श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

वृद्धावस्था वरदान है या बोझ

हमारे पूर्वज और शास्त्र ये कहते रहे है कि वृद्धावस्था अनुभवों और अनुभूत घटनाओं का गुणसमुच्च्य होता है।
हम भाग्यशाली है यदि हमें अपने जीवन के प्रत्येक कालखंड में माता पिता का सानिध्य मिलता है। उनकी वृद्धावस्था हमारे लिए वरदान है यदि हम उनके अंतिम समय तक साथ रहे।

शिशु, किशोर, तरुण, प्रौढ़ और वृद्धावस्था ये मनुष्य की आयु के काल खंड है। और ये ध्रुव सत्य है कि जिसने जन्म लिया है उसे इन आयु खंडों से गुजरना है । अंतिम पड़ाव वृद्धावस्था से मोक्ष प्राप्ति के मार्ग पर जाना है।
जिस प्रकार बेटी घर की रंगोली और रौनक होती है उसी प्रकार वृद्ध माता पिता भी घर के वटवृक्ष होते है जो घर के सभी सदस्यों को समान भाव से शीतल छांया देते है। केंद्र में रहकर सभी को परिवार से अनन्य भाव से जोड़े रखते है। साथ मे सुख दुख में अपने नेक अनुभवों से हमे संकट के समय में समस्या से बाहर निकालने का सामर्थ्य भी रखते है।

लेकिन पिछले दो ढाई दशकों से परिवारों में ये केंद्रबिंदु अर्थात बुजुर्ग माता पिता की देखभाल, उनकी सदेच्छाओ की पालना, उनके अनुभवों से दूरी बनाना, जीवन की अन्तिमावस्था में जिम्मेदारियों को पूर्ण करना जैसे भावों में बहुत बड़ी कमी देखी जा रही है।

आज बुजुर्ग माता पिता घर मे मूक दर्शक बनकर जीवन जीने को मजबूर है। या तो उन्हें ऐसे स्थान पर रखा जाता है जहाँ निर्जन हो जैसे घर का वो हिस्सा जहाँ कोई नही जाता हो और घर मे आने जाने वाला कोई दिखाई नही देता हो या उन्हें अकेले रहने को अपने हाल पर जीने को छोड़ दिया जाता है। फिर वो ही संताने कहती है कि मैं सेवा कर रहा हूं।

शास्त्रों में सेवा का अर्थ है माता पिता की आज्ञा पालन करना, माता पिता के पास बैठना उन्हें धैर्य से सुनना, उनकी सदेच्छाओ को पूर्ण करना, उन्हें देवदर्शन करवाना, उन्हें अपने समक्ष आयु के मित्रों और रिश्तेदारों से मिलवाना, उनकी बातों को नही काटना, उनके विचारों को सम्मान देना।

लेकिन आज घरों मे बुजुर्गों का अपमान होते देखना आम बात है। हमे ये नही भूलना चाहिए कि हमारी इच्छाओं की पूर्ति के लिए उन्होंने अपना जीवन हमारे लिए खपा दिया, अपना जीवन अभाव में, सीमित आवश्यकताओं मे जीकर हमारे लिए आहूत कर दिया।
हमे शिशु से अच्छा कमाने वाला इस दुनिया मे सम्मान से जीने लायक बना दिया।
हमे ये भी नही भूलना चाहिए कि हम अजर नही रहने वाले। आयु के पड़ाव ने किसी को नही छोड़ा है। जरावस्था हमे भी आने वाली है।

हमे ये भी नही भूलना चाहिए हम जैसा बोयेंगे वैसा फल हमे मिलने वाला है।
यदि हम अपने आचरण से अपने बच्चों को सिखाएंगे तो वो ज्ञान उसमें स्थायी रहेगा।
अर्थात हमारी कथनी और करनी में समानता रहे।
उपदेश से दिया ज्ञान मनुष्य के अंतःकरण में ठहरता नही है। फिर हमारे साथ भी वो ही होगा जैसा हम कर रहे है।

फिर ये तय मानिए कि वो ही हमारी स्थिति होगी जैसी हम अपने पूजनीय माता पिता के साथ अपने व्यावहार से कर रहे है।

माता पिता जीवन में बाधक नहीं, अपितु हमारे जीवन के साधक है।

माता पिता बोझ नही अपितु अनुभवों का खज़ाना हैं ।
माता पिता एक देहमात्र नही अपितु जीवित साक्षात भगवान है।
माता पिता केवल हमारे जन्मदाता भर नही,अपितु हमारे सुंदर जीवन के शिल्पकार भी है।

जिसको नही देखा हमने कभी(भगवान)।
पर उसकी जरूरत क्या होगी।।
हे! माँ तेरी सूरत से अलग,
भगवान की मूरत क्या होगी।।

भारतीय जीवन दर्शन में धर्म को कर्तव्य, कर्म से जोड़कर देखा जाता है, न कि केवल कर्मकांड रूपी पूजा अभिषेक, मंदिर के दर्शन करने मात्र से। मंदिर जाकर देवदर्शन का भाव है कि, हे!ईश्वर मुझे परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति जो कर्तव्य कर्म है उन्हें पूर्ण करने का सामर्थ्य मुझ में भरदे।
मैं अपने दायित्वों को आनन्द और उत्साह से निर्वहन कर सकूँ।
भगवान को हम सब मानते है लेकिन भगवान की कही हुई बातों पर अमल नही करते। मंदिर को केवल कर्मकांड का हिस्सा भर नही मानना, अपितु परमपिता परमेश्वर की आज्ञा को शिरोधार्य रखना ये अध्यात्म है।
मेरा मन्तव्य इतना ही है कि हमे अपने पूर्वजों और शास्त्रों से सीख लेकर अपने जन्मदाता माता पिता को उत्कृष्ट गुणवत्ता का सम्मान देना। उनकी आत्मा को उनकी आज्ञा पालन कर तृप्त करना।
प्रतिदिन उनके साथ बैठकर अच्छा समय बिताना।
साक्षात ईश्वर मानकर उन्हें सम्मान से रखना।
जिम्मेदारियों से मुंह नही मोड़ना अर्थात भागना नही अपितु ईश्वरीय कार्य समझ कर जिम्मेदारी का निर्वहन करना।

उनकी छोटी छोटी आवश्यकताओं का ध्यान रख कर पूर्ति करना।
निस्वार्थ भाव से ईश्वरीय कार्य समझ कर सेवा करना।
उन्हें अकेले नही छोड़ना अपने साथ रखना।
जिस घर मे मिलता है सम्मान बुजुर्गों को।
उस घर मे रहती रिश्तों में सुरभि और सुगंध है।।
जिस घर मे कद्र है माता पिता की।
उस घर मे रहता है ईश्वर स्थायी निवास बनाकर।।
जिस घर में लिया जाता है लाभ।
माता पिता के अनुभवों का।।
उस घर का होता है।
मंगलगान चारो ओर।।

माता पिता को ईश्वर का रूप मानकर सेवा भाव से अमूल्यावसर समझकर अवसर को भुनाये।

सादर
पवन कुमार जैन परवेणी

This Post Has One Comment

  1. Vinod Kumar Jain

    Nice, today is time of IT so such type of things easy to store and useful 👌

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