श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

मानव जीवन की कीमत : सुसंस्कारों से

जीवन का हर क्षण मूल्यवान है, कीमती व दुर्लभ है। हर प्राणी जीवन जीता है क्षुद्र से क्षुद्र प्राणी जीवन जी लेते है। परन्तु खाना-पीना, सोना-रोना, कमाना-धमाना मात्र इतना ही पर्याप्त नहीं। क्योंकि ऐसा तो हर प्राणी कर लेता है मनुष्य जीवन मिला है तो कुछ अच्छा कार्य करना चाहिए। एक सज्जन बोले महाराज ! मेरे पास तो फुर्सत ही नहीं घर, गृहस्थी, दुकान-मकान में व्यस्त हूँ और समय बचा तो ताश के पत्ते है। मैंने कहा समय बिताना या व्यस्त रहना मात्र महत्वशाली नहीं अपितु अच्छे कार्यो को कितना किया परमात्मा की भक्ति, पूजन, जप किया कि नहीं। मात्र लौकिक कार्य सच्चे सुख को पाने पर्याप्त नहीं। आम का फल चाहिए तो बीज भी आम के बोने पड़ेगे। बबूल के बीजों से कांटे ही मिलेगे फूल नहीं। ताश के पत्ते दुःख ही देगे। सुख नहीं। यदि सुख चाहिए तो भगवत् भक्ति करना ही होगी। इसीलिए माँ को कहा जाता है हे माँ! तू अपने बच्चे को अच्छे संस्कार दे दे ताकि वह एक अच्छा इंसान ही नहीं अपितु भगवान भी बन जाये क्योंकि –

“A Good mother is better than Hundered teachers.”

एक अच्छी संस्कारवान माँ 100 टीचर्स से बड़ी है। बालकों की प्राथमिक पाठशाला माँ की अंगुली है जिसके सहारे चलकर वह मन्दिर के द्वारे तक पहुँचता है। जीवन की ABCD माँ से सीखता है माँ कहती है- बेटा अपने से बड़ो के पैर छूना चाहिए, श्री व जी का प्रयोग करना चाहिए। आप कहकर बोलना चाहिए। माँ लोभ भी देती है तू मेरी बात मानेगा तो लड्डू दूंगी। बेटा लड्डू के लालच में सब स्वीकार लेता है। बेटा, माँ के दिये लालच में आकर स्कूल जाना सीख जाता है। और एक बार सुसंस्कार आ जाता है तो बच्चा बिना कहे ही पढ़ता-लिखता है। और ऐसा संस्कार वान बालक बड़ो के नाम के आगे बिना कहे ही आदरवाचक शब्दों का प्रयोग करता है। जहाँ संस्कार विहीनता हो वहाँ श्री, जी की जगह Hi, Hello, चलता है। और पाश्चात्यता की ओर झुकती संस्कृति उस संस्कार विहीनता की संस्कृति को स्वीकारती जा रही है। यदि ऐसा ही चलता रहा तो माता-पिता का सम्मान गिर जायेगा और नौकरो जैसी अवस्था आपकी हो जायेगी। अतः समय रहते ही जागिये! आँखों पर पड़े पाश्चात्यता के चश्में को उतारिये और भारतीय संस्कृति की आँखों से भारत को निहारिये। तब तो संस्कृति सुरक्षित रह सकती है अन्यथा संस्कृति खतरे में पड़ जायेगी। एक पुण्यानुबंधी पुण्य होता है पुण्य के उदय से सुन्दर संस्कृति में जन्म लिया और पुण्य को पुण्य में लगाना यानि संस्कृति को कायम रखना। संस्कारवान देश में जन्म लिया तो उन संस्कारों को कायम रखिये। यही संस्कारों को पाने की उपलब्धि है।

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