भी आये है
जैसा खाये अन्न
वैसा बने मन।

आज हम सबकी आहार चर्या कही ना कहीं दूषित हो गयी है। उसका कारण विरासत मिले सूत्रों का संरक्षण का अभाव है।

आहार की शुद्धि का ईश्वर प्राप्ति में बहुत महत्त्व है। हम भले ही कितनी ही ईश्वर आराधना करें, यदि हमारा आहार सात्विक व शास्त्र सम्मत नही है तो निश्चित मानिए की उससे हमे ईश्वरानुभूति नही हो सकती है।

अन्न से केवल ब्रह्म की यात्रा ही नही होती, अपितु हमारा शरीर निरोगी और तेजस्वी बना रहता है। शुद्ध अन्न ग्रहण करने से मन सधा हुआ रहता है, मन एकाग्र रहता है।
जितना महत्त्व शुध्द अन्न का है उससे ज्यादा महत्त्व सही समय पर भोजन ग्रहण करने का भी है।

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ||

अर्थात, जो व्यक्ति युक्त आहार और विहार करने वाला है, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाला है तथा परिमित शयन और जागरण करता है, ऐसे योगी का ‘योग’ उसके समस्त दुःखों का नाश कर देता है।

आइये हम संकल्प ले शुद्ध व सही समय पर भोजन करने का। निरोगी लम्बी आयु प्राप्त करे। आने वाली पीढ़ी को ऐसा कुछ दे जिसे वो भी भविष्य की सन्तति को कुछ धर्माधारित जीवनचर्या का महत्त्व स्थापित कर सके। अन्न से ब्रह्म की प्राप्ति का सुगम, सरल सहज और निरापद मार्ग जिसे हमारे गुरुभगवन्तो के द्वारा अनुभूत किया है, उसे बता सके।
हमारी पाक शाला (रसोई) से ही अच्छे स्वास्थ्य का मार्ग प्रशस्त होता है।
तामसिक भोजन का त्याग करें। सात्विक भोजन को अपनाए।

सादर।

पवन कुमार जैन परवेणी
मानसरोवर, जयपुर

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