आवश्यकता, स्वरूप, महत्व एवं लाभ–
सरलता, सौम्यता, सदाचार, संतोष, विनय आदि, मानव जीवन रुपी वाटिका के सुरभित सुमन है। इनमें विनय गुण सबसे महत्वपूर्ण है। यह धर्म का मूल है, मोक्ष का सोपान है, आत्मा का निज स्वभाव है जो अहंकार के गलने पर प्रकट होता है।विनय एक आभ्यन्तर तप है।
आज हमारे चारों ओर अशान्ति एवं तनाव का वातावरण है। भष्ट्राचार, स्वछन्दता एवं उदण्डता बढ़ रही है।ऐसे विषम समय में सुख शान्ति पूर्वक जीने के लिए तथा अपने को सदगुणो की सौरभ से सुरभित करने के लिए विनय की महती आवश्यकता है। विनय ही वह सद्गुण है जो हमे योग्य नागरिक, सुयोग्य पुत्र, प्रिय शिष्य तथा सबका प्रीति पात्र बनाता है। विनय हमारे जीवन को संस्कारित करता है तथा हमे तनाव मुक्त जीवन देता है। क्योकि मनुष्य का अंहकार ही उसे दुखी करता है और विनय के आने पर अंहकार रहता नहीं है अतः हम सुख एवं शांति को प्राप्त करते हैं।विनय वह साधन है जो विशेष रूप से गुणों कीऔर लेजाता है। धर्म की और ले जाता है तथा मोक्ष की और लेजाता है।
व्यवहार में बड़ों का सम्मान करना उनकी आज्ञा का पालन करना। सामजिक मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करना विनय है।
जैन सिद्धान्त दीपिका के अनुसार “अनाशातना बहुमान करणं च विनय” अर्थात आशातना नही करना ओर योग्य व्यक्तियों का सम्मान करना विनय है।
नीति वाक्यामृत के अनुसार व्रत, विधा एवं उम्र में बड़ों के सामने नम्र आचरण करना विनय है। निश्चय में – आत्म स्वरूप को समझकर आत्म गुणो का सम्मान, करना विनय है।
विनय आत्मा की अंहकाररहित अवस्था है। विनय का अर्थ मात्र शरीर को झुकाना ही नहीं है। शरीर को माता पिता गुरुचरणों में झुका देने का अर्थ है अपना सारा जीवन अर्पण कर देना, समर्पित कर देना मै अपने विचार अपनी भावनाएं अपना जीवन सब आपको समर्पित कर रहा हूं। यदि मात्र हाथ जुड़े और मन ना जुड़े तो हाथ जोडने का क्या (महत्व) मूल्य है? formilityमें हाथ जोड़ने से नम्रता नहीं टपकती अन्तर ह्रदय की श्रद्धा नही बोलती वन्दन भावनाओं से होता है। किसी को अपना बनाना चहाते है तो अपने आपको उनके चरणो मे समर्पित कर दो। उनकी आज्ञाओं का पालन करो, उनके इशारों का ध्यान रखो फिर तुम जो चाहोगे वही पाओगे।
विनय से शत्रु भी मित्र बन जाते हैं। बाल गंगाधर तिलक ने कहा नम्रता पूर्वक व्यवहार से और सहनशीलता से मनुष्य तो क्या पशु-पक्षी भी आपके वश में हो जाते हैं। सचमुच विनय एक वशीकरण मंत्र है ।नम्र व्यवहार व नम्र वचन सबको प्रिय लगते है। नम्र स्त्री का घर भर में शासन चलता है। वह सब को प्रशन्न रखती है।
जिस घर में विनय नहीं उस घर मे शांति, आनन्द व साम्य नहीं रह सकता वहाँ अशांति क्लेश, ईर्ष्या, द्बेष आदि दुर्गुण रहेंगे। जहां समर्पण,अपनत्व है आत्मीय भाव है वहा कभी कोई कमी नहीं रह सकती है। वहाँ दुख, अंशांति व कलह पास नहीं फटकता हैं।
विनय के प्रकार-
ज्ञान विनय, दर्शन विनय, चरित्र विनय, मन विनय वचन काया व ल़ोकोपचार विनय।
श्रीचन्द जैन
पूर्व महामंत्री
अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा।