श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

आत्मयुद्ध की साधना” — प्रेरणात्मक एवं व्यावहारिक

भव्यात्माओ!
आज हम बाहर के युद्ध की नहीं, भीतर के युद्ध की बात कर रहे हैं।
दुनिया का युद्ध सीमाओं पर होता है, पर आत्मा का युद्ध संस्कारों और कषायों के बीच होता है।

👉 बाहर का युद्ध जीतने से राज्य मिलता है,
👉 पर भीतर का युद्ध जीतने से स्वराज्य मिलता है।

🔹 १. “स्वबल” — आत्मा की असली ताकत

जिस प्रकार कोई राष्ट्र बिना सहायता के खड़ा रहता है,
वैसे ही साधक को भी एक दिन समझना पड़ता है—

👉 “मुझे मेरी मुक्ति कोई और नहीं देगा, मुझे स्वयं ही जागना पड़ेगा।”

📌 उदाहरण:

एक व्यक्ति रोज कहता है—
“मुझे क्रोध बहुत आता है, लोग मुझे परेशान करते हैं।”

पर भव्यात्माओ!
सच्चाई क्या है?

👉 क्रोध “लोगों” से नहीं,
👉 हमारे भीतर के अहंकार से पैदा होता है।

एक संत ने कहा—
“तुम्हें कोई गुस्सा नहीं दिला सकता,
जब तक तुम्हारे भीतर गुस्से का बीज न हो।”

👉 इसलिए दोष बाहर मत खोजो,
अपने भीतर झाँको — यही स्वबल है।

🔹 २. “संतोष” — अभाव को समाप्त करने की कला

आज मनुष्य के पास सब कुछ है,
फिर भी वह कहता है—“कुछ कमी है…”

👉 यह कमी वस्तुओं की नहीं,
👉 संतोष की है।

📌 उदाहरण:

दो व्यक्ति हैं—

एक के पास 1 करोड़ है, पर वह और चाहता है → दुखी है

दूसरे के पास 10 हजार है, पर संतुष्ट है → सुखी है

👉 तो सुख धन से नहीं,
👉 मन की स्थिति से आता है।

महावीर स्वामी का संदेश है—
“परिग्रह (संग्रह) बढ़ेगा, तो दुःख भी बढ़ेगा।”

🔹 ३. “समता” — संकट में स्थिर रहने की साधना

जीवन में कभी भी परिस्थितियाँ बदल सकती हैं—

आज लाभ है, कल हानि

आज प्रशंसा है, कल निंदा

👉 जो इन दोनों में समान रहता है, वही समताधारी है।

📌 उदाहरण:

एक व्यापारी को अचानक बहुत बड़ा घाटा हुआ।
उसका मित्र बोला—“अब क्या होगा?”

वह मुस्कुराकर बोला—
👉 “जब लाभ हुआ था, तब भी शांत था,
👉 आज हानि हुई है, तब भी शांत हूँ।”

👉 यही समता है —
परिस्थिति बदले, पर मन न बदले।

🔹 ४. “निष्काम सेवा” — बिना अपेक्षा के देना

आज सेवा भी व्यापार बन गई है—

“मैंने इतना किया, मुझे क्या मिला?”

पर भव्यात्माओ!
जहाँ अपेक्षा है, वहाँ शुद्ध सेवा नहीं।

📌 उदाहरण:

एक व्यक्ति रोज मंदिर में दान देता था,
पर मन में सोचता—“मेरा नाम होना चाहिए।”

दूसरा व्यक्ति चुपचाप किसी गरीब की मदद करता था,
किसी को पता भी नहीं चलता।

👉 बताइए, सच्चा दान किसका है?

👉 जो दिखावे के लिए है, वह व्यवहार है
👉 जो निस्वार्थ है, वही धर्म है

🔹 ५. “आत्मनियंत्रण” — सच्ची स्वतंत्रता

आज लोग कहते हैं—“हम स्वतंत्र हैं…”

पर सोचिए—
👉 जो अपनी इंद्रियों का गुलाम है, वह स्वतंत्र कैसे?

📌 उदाहरण:

मोबाइल की आदत → नियंत्रण नहीं

स्वाद की लालसा → संयम नहीं

क्रोध आते ही फट पड़ना → धैर्य नहीं

👉 यह स्वतंत्रता नहीं,
👉 असली गुलामी है।

सच्ची स्वतंत्रता क्या है?

👉 “जब चाहो, तब रुक जाओ”
👉 “जब चाहो, तब स्वयं को नियंत्रित कर लो”

🔹 ६. “क्षमा और सुधार” — जीवन का परिवर्तन

दुनिया दंड देती है,
धर्म सुधार का मार्ग दिखाता है।

📌 उदाहरण:

एक बालक ने गलती की।
पिता ने उसे डाँटने के बजाय समझाया—

👉 “गलती से सीखो, दोबारा मत दोहराओ।”

वह बालक जीवनभर सुधर गया।

👉 इसलिए—

नफरत से नहीं

क्षमा और करुणा से परिवर्तन होता है

🔹 ७. “सरलता” — दिखावे से मुक्ति

आज जीवन दिखावे में उलझ गया है—

बड़ा घर

महंगे कपड़े

ऊँचा स्टेटस

पर अंदर से मन अशांत है।

📌 उदाहरण:

एक साधु के पास कुछ नहीं था,
पर वह प्रसन्न था।

एक अमीर व्यक्ति के पास सब कुछ था,
पर वह तनाव में था।

👉 क्यों?

👉 क्योंकि सुख वस्तुओं में नहीं,
👉 सरलता और संतोष में है।

🔹 ८. “धर्म का वास्तविक स्वरूप”

धर्म केवल पूजा या अनुष्ठान नहीं है—

👉 धर्म है—

सत्य बोलना

अहिंसा रखना

लोभ छोड़ना

क्षमा करना

📌 उदाहरण:

एक व्यक्ति रोज मंदिर जाता था,
पर घर में क्रोध करता था।

दूसरा मंदिर नहीं जाता था,
पर सबके साथ प्रेम से रहता था।

👉 बताइए, सच्चा धार्मिक कौन?

👉 धर्म बाहर की क्रिया नहीं,
👉 भीतर की स्थिति है।

🌼 अंतिम संदेश — “आत्मविजय ही महाविजय”

भव्यात्माओ!
यदि हम—

क्रोध पर विजय पा लें

लोभ को त्याग दें

अहंकार को मिटा दें

👉 तो समझो, हमने संसार जीत लिया।

“जो स्वयं को जीत लेता है,
उसे फिर किसी को जीतने की आवश्यकता नहीं रहती।”

✨ मर्मबिंदु:

“बाहरी युद्ध से इतिहास बनता है,
पर आत्मयुद्ध से मोक्षमार्ग बनता है।”

आप सबकी आत्मा जाग्रत हो, समता स्थिर हो,
और जीवन में सच्चा आनंद प्रकट हो — यही मंगल भावना है। 🙏

पारस मल जैन,
जोधपुर

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