श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

आत्मविकास के क्रमिक सोपान

जीवन विकासशील है। जीवन के विभिन्न पक्षों के विकास का आकलन विभिन्न माध्यमों से किया जाता है। शरीर सम्बन्धी विकास को शारीरिक विकास कहते हैं तथा मन सम्बन्धी विकास मानसिक विकास कहलाता है। इसी प्रकार, आत्मा सम्बन्धी विकास आत्मिक या आध्यात्मिक विकास कहलाता है। जैसे बाल, युवा, वृद्ध आदि अवस्थाओं में क्रम होता है; हेमन्त, शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद् आदि ऋतुओं में क्रम होता है, उसी प्रकार आध्यात्मिक विकास का भी अपना एक क्रम होता है- प्रथम भूमिका, द्वितीय भूमिका, तृतीय भूमिका आदि। जैन-दर्शन के अनुसार साधक ज्यों-ज्यों अपनी साधना की ऊँचाइयों का स्पर्श करता है, त्यों-त्यों उसकी आत्मा का विकास होता जाता है। इस क्रम का परिज्ञान होने से आत्मा की उन्नत और अवनत अवस्थाओं का पता चलता है तथा इससे आत्मविकास की साधना में भी बहुत सहायता मिलती है। इसीलिए जैनागम में आत्मा की विकास-यात्रा को गुणस्थानों द्वारा अत्यन्त सुन्दर ढंग से विवेचित किया गया है, जोकि न केवल साधक की विकास यात्रा की विभिन्न मनोभूमियों का चित्रण करता है, अपितु आत्मा की विकास यात्रा की पूर्व भूमिका से लेकर गन्तव्य आदर्श तक की समुचित व्याख्या भी प्रस्तुत करता है।

गुण-स्थान का अर्थ

मोह और मन, वचन, काय की प्रवृत्ति के निमित्त से उत्पन्न जीव के अन्तरङ्ग परिणामों की तारतम्यता को गुणस्थान कहते है। गुणस्थान आत्मिक गुणों के विकास को क्रमिक अवस्थाओं का द्योतक है। जीव के परिणाम सदा एकसे नहीं रहते। मोह और मन, वचन, काय की प्रवृत्ति के कारण जीव के अन्तरङ्ग परिणामों में प्रतिक्षण उतार-चढ़ाव होता रहता है। गुणस्थान आत्म-परिणामों में होने वाले इन उतार-चढ़ावों का बोध कराता है। साधक कितना चल चुका है तथा कितना आगे और चलनाहै? गुणस्थान इसे बताने वाला मार्ग – सूचक पट्ट हैं। गुणस्थान जीव के मोह और निर्मोह दशा की भी व्याख्या करता है। यह संसार और मोक्ष के अन्तर को स्पष्ट करता है। गुणस्थानों के आधार पर जीवों के बन्ध और अबन्ध का भी पता चलता है। गुणस्थान आत्म-विकास का दिग्दर्शक है।

जैनदर्शन के अनुसार जीवात्मा अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त सुख और अनन्त शक्ति स्वरूपी है, किन्तु अनादि कर्मों से बद्ध होने के कारण उसकी वे शक्तियाँ प्रकट नहीं हो पातीं। कर्मों का आवरण उसके मूल रूप को आवृत या विकृत कर लेता है। जितनी जितनी कर्म आवरण की घटाएँ सघन होती जाती हैं, उतनी-उतनी जीव शक्तियों का प्रकाश कम होता जाता है तथा इसके विपरीत जैसे-जैसे कर्म-पटल विरल होते हैं; वैसे-वैसे आत्मा की शक्ति प्रकट होती जाती है। जीव के परिणामों के उतार-चढ़ाव के अनुसार आत्मिक शक्तियों का विकास और ह्रास होता रहता है। यूँ तो परिणामों के उतार-चढ़ाव की अपेक्षा आत्मिक विकास के आरोहण और अवरोहण के अनन्त विकल्प सम्भव हैं फिर भी परिणामों की उत्कृष्टता और जघन्यता की अपेक्षा, उन्हें चौदह भूमिकाओं में विभक्त किया गया है, जो निम्नलिखित हैं –

गुण-स्थान के भेद

1. मिथ्यादृष्टि

2. सासादन

3. सम्यक् मिथ्यादृष्टि

4. असंयत सम्यक्दृष्टि

5. संयतासंयत

6. प्रमत्त-संयत

7. अप्रमत्त-संयत

8. अपूर्वकरण

9. अनिवृत्तिकरण

10. सूक्ष्म-साम्पराय

11. उपशान्तमोह

12. क्षीणमोह-वीतराग छद्मस्थ

13. सयोग-केवली

14. अयोग-केवली।’

यहाँ सम्यक् दृष्टि के साथ लगा असंयत विशेषण अपने से नीचे के सभी गुण-स्थानों में असंयतत्व व्यक्त करता है; क्योंकि वह अन्त दीपक है। इससे ऊपर के गुणस्थानों से संयम की यात्रा का सूत्रपात होता है। सम्यक्-दृष्टि पद ऊपर के सभी गुणस्थानों में नदी प्रवाह की तरह अनुवृत्ति को प्राप्त है अर्थात् आगे के समस्त गुणस्थान में सम्यक्-दर्शन पाया जाता है। छठे गुणस्थान में प्रयुक्त ‘प्रमत्त’ विशेषण अपने साथ नीचे के सभी गुणस्थानों में प्रमाद के अस्तित्व का द्योतनकरता है तथा उसके आगे जुड़े ‘संयत’ शब्द से यह सूचित होता है कि ऊपर के सभी गुणस्थान संयतों के ही होते हैं। बारहवें गुण-स्थान के साथ जुड़ा ‘छद्यस्थ’ शब्द भी अन्त-दीपक है, क्योंकि आवरण कर्मों के अभाव हो जाने से उससे आगे की भूमिकाओं में छद्यस्थता नहीं रहती।

त्रिविध आत्मा – उपर्युक्त चौदह गुणस्थानवर्ती जीवों में प्रथम से तृतीय गुण स्थान तक के जीव बहिरात्मा, चतुर्थ से बारहवें गुणस्थानवर्ती अन्तरात्मा तथा तेरहवें और चौदहवें गुण-स्थानवर्ती जीव परमात्मा कहे जाते हैं।

बहिरात्मा जीव – बहिरात्मा अवस्था में जीव देह और आत्मा को एक मानकर बाह्य ऐन्द्रिक विषयों में अनुरक्त रहते हैं। शरीर की उत्पत्ति को अपनी उत्पत्ति तथा शरीर के विनाश को अपना विनाश समझते हैं। इस प्रकार देह में ही आत्मा की भ्रान्ति बनाये रखने के कारण भव भ्रमण करते रहते हैं। मिथ्यात्व, सासादन और मिश्र गुण-स्थानवर्ती जीव क्रमशः उत्कृष्ट, मध्यम और जघन्य बहिरात्मा है, क्योंकि, बहिरात्मता का कारण मिथ्याभाव क्रमशः क्षीण होता जाता है।

अन्तरात्मा – अन्तरात्मा अवस्था में जीव आत्मा और देह की पृथक्ता को समझकर अन्तर्मुखी/निरासक्त जीवन जीता हुआ भव-बन्धन को काटने में जुट जाता है। अविरत सम्यदृष्टि जघन्य अन्तरात्मा है तथा निर्विकल्प ध्यान में स्थित क्षीण-मोही साधक उत्कृष्ट अन्तरात्मा कहलाते हैं। इससे बीच की अवस्था वाले सभी साधक मध्यम अन्तरात्मा कहलाते हैं।

परमात्मा – परमात्मा जीव की परम विशुद्ध दशा है। समस्त मोह आदि विकारों को नष्ट कर अपने स्वाभाविक आत्मिक गुणों को प्रकट कर लेने पर जीव को यह अवस्था प्राप्त होती है। परमात्मा जीवन-मुक्त और देह-मुक्त के भेद से दो प्रकार के होते हैं। तेरहवें और चौदहवें गुण स्थानवर्ती ‘अर्हन्त’ जीवन-मुक्त कहलाते हैं तथा देह-मुक्त अवस्था को प्राप्त परमात्मा ‘सिद्ध’ कहलाते हैं। सशरीरी और अशरीरी होने के कारण क्रमशः इन्हें सकल परमात्मा और विकल परमात्मा कहते हैं।

उपर्युक्त चौदह भूमिकाओं में प्रथम भूमिका जीव की निकृष्टतम दशा है। सभी संसारी जीव अनादिकाल से इसी दशा में हैं। इस भूमिका में आत्मिक शक्तियों का प्रकाश अत्यन्त मन्द होता है तथा बढ़ते-बढ़ते चौदहवें गुणस्थान में पहुँचकर जीवात्मा अपनी शुद्ध अवस्था को पूर्ण रूप से अभिव्यक्त कर लेता है।

जैन-दर्शन के अनुसार आत्मा के गुणों को आवृत करने वाले कर्मों में ‘मोह’ ही प्रधान है। इसकी तीव्रता और मन्दता पर ही अन्य आवरणों की तीव्रता-मन्दता होती है। इसी कारण से मोहनीय कर्मों के तीव्रता मन्दता के आधार पर ही गुण-स्थानों का विवेचन किया गया है।

क्रमश:–

मुनिश्री प्रमाणसागरजी महाराज

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