आज जब पूरा विश्व अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मना रहा है, तब यह आत्ममंथन का भी अवसर है कि बढ़ती उम्र के साथ हमारी सेहत क्यों घटती जा रही है। आधुनिक जीवनशैली ने सुविधाएँ तो बढ़ाई हैं, लेकिन शारीरिक सक्रियता, मानसिक शांति और संतुलित जीवन को पीछे छोड़ दिया है। परिणामस्वरूप मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग और तनाव जैसी समस्याएँ कम उम्र में ही दस्तक देने लगी हैं।
वास्तव में उम्र बढ़ना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, परंतु सेहत का बिगड़ना हमारी जीवनशैली की देन है। यदि हम नियमित योग, प्राणायाम और ध्यान को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बना लें, तो बढ़ती आयु के साथ भी शरीर और मन को स्वस्थ एवं ऊर्जावान बनाए रख सकते हैं।
योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक समग्र पद्धति है। यह शरीर, मन और आत्मा के बीच संतुलन स्थापित करता है। योग हमें अनुशासन, संयम और सकारात्मक सोच की प्रेरणा देता है। यही कारण है कि आज भारत की यह प्राचीन धरोहर पूरी दुनिया में स्वास्थ्य और कल्याण का प्रतीक बन चुकी है।
दुर्भाग्य से हम योग दिवस पर एक दिन सामूहिक योगाभ्यास कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं, जबकि वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब योग को उत्सव नहीं, बल्कि जीवन का नियमित संस्कार बनाया जाए। प्रतिदिन केवल 30 मिनट का योग भविष्य की अनेक बीमारियों से बचाव का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
बढ़ती उम्र को बोझ नहीं, अनुभव और परिपक्वता का उत्सव बनाना है तो स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी होगी। योग इस दिशा में सबसे सरल, सस्ता और सर्वसुलभ उपाय है।
आज के योग दिवस पर संकल्प लें कि हम केवल अपनी आयु नहीं बढ़ाएँगे, बल्कि अपने जीवन की गुणवत्ता भी बढ़ाएँगे। ऐसा हो कि आने वाले वर्षों में यह कहावत बदल जाए— “उम्र बढ़ी, सेहत भी बढ़ी।”
विजेंद्र कुमार जैन
जयपुर