श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

जैन सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य :-

इतिहास का यह सबसे बड़ा सत्य आज भी अधिकांश किताबों से गायब है। सम्राट अशोक के पौत्र और चंद्रगुप्त मौर्य के वंशज — चक्रवर्ती जैन सम्राट संप्रति (224 ई.पू. – 215 ई.पू.) न केवल मौर्य साम्राज्य के महान शासक थे, बल्कि भारत के पहले पूर्ण जैन धर्मावलंबी सम्राट भी थे।

उनके शासनकाल में मौर्य साम्राज्य की सीमाएं उत्तर में मध्य एशिया, तिब्बत, और भूटान से लेकर पूर्व में असम तथा दक्षिण में तमिलनाडु तक फैली हुई थीं।

उनके काल में साम्राज्य भले ही मौर्य वंश का था, लेकिन राजा और प्रजा — दोनों का धर्म जैन धर्म था। राजा स्वयं जैन धर्म के सिद्धांतों का कठोरता से पालन करता था और उसके आदर्शों से संपूर्ण प्रजा भी प्रेरित होकर उसी धर्म के पथ पर चलती थी। यह वह काल था जब जैन धर्म केवल राजदरबार तक सीमित नहीं था, बल्कि समाज के हर वर्ग में गहराई से व्याप्त था।

कहा जा सकता है कि सम्राट संप्रति के शासनकाल में संपूर्ण भारतवर्ष में जैन धर्म का प्रभाव सर्वोच्च स्तर पर था। वास्तव में, यही वह युग था जब “राजधर्म” शब्द का प्रादुर्भाव हुआ — जहाँ राजा का निजी धर्म ही राज्य की नीति और प्रजा के आचरण का आधार बनता था। दुर्भाग्यवश, बाद के युगों में इस शब्द का अर्थ और उपयोग कई रूपों में बदलता चला गया।

लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है। इतिहासकारों के अनुसार, जब सम्राट संप्रति की शक्ति और जैन धर्म का प्रभाव हिमालय पार पहुँचा और तिब्बत-भूटान जैसे क्षेत्रों में उनकी सत्ता स्थापित हुई।

जैन सम्राट संप्रत्ति के बढ़ते प्रभाव से चीन के वांग वंश के सम्राट भयभीत हो उठे। अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए वांग वंश ने तुरंत हजारों किलोमीटर लंबी दीवार का निर्माण आरंभ कराया — वही दीवार जिसे आज “ग्रेट वॉल ऑफ चाइना” के नाम से जाना जाता है और जो आधुनिक विश्व के सात आश्चर्यों में से एक मानी जाती है।

सम्राट संप्रति प्रतिदिन एक नवीन जैन मंदिर की नींव रखवाने के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करते थे। कहा जाता है कि दक्षिण भारत का शायद ही कोई प्राचीन जैन तीर्थ ऐसा हो, जहाँ सम्राट संप्रति द्वारा स्थापित मूर्ति या मंदिर न हो।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि सम्राट संप्रति ने तलवार से नहीं, अपने धर्म, आचरण और संकल्प से इतिहास की दिशा बदली।

आज समय है कि हम महान जैन धर्म की उन विस्मृत महान विरासतों को पुनः पहचानें, जो केवल इतिहास की पुस्तकों में नहीं, बल्कि हमारी स्मृति, स्वाभिमान और संस्कृति में जीवित रहनी चाहिए। सम्राट संप्रति को शत् शत् नमन — जो भारत की जैन परंपरा के अद्वितीय प्रकाश स्तंभ थे।

 

त्रिभुवन जैन
कोटा

Leave a Reply