श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

बाहर मेला अंदर अकेला

आज दुनिया में जहां जाओ वहां भीड़ नजर आती है ! जिधर देखो उधर ऐसा लगता है जैसे मेला लगा हुआ हो! इस भीड़ भाड़ वाली दुनिया में जिसे देखो वह भागने में लगा हुआ है! कोई इधर भाग रहा है, कोई उधर भाग रहा है, जैसे मानो भागने की कोई होड़ मची हुई है! हर कोई एक दूसरे से आगे निकलने की कोशिश कर रहा है लेकिन क्या हमें पता है कि हमें जाना कहां है, हम क्यों भाग रहे हैं, किसके लिए भाग रहे हैं ! अगर किसी से पूछा जाए कि हम क्यों भाग रहे हैं तो शायद अधिकांश लोगों के पास इसका कोई जवाब भी नहीं है कि वह क्यों भाग रहे हैं, लेकिन फिर भी भागने में लगे हुए हैं!

दुनिया में इतनी भीड़ होने के बावजूद इंसान अंदर से अकेला हो गया है! आज का इंसान अंदर से बिल्कुल खाली है! हर इंसान भीड़ में खड़ा होकर भी अपने आप को अकेला महसूस करता है !उसे ऐसा लगता है की दुनिया में उसका कोई नहीं है और फिर भी न जाने कौन सी आपाधापी में लगा हुआ है ! हर इंसान चाहता है कि मैं सारी दुनिया को अपने मुट्ठी में कर लूं सारी दुनिया का खजाना बस मेरे पास हो दुनिया का सबसे अमीर इंसान मैं बन जाऊं !बस इसी आपाधापी में अपना पूरा जीवन निकाल देता है और अंत में इस दुनिया की भीड़ को यही छोड़कर अकेला चला जाता है और जाते-जाते कुछ प्रश्न दुनिया के चिंतन के लिए छोड़ जाता है कि हम क्यों भाग रहे हैं किसके लिए भाग रहे हैं कब तक भागते रहेंगे आखिर इस भाग दौड़ का अंत क्या है! लेकिन इन प्रश्नों का उत्तर हम खोज ही नहीं रहे हैं बस भाग रहे हैं !

अकेलापन एक अभिशाप है तो दूसरी दृष्टि से अकेलापन वरदान भी है! इस दुनिया में कोई किसी का नहीं है, भीड़ है लेकिन भीड़ में हर व्यक्ति अकेला है और यह अकेलापन इंसान के लिए अभिशाप बना हुआ है! लेकिन अकेलापन इंसान के लिए वरदान भी बन सकता है , अगर इंसान एकांत को स्वीकार कर ले और अपनी आत्मा के अस्तित्व को जानने की कोशिश करें !अपने अंदर डूब जाए और एक आध्यात्मिक यात्रा पर निकल पड़े !

भारत हमेशा से एक आध्यात्मिक देश के रूप में जाना जाता है, यहा की भूमि को संत और महात्माओं की भूमि के रूप में देखा जाता है! यहां न जाने कितने महान संत हुए हैं जिन्होंने अपनी आत्मा में डूब कर परम आनंद का अनुभव किया है! इन संतों ने एकांत में बैठकर गहन साधना कि हैं , अपने ध्यान और तपस्या के बल पर अपने जीवन को उन्नति के पद पर लेकर गए हैं ! उन्होंने अकेलेपन को वरदान बनाया है !

अब हमारे ऊपर है कि हम अकेलेपन को अभिशाप बनाएं या उसे वरदान बना ले! जब तक हम बाहर की दुनिया को देखते रहेंगे तब तक हमारा अकेलापन हमारे लिए अभिशाप बना रहेगा और जब हम बाहर की दुनिया से अपने अंदर के परमात्मा को देखना शुरू कर देंगे तो हमारे लिए यही अकेलापन वरदान साबित हो सकता है! बस जरूरत है एक सही सोच और सही दिशा की !

 

महेंद्र कुमार जैन (लारा)
शिवाजी पार्क अलवर

Leave a Reply