श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

मुनि दीक्षा के सम्बन्ध में पं. गोपालदास वरैयाजी के विचार

पंडित गोपालदास वरैया अपने समय के अद्वितीय विद्वान् थे। ये युगदृष्टा थे। उन्होंने मुरैना में जैन महाविद्यालय की स्थापना की तथा उसके माध्यम से अनेकों जैन विद्वान् तैयार किए। आज हम अपने जितने भी वृद्ध विद्वानों के नाम जानते हैं ये उनके गुरुओं के भी गुरु थे।

पंडितजी आगरा के रहने वाले थे। पंडितजी का जन्म वि.सं. 1923 में आगरा में हुआ था। बाद में वे व्यापार के लिए मुरैना चले गये थे तथा वहीं पर जैन महा-विद्यालय की स्थापना की थी। पंडितजी ने अपने जीवन में पांच अणुव्रतों का पूर्ण निष्ठा के साथ पालन किया। उन्होंने सत्य को अपने जीवन में आत्मसात कर लिया था। उन्होंने न कभी झूठ बोला और न ही झूठ का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समर्थन किया। वे वस्तुतः घर में रहते हुए भी एक संत थे। उनका देहान्त 51 वर्ष की अवस्था में वि.स. 1974 (सन् 1917) में हो गया था। उन्होंने समाधिपूर्वक मरण किया था।

जनवरी सन् 1900 में ‘बम्बई प्रान्तीय जैन महासभा’ का मुख पत्र ‘जैन मित्र’ का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। पंडितजी इस पत्र के पहले सम्पादक थे तथा 15 जुलाई 1908 तक इस पत्र का सम्पादन किया। इस पत्र के माध्यम से उन्होंने जन-चेतना जाग्रत करने के सफल प्रयास किए। वे बड़े प्रखर वक्ता, शास्त्रार्थी एवं तार्किक थे। अनेक अजैन विद्वानों से उन्होंने शास्त्रार्थ किया था तथा उन्हें परास्त किया था। इनकी तार्किक शैली की सराहना हिन्दी के महान विद्वान् पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपनी पत्रिका ‘सरस्वती’ में भी की थी।

उसी काल में ‘दिगम्बर जैन महासभा’ का पत्र ‘जैन गजट’ भी निकलता था। इसके सम्पादक प. जगल किशोर मुख्तार थे। इस समय दिगम्बर साधुओं का अभाव था। प्रत्येक धार्मिक व्यक्ति की यह भावना रहती थी कि दिगम्बर साधु के दर्शन हो जाये। इसी संबंध में  प. जुगलकिशोरजी ने अपनी भावना व्यक्त करते हुए एक कविता जैन गजट में प्रकाशित करवाई थी। इस बात का उल्लेख पं. जुगलकिशोरजी ने स्वयं अपने एक लेख “स्मरणीय प. गोपालदासजी वरैया” में किया है। इस लेख में उन्होंने आगे जो लिखा था उसे हम नीचे उद्धृत कर रहे हैं-

“इधर अपने देश में अरसे से दिगम्बर जैन साधु मुनियों के अभाव को देखकर मेरे हृदय में जो एक प्रकार की वेदना खलती थी उसे व्यक्त करने के लिए मैंने एक कविता लिखी थी और उसे 1 जुलाई 1908 के ‘जैन गजट’ अंक 25 में प्रकट किया था। वह कविता इस प्रकार है-

साधु का दर्शन कहीं पाता नहीं। दिल दुखी है दुख सहा जाता नहीं।।

धर्म की चर्चा थी उनसे जा-ब-जा। धर्म अब ढूंढा नजर आता नहीं।।

बात घट घट की बता देते थे जो। उनके देखे बिना सबर आता नहीं।।

प्राण छोड़े पर न छोड़ा धर्म जिन। उनका यश मुख से कहा जाता नहीं।।

किससे अब पूछे कि क्या होगा कल। भेद भावी का कोई पाता नहीं।।

लुप्त सद्विद्या हुई संसार से। ज्ञान बिन दुखड़ा भरा जाता नहीं।।

कीम की किश्ती भंवर में आ फंसी। साधु तारक बिन तिरा जाता नहीं।।

डूबने को अबहि वह तैयार है। दृश्य यह हमसे लखा जाता नहीं।।

जी में आता है कि मैं साधु बनूं। साधु बिन साधु बना जाता नहीं।।

इस कविता के प्रकाशित होने के कुछ अर्से के बाद समाज में दो एक दिगंबर मुनियों का आविर्भाव हुआ, उनके वाह्य आचार को देख कर लोग बड़े प्रसन्न हए और कुछ दृश्यों को देखकर चौथा काल आ गया ऐसा कहने लगे। परन्तु जब उनका अंतरंग प्रकट हुआ और कुछ काले कारनामे में पकड़े गये तब पंडित गोपालदासजी वरैया ने दुखित चित्त होकर बड़ी दृढ़ता के साथ यह वाक्य कहा था-

‘वरं शून्याशाला न खलु वरो दुष्ट वृषभः ।’

अर्थात् शून्या शाला अच्छी, गौशाला का खाली पड़े रहना श्रेष्ठ, परन्तु दुष्ट वृषभ को मरखने बैल को रखकर उसे आबाद करना अच्छा नहीं।

इस वाक्य में कितना ही महत्व का रहस्य छिपा हुआ है, जिसे विज्ञ पाठक स्वयं समझ सकते हैं। ऐसे ही दम्भी साधुओं तथा उनके पिछलग्गू भ्रष्ट चारित्र पण्डितों के द्वारा निर्मल जिन शासन मलिन हुआ है।”

तो यह था पं. जुगलकिशोरजी के एक लेख का अंश। इससे हम पंडित गोपालदास जी के मुनियों के संबंध में अभिमत को समझ सकते हैं। इतना ही नहीं, पं. गोपालदासजी ने मुनि दीक्षा लेने के संबंध में अपने शिष्यों को क्या सलाह दी, इसे हम पं. श्री मुन्नालालजी रांधेलीय (सागर) के एक लेख गुरुवर्य का आशीर्वाद से उद्धृत कर रहे है। इस लेख में रांधेलीय जी लिखते हैं –

“जब हम अनेक सहपाठी पढ़कर वापिस आने लगे तब पूज्य गुरुवर्य जी से आशीर्वाद लेने और आगे के कर्तव्य का निर्देशन पाने के उद्देश्य से विनम्र प्रार्थना की गई। उन दूरदर्शी महात्माजी ने सहज स्वभाव से आशीर्वाद दिया और अग्रिम मार्ग का प्रदर्शन किया कि ‘तुम सद्-गृहस्थ बनकर रहना और यदि व्रत धारण करने के भाव हों तो 10वीं प्रतिमा तक ही सीमा रखना, कारण कि अवारकाल में आगे के व्रतों का यथार्थ निर्वाह होना दुष्कर है, भले ही लोग माने या न मानें-करें परन्तु तुम लोग देखा-देखी में नहीं पड़ना’ इत्यादि । हम लोगों को बड़ी प्रसन्नता हुई और आजकल हम वही उपदेश शिरोधार्य कर रहे हैं। अन्य लोगों का भी कर्तव्य है कि अपने दूरदर्शी नेता (गुरु) की शिक्षा का आदर करें और उनके स्थापित पौधे (विद्यालय) की हर तरह से सहायता देकर हरा-भरा उन्नतिल बनायें।”

पंडित गोपालदासजी वरैया की इस शिक्षा को प्रायः उनके सभी शिष्यों ने स्वीकार किया। संभवतः उनका कोई भी शिष्य मुनि दीक्षित नहीं हुआ। हालांकि उनके कई शिष्य बाल ब्रहाचारी ही रहे। इसका अर्थ यह नहीं था कि ये मुनि धर्म को गलत मानते थे। उन्होंने स्वयं समाधि-मरण किया था। इस बात का प्रत्यक्षदर्शी पंडित जगन्मोहनलाल जी शास्त्री (कटनी) ने किया है। लेकिन उस समय ही उन्होंन महसूस कर लिया था कि मुनिधर्म पालन करना बहुत ही मुश्किल है। यह बात तो आज से लगभग 100 वर्ष पहले की है। उस समय संभवतः मुनियों में उस स्तर का शिथिलाचार नहीं होगा जितना आज देखने में आता है। आज यदि पंडितजी हमारे बीच होते और आज मुनियों की चर्यायें देखते तो उन पर क्या बीतती। पहले भी लिख चुके हैं कि आज की परिस्थितियों में नग्न दिगम्बर साधुओं का विहार करना उचित नहीं है। ऐसा होने पर आम जनता में उपहास का माहौल बनता है और धर्म का मजाक बनता है। आज की परिस्थितियों में दसवीं प्रतिमा तक व्रत पालन करने का पंडितजी ने आदेश दिया था। हमें उनके इन विचारों का समुचित आदर करना चाहिए।

डॉ अनिल कुमार जैन
बापू नगर जयपुर

Leave a Reply