धर्म समस्त मानवजाति के लिए हितावह है। उसमें सबका हित निहित होता है। जैनधर्म में न केवल मानवजाति अपितु प्राणिमात्र के प्रति मैत्रीभाव को स्थान दिया गया है। पारस्परिक ईर्ष्या-द्वेष का धर्म में कोई स्थान नहीं होता। धर्म तो सबके प्रति क्षमा एवं मैत्री को प्रवाहित करता है। धर्म में कोई हीन और कोई उच्च नहीं होता । आत्मकल्याण एवं विश्वकल्याण के लिए धर्म की सही समझ और उसका सम्यक् आचरण आवश्यक होता है। धर्म क्षेत्र में शिथिलता एवं दोष का प्रवेश होने पर समय-समय पर उसे निर्दोष बनाने हेतु पुनरुद्धार या क्रियोद्धार भी होते रहे हैं। यह सब होते हुए भी ईर्ष्या-द्वेष एवं हीनता – उच्चता के भावों को धर्म का अंग नहीं माना गया।
धर्म की धारा सम्प्रदायों के माध्यम से प्रवाहित होती है, किन्तु धर्म के स्थान पर जब सम्प्रदाय प्रमुख बन जाते हैं तो उनमें परस्पर मतभेद एवं संघर्ष प्रारम्भ हो जाते हैं। हर सम्प्रदाय अपने को उचित एवं सही तथा दूसरे सम्प्रदाय को भ्रान्त ठहराने का प्रयत्न करता है। एक दूसरे के प्रति उनमें सद्भाव की विरलता होती जाती है। विश्व में ईसाई धर्म की रोमन कैथोलिक एवं प्रोटेस्टेंट सम्प्रदायों, इस्लाम धर्म की शिया और सुन्नी सम्प्रदायों के मध्य बृहद् स्तर पर संघर्ष एवं युद्ध होते रहे हैं। बौद्ध धर्म की थेरवाद एवं महायान सम्प्रदायों में मतभेद हैं, परस्पर संघर्ष है, किन्तु उसका बृहद रूप युद्ध के रूप में प्रकट नहीं हुआ।
जैनधर्म भी मुख्यतः दिगम्बर और श्वेताम्बर सम्प्रदायों में विभक्त है। इनमें मूल सिद्धान्तों को लेकर एकता होते हुए भी व्याख्या एवं आचारगत मतभेद हैं। परस्पर सौहार्द में उतनी कमी नहीं है। महावीर जयन्ती, संथारा, अल्पसंख्यकता, जैनत्व आदि कई मुद्दों पर मिलकर काम करने के लिए सब एक भी हो जाते हैं। कई मतभेद आचार्यों के द्वारा स्थापित एवं प्रतिष्ठित किये जाते हैं। गृहस्थ श्रावक-श्राविका उनके प्रभाव में आकर अन्य सम्प्रदाय को अपने से हीन समझने लगते हैं तथा पारस्परिक व्यवहार में भी कहीं-कहीं उसकी झलक दिखायी देती है। आज जैनधर्म की दिगम्बर सम्प्रदाय के अन्तर्गत बीस पन्थ, तेरहपन्थ, तरणतारण पन्थ आदि उपसम्प्रदायें विद्यमान हैं। श्वेताम्बर सम्प्रदाय में भी स्थानकवासी, मूर्तिपूजक एवं तेरापन्थ उपसम्प्रदायें कुछ मतभेदों के साथ चल रही हैं। मूर्तिपूजकों में भी तपागच्छ, खरतरगच्छ, अंचलगच्छ, त्रिस्तुतिक आदि अनेक गच्छ बने हुए हैं। इनमें भी तपागच्छ जैसे कुछ गच्छों में अनेक आचार्य हैं जिनमें परस्पर ऐक्य नहीं है। स्थानकवासी परम्परा गुजरात, मारवाड़, मेवाड़, मालवा, पंजाब आदि क्षेत्रों तथा आचार्यों या गच्छाधिपतियों के आधार पर बँटी हुई है। इन सबमें परस्पर समन्वय की कमी देखी जाती है। इनमें पारस्परिक सहयोग नहीं, अपितु आशंकाओं का भाव गहराता जा रहा है। पारस्परिक दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं। मूल सिद्धान्तों के एक होते हुए भी शाखाओं, प्रशाखाओं का निरन्तर निर्माण हो रहा है।
सम्प्रदाय का होना बुरा नहीं है। भगवान महावीर की देशना को जन-जन तक पहुँचाने के लिए सम्प्रदायों का बड़ा योगदान हो सकता है। सम्प्रदाय के लिए अंग्रेजी शब्द School है। ज्ञान का वितरण इन सम्प्रदायों के माध्यम से अधिकाधिक लोगों तक होना सम्भव है। अध्यात्मयोगी, युगमनीषी पूज्य आचार्यप्रवर श्री हस्तीमलजी म.सा. सम्प्रदाय को एक व्यवस्था मानते थे, जो अपने नेश्रायवर्ती सन्त सती समुदाय के ज्ञान, दर्शन, चारित्र के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु प्रचलित है। इस सम्बन्ध में आप सेना की बटालियनों का उदाहरण देकर फरमाते थे कि जिस प्रकार सेना की अलग-अलग बटालियनों की अलग-अलग व्यवस्था होती है, परन्तु सबका कार्य देश की रक्षा का होता है, इसी प्रकार अलग-अलग सम्प्रदायें व्यवस्था मात्र हैं, सबका कार्य जिनशासन की रक्षा एवं गौरव की अभिवृद्धि करना है। अन्य सम्प्रदायों के साथ कषाय भाव रखना उन्हें कभी इष्ट नहीं रहा। वे प्रत्येक सम्प्रदाय में गुणिजनों को देखकर प्रमोदभाव व्यक्त करते थे । सम्प्रदायों के सम्बन्ध में आचार्य श्री के विचार आज भी प्रासंगिक हैं। ज्ञान- दान एवं धर्मोपदेश के लिए उपयोगी होने पर भी अहंकार, स्वार्थ, मान-प्रतिष्ठा की लिप्सा के कारण सम्प्रदायों में विकृति उत्पन्न हो जाती है।
अनेक दिगम्बर आचार्य एवं सन्त मुनिराज इस बात का प्रबल उपदेश करते हैं कि वस्त्रधारी साधक कभी मुनि नहीं होता और न ही उसका मोक्ष सम्भव है। बार-बार इसका श्रवण कर गृहस्थ जनों में भी यह धारणा घर कर जाती है कि श्वेताम्बर साधु वेश धारण करते हैं अतः वे मुनि नहीं हैं और न ही उनका मोक्ष सम्भव है। आचारांगसूत्र में जिस प्रकार अचेल अर्थात् निर्वस्त्र निर्ग्रन्थ मुनि का मोक्ष में जाना स्वीकार किया गया है उसी प्रकार सचेल अर्थात् वस्त्रधारी मुनि का भी मोक्ष माना गया है। उत्तराध्ययन (2.13) में भी कहा गया है-
एगयाचेलए होइ, सचेले यावि एगया।
एयं धम्महियं नच्चा, नाणी नो परिदेवए ।।
जिनकल्पदशा में अथवा वस्त्र न मिलने पर मुनि अचेलक भी होता है और स्थविरकल्प दशा में वह सचेलक भी होता है। दोनों को धर्महित जानकर मुनि दुःखी न हो। तीर्थंकर पार्श्वनाथ की परम्परा में तो साधु सवस्त्र ही होते थे । मोक्ष का सम्बन्ध कषाय क्षय से है, वस्त्रों से नहीं। वस्त्रहीन तो सभी पशु-पक्षी एवं जलचर जीव भी होते हैं, किन्तु इससे उनका मोक्ष नहीं हो जाता। आत्मा, कर्मसिद्धान्त, अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, अनेकान्त आदि के प्रतिपादन में श्वेताम्बर एवं दिगम्बर दोनों परम्परायें प्राय: समान हैं। श्वेताम्बर परम्परा में वस्त्रधारण भी संयम की रक्षा के लिए मान्य किया जाता है वह भी मर्यादित रूप में । शरीर, वस्त्र, पात्र आदि के प्रति मूर्च्छा भाव को परिग्रह कहा गया है। मूर्च्छा एक प्रकार से वस्त्र आदि के प्रति राग या आसक्ति की सूचक है। दिगम्बर या श्वेताम्बर मुनि बन जाने के पश्चात् भी आभ्यन्तर परिग्रह पर विजय प्राप्त करना शेष रहता है। मिथ्यात्व मोहनीय, क्रोध, मान, माया एवं लोभ, हास्य, रति, अरति, भय, शोक, जुगुत्सा एवं त्रिविध वेद को आभ्यन्तर परिग्रह माना गया है। इन आभ्यन्तर परिग्रह पर विजय की चर्चा छोड़कर मात्र वस्त्र की चर्चा करने से पारस्परिक द्वेष एवं असौहार्द उत्पन्न होते हैं जो मुक्ति में बाधक बनते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि मुनि का दिगम्बरत्व रूप श्रेष्ठ है, किन्तु श्वेताम्बर परम्परा में जो कई मुनि आडम्बर नहीं करते वैसे आडम्बरों की भरमार दिगम्बर मुनियों के यहाँ देखी जाती है। लोकैषणा उनके चित्त में समाहित रहती है। दिगम्बर धारणा में स्त्री का मोक्ष नहीं माना जाता उसका एक प्रमुख कारण उसका निर्वस्त्र न होना भी है। श्वेताम्बर परम्परा स्त्री का मोक्ष मानती है और श्वेताम्बर आगमों में तीर्थंकर मल्ली भगवती, चन्दनबाला आदि अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं। स्त्री में भी कषाय – विजय की उसी प्रकार क्षमता होती है जिस प्रकार पुरुष में। षट्खण्डागम में मनुष्यणी में भी चौदह गुणस्थान माने गये हैं। इसका तात्पर्य है कि दिगम्बर परम्परा में भी स्त्री का मोक्ष स्वीकार्य रहा है, किन्तु बाद में स्त्री को मोक्ष के लिए अक्षम माना गया है। इस प्रकार की छोटी-छोटी मान्यताएँ परस्पर सौहार्द में बाधक बन जाती हैं। वैचारिक क्षेत्र में मान्यता भेद सम्भव है, इनका परस्पर खण्डन मण्डन भी होता रहा है, किन्तु मतभेदों के होते हुए भी पारस्परिक मैत्री एवं सौहार्द के भाव का बना रहना धर्म का स्वरूप है। उसमें कमी होना एवं विरोधी विचारों से सम्पृक्त होना धर्म से विमुख होना है।
दिगम्बरों में पूजा पद्धति को लेकर तेरहपन्थ एवं बीसपन्थ में मतभेद के कारण परस्पर टीका टिप्पणियाँ चलती रहती हैं। जिससे समाज में परस्पर सौहार्द एवं सद्भाव दूषित होते हैं। कानजीस्वामी एवं श्रीमद् राजचंद्र की परम्पराएँ कुन्दकुन्दाचार्य के मूल ग्रन्थों की व्याख्या भिन्न प्रकार से करती हैं। कानजीपन्थ में निश्चयनय को प्रधानता दी गयी है। दिगम्बर परम्परा में निश्चय एवं व्यवहार दोनों को समान रूप से स्थान दिया गया है। श्रीमद् राजचंद्र ने आत्मसिद्धि शास्त्र जैसे स्वतन्त्र ग्रन्थों की भी रचना की है जिनकी विवेचना को इस परम्परा में विशेष महत्त्व दिया गया है। तरणतारण पन्थ मूर्तिपूजा को नहीं मानता वहाँ शास्त्र ही पूज्य हैं। उन्हीं का स्वाध्याय आत्मोद्धारक माना गया है। श्वेताम्बर एवं दिगम्बरों में सम्मेदशिखर आदि पावन स्थानों को लेकर भी परस्पर संघर्ष चलते रहे हैं। इनका समाधान सद्भाव एवं मैत्री के भावों को प्रोत्साहन मिलने पर सहज सम्भव है, पारस्परिक दूरियाँ बढ़ाने से नहीं ।
श्वेताम्बर परम्परा में स्थानकवासी एवं मूर्तिपूजकों में मूर्तिपूजा को लेकर गहरा मतभेद है। आगम साहित्य की दृष्टि से दोनों के आगम समान हैं। आगमों की मान्य संख्या में अवश्य भेद है। मूर्तिपूजक परम्परा में 45 या 84 आगम माने गये हैं जबकि स्थानकवासी एवं तेरापन्थ परम्परा 32 आगम मान्य करती है। मूल सिद्धान्त आगमों पर आधारित होने से उनमें मतभेद नहीं है, किन्तु मन्दिर, मूर्तिपूजा आदि कतिपय बिन्दुओं को लेकर मतभेद हैं। स्थानकवासी परम्परा पूजा पद्धति में हिंसा मानती है एवं भाव विशुद्धि के लिए सामायिक, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय आदि को महत्त्व देती है । आगमों का समान आधार होने से इनमें ऐक्य भी है। पूर्व में इन उपसम्प्रदायों में जो कटुता थी, वह अब कम होती जा रही है। मूर्तिपूजक परम्परा भी खरतरगच्छ, अचलगच्छ, तपागच्छ, त्रिस्तुतिक आदि के रूप में कतिपय बिन्दुओं को लेकर विभक्त है। सबके अपने मन्दिर हैं। खरतरगच्छ परम्परा में दादाबाड़ी की अवधारणा है जो उनके दादागुरुओं के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति है । तपागच्छ परम्परा इस समय सबसे अधिक साधु-साध्वियों से युक्त है। समस्त जैन सम्प्रदायों में मिलाकर जो 18 हजार से अधिक साधु- साध्वी हैं उनमें सर्वाधिक साधु-साध्वी तपागच्छ के हैं। सभी जैन परम्पराओं को जैन समाज में स्थान प्राप्त है। सभी के उपासक विद्यमान हैं।
स्थानकवासी परम्पराओं में पारस्परिक स्पर्धा देखी जा रही है। स्पर्धा के साथ जब द्वेष जुड़ जाता है तो पारस्परिक मैत्री एवं सौहार्द में स्वतः कमी आ जाती है। अन्य परम्पराओं को भी महत्त्व देकर धर्म का सच्चा स्वरूप प्रस्तुत किया जाये तो उससे जन-जन का भी उद्धार सम्भव है तथा जिनशासन की भी प्रभावना हो सकती है। अपने को श्रेष्ठ एवं अन्य को हीन समझने का भाव वस्तुतः धर्म का स्वरूप नहीं हो सकता । स्थानकवासियों में आज शिथिलता और कठोर आचार की पालना दोनों के दर्शन होते हैं। यह सही है कि शिथिलता का समर्थन नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे धर्म की हानि होती है, किन्तु कठोर आचार का पालन करने वाला शिथिल साधुओं के प्रति द्वेषपूर्ण एवं अमानवीय व्यवहार करे तो इसे भी धार्मिक कृत्य नहीं कहा जा सकता। कभी ऐसा सुनने में आता है कि कुछ स्थानकवासी परम्पराओं के श्रावक-श्राविका श्रमणसंघीय साधु-साध्वियों को आहार आदि देने में भी संकोच करते हैं। यह उनके साथ धर्म के नाम पर अमानवीय व्यवहार है। कुछ साधु-साध्वी जहाँ जाते हैं वहाँ लोगों को अपने संघ की आम्नाय में शामिल करने का प्रयत्न करते हैं। नये लोगों को जैनधर्म का सन्देश देने की अपेक्षा जैनों को इधर-उधर कर लेने से सम्प्रदाय का हित भले ही नज़र आता हो, किन्तु इससे धर्म की तो हानि ही होती है।
परस्पर तोड़फोड़ एवं भेद को बढ़ावा देने की नीति से जैनधर्म की हानि हो रही है। आज समस्त जैन सम्प्रदायों को एक सुर से जैनत्व के महत्त्व को एवं धर्म के सही स्वरूप को प्रतिपादित करने की आवश्यकता है। जैनधर्म सनातन है। यह वैदिक परम्परा से स्वतन्त्र होते हुए भी सभी परम्पराओं के साथ सौहार्द एवं मैत्री को बढ़ावा देता है। इसलिए जैनधर्म विभिन्न संकटों को सहन करके भारत में आज भी जीवित है। इसमें समय- समय पर क्रियाकाण्ड के जड़त्व एवं शैथिल्य को दूर करने के प्रयत्न होते रहे हैं। इसकी आवश्यकता निरन्तर बनी रहती है। जैनधर्म पावन धर्म है जो समस्त मानवजाति को कल्याण एवं मैत्री का मार्ग प्रशस्त करता है। इसमें किसी के भी प्रति द्वेष को स्थान नहीं है। उत्तरोत्तर धर्म के सही स्वरूप को प्रज्ञापूर्वक प्रस्तुत कर सम्प्रदायों के संघर्ष को मिटाकर परस्पर सौहार्द की गंगा बहाने की आज महती आवश्यकता है।
डॉ. धर्मचन्द जैन
प्रधान संपादक
हिंदी मासिक, जिनवाणी