मनुष्य आदिकाल से जबतक क्रमिक विकास करता आ रहा है । उसके विकास की तीन वृत्तियां उपलब्ध हैं__जिज्ञासा, बुभूसा और चिकीर्षा।
जिज्ञासा– वह प्रतिदिन नये नये तथ्य जानना चाहता है ।
बुभूषा–वह कुछ होना चाहता है अपने आप को बदलना चाहता है। जैसा है वैसा ही नहीं रहना चाहता है
चिकीर्षा–वह कुछ करना चाहता है ।
मनुष्य बनना चाहता है, कुछ होना चाहता और कुछ करना चाहता है इन तीन वृत्तियों ने विकास के क्रम को आगे बढ़ाया है । आज विकास का क्रम बहुत ऊंचे शिखर तक पहुँचा हुआ है और विकास के लिए उसने माध्यम बनाया शिक्षा को ।
शिक्षा प्रत्येक विकास की अधिष्ठात्री रही है । शिक्षा का मूल अर्थ है अभ्यास। आज यह अर्थ विस्मृत हो गया है आज शिक्षा का अर्थ है अध्ययन । अभ्यास दो प्रकार का होता है–ग्रहणात्मक अभ्यास और आसेवनात्मक अभ्यास। पहले गृहण करो, जानो फिर उसका आसेवन करो प्रयोग करो । शिक्षा इन दो चरणो मे चलती थी । पहला चरण था “ग्रहण” और दूसरा चरण था आसेवन । जानना भी शिक्षा है पर जानना मात्र ही शिक्षा नहीं है । आसेवन भी शिक्षा है और यह शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग है । धर्म की शिक्षा प्राप्त करने का भी यही क्रम है और बौद्धिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए भी यही क्रम है ।
आज धर्मजगत के समक्ष यह प्रश्न रह रह कर उभर रहा है कि आज धर्म का असर क्यों नहीं हो रहा है?
एक व्यक्ति ने एक साधक के पास जाकर पूछा– क्या कारण है कि आज धर्म का असर नहीं होता ?
साधक ने पूछा – राजगृह यहां से कितनी दूर है ?
उसने कहा दो सौ कौस ।
तुम जानते हो ?
हां, मै जानता हूं ।
क्या तुम अभी राजगृह पहुँच गये ?
पहुँचा कैसे? अभी तो यहां हूं । चलूंगा तब पहुँचूंगा।
बस यही बात धर्म के लिए है । लोग धर्म को जानते हैं पर जबतक उनके नियमो पर नहीं चलेंगे, उस और प्रस्थान नहीं करेंगे तब तक धर्म का असर कैसे होगा ।
इसी संदर्भ मे एक मार्मिक कहानी है यही प्रश्न शिष्य ने गुरु से पूछा । गुरुदेव लोग इतना धर्म ध्यान करते है अनंत धर्म हैं इतने मंदिर और प्रतिमाएं हैं । आये दिन नये नये धार्मिक अनुष्ठान होते है फिर भी जगत में कहीं शान्ति का नाम नहीं । घोर अनाचार और अत्याचार है क्या अब धर्म का असर नहीं होता?
गुरु समयज्ञ थे । उन्होंने कहा वत्स, जाओ और एक घड़ा शराब का ले आओ।
शिष्य शराब का नाम सुनते ही आवाक् रह गया । मन ही मन सोचा, यह कैसी मांग ? गुरु और शराब। वह देखता रह गया ।
गुरु ने कहा, देखते क्या हो ? जाओ एक घड़ा शराब ले आओ ।
वह गया । शराब से भरा हुआ एक घड़ा ले आया । गुरु के समक्ष रखकर बोला– आज्ञा का पालन कर लिया है
गुरु बोले यह सारी शराब पीओ ।
शिष्य और अधिक अचंभे में पड़ गया ।
गुरु बोले – देखो एक बात का ध्यान रखना । शराब पीना, पर उसे गले के अंदर मत उतारना । तत्काल कुल्ला कर देना ।
शिष्य ने शराब पीना प्रारंभ किया । मुंह में लेता और तत्काल थूक देता । देखते देखते घड़ा खाली हो गया ।
तुझे नशा आया कि नहीं ?
गुरुदेव ! नशा तो बिल्कुल नहीं आया
अरे ! एक घड़ा शराब का पी गये और नशा नहीं आया ।
गुरुदेव नशा तो तब आता जब शराब गले के नीचे उतारता। एक बूंद भी गले के नीचे नहीं उतरी ।
बस यही बात धर्म करने वाले लोगो के साथ है । वो धर्म को गले से नीचे नहीं उतारते । उपर ही उपर रखकर थूक देते हैं तो भला उसका प्रभाव कैसे हो सकता है । उसका नशा कैसे चढ़ सकता है ।
(आचार्य महाप्रज्ञ की किताब जीवन विज्ञान से साभार)
विनीत
हरीश मधु जैन बक्शी
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