वैसे जल का स्वभाव शीतल है, किन्तु अग्नि के निमित्त से जल उष्ण हो गया और उबलने लगा । एक समझदार व्यक्ति जिसे प्यास लगी थी और उसे प्रासुक पानी पीना था सो उसने अग्नि के संयोग से सर्वप्रथम पानी को अलग किया पश्चात जल्दी शीतल करने के लिए उसको पंखे की हवा दी । इस प्रकार पानी को ठंडा करके शुद्ध प्रासुक पानी को पीकर अपनी प्यास बुझा ली ।
उसी समय एक मंदबुद्धि व्यक्ति यह सब कुछ देख रहा था । एक बार उसके सामने भी ऐसी ही परिस्थिति बनी और वह व्यक्ति उस विवेकी व्यक्ति का अनुसरण करते हुए, उस उबलते हुए गर्म जल को पंखे की हवा करते हुए, शीतल करने में बहुत परिश्रम कर रहा था किन्तु वह जल शीतल नहीं हो रहा था । जब एक ज्ञानी पुरुष से उसने समाधान पूछा तो उसकी सबसे बड़ी अज्ञानता पर उसने कहा, “हे भाई ! अग्नि के संयोग में रखकर तुम कितने ही पंखे, कितने ही समय तक चलाओ, तुम्हारा जल ठंडा नहीं होगी । सर्वप्रथम जल को अग्नि के संयोग से दूर करो तो थोड़े समय बाद सहज ही वह उष्ण जल शीतल हो जायेगा और यदि अधिक जल्दी है तो पंखा चलाकर जल्दी शीतल कर लो ।”
उसी प्रकार अनादिकाल से ही इस जीव का स्वभाव तो ज्ञानानंद स्वरूप शीतल ही है, किन्तु यह जीव अनादिकाल से ही परद्रव्य के साथ एकत्व-ममत्व करके प्रति समय पर्याय में कषाय रूपी अग्नि से तप्तायमान हो रहा है ।
ज्ञानी जीव तो आगम के अभ्यास से, तत्त्वज्ञान पूर्वक भेदविज्ञान की दृष्टि से, सर्वप्रथम स्व शुद्धात्मा का निर्मल शीतल चैतन्यमयी स्वभाव जानकर, पश्चात उससे भिन्न सम्पूर्ण विश्व के सभी पदार्थों को पर जानकर, उनसे एकत्व-ममत्व तोड़कर, सहज शीतल स्वरूप को पर्याय में भी प्राप्त करते हैं । शीघ्र पूर्ण स्वाभाविक परिणमन हो, इसके लिए बारह भावना, वैराग्य भावना, सोलहकारण भावनाओं का चिंतन-मनन रूप पंखा करते हुए, निर्ग्रन्थ वीतरागी दशा धारण करते हुए शीघ्र ही निज शुद्धात्मा में रमण करते हुए, पर्याय में पूर्ण निर्मलदशा को प्राप्त होते हैं ।
किन्तु अज्ञानी जीव, ज्ञानी जीव की बाह्य क्रिया का अनुसरण करते हैं, सुख-शान्ति प्राप्त करने के लिए, किन्तु अंतरंग में निज चैतन्य स्वभाव में अहं न करके प्रति समय पर पदार्थों में अहं बुद्धि और ममत्व बुद्धि करके मिथ्या अहंकार से जलते रहते हैं और मात्र वचन-काया से बारह भावना आदि का पंखा चलाकर परिणति में शीतलता प्राप्त करना चाहते हैं तो वह कैसे सम्भव है ?
अतः शाश्वत शीतल ज्ञानानंद स्वभाव को पहिचान कर, उसमें ही अपनत्व करके, उसके आश्रय से परिणति में शीतलता प्राप्त करें ।
पुस्तक का नाम – ज्ञान का चमत्कार ।
लेखक – वाणीभूषण पं ज्ञानचन्द जी जैन, विदिशा ।