श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

परीषह- प्रविभक्ति

परीषह का अर्थ है-

धर्मपालन करते समय आने वाले कष्टो को धर्मपथ से विचलित न होकर निर्जरा के लिए धर्मबुद्धि से समभावपूर्वक सहन करना।

कष्ट तो सभी संसारी जीवो के साथ लगे हुए हैं किन्तु अन्तर इतना ही है कि एक तो कष्टों के आने पर शोकादि से प्रभावित हो उठता है, राग द्वेष आदि करता है, जबकि दूसरा अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थिति में सम और शान्त रहकर सब कुछ समभाव पूर्वक सहता है, राग देष या हर्ष- शोक आदि से प्रभावित नहीं होता। यही कष्टसहिष्णुता या तितिक्षा परीषह ‌विजय रूप धर्म है।

जब तक साधक कष्टसहिष्णु नहीं होगा, तब तक विनय धर्म की सम्यक आराधना नही कर सकेगा । परीषह-सहन और कायक्लेश-तप में अन्तर है। संचित कर्मो की स्वेच्छा से उदीरणा करके उन्हें क्षय करने हेतु शरीर से आसन, आतापना, केशलोच आदि के कष्ट सहना कायक्लेश-तप है। जबकि कर्म के उदय से आये हुए भूख, प्यास रोग आदि कष्टों को धर्मपथ से विचलित न होते हुए निर्जरा के लिए समभावपूर्वक सहन करना परीषह-सहन है।

काय क्लेश शारीरिक कष्ट तक ही सीमित रहता है, जबकि परीषह में आक्रोश, अलाभ, सत्कार, अज्ञान आदि के रूप में मानसिक कष्ट भी समाविष्ट है। कायकलेश के अभ्यास से शारीरिक दुःख को सहने की क्षमता, शारीरिक सुखों के प्रति अनाकांक्षा और क्वचित् प्रवचन – प्रभावना भी होती है, जबकि परीषह-सहन करने से अहिंसादि धर्मो की सुरक्षा धर्म पर डटे रहने की दृढ़ता एवं कर्मों की निर्जरा होती है।

परीषहो के स्वरूप और सहिष्णुता से मिलने वाले लाभालाभ को सुन समझकर उन्हें अभ्यास से परिचित और पराजित करना चाहिए, किसी भी परीषह से आक्रान्त होने पर मुनि को श्रमण धर्म की मौलिक मर्यादाओं से विचलित एवं व्यथित नहीं होना चाहिए, बल्कि परीषह- सेना के समक्ष एक शूरवीर योद्धा की तरह डटे रहकर शान्ति, धैर्य एवं समभाव से उसका सामना करना चाहिए। परीषहो को धैर्य, शान्ति एवं समभाव से सहने वाला मुनि प्रचुर मात्रा में कर्मों की निर्जरा करता हुआ आत्मा को विशुद्ध बनाकर मोक्ष मार्ग की साधना में प्रगति करता है।

मोक्ष प्राप्ति के लिए संयम पथ पर चलने वाले साधक के लिए परीषह बाधक नहीं, किन्तु श्रमण धर्म के साधक, धर्मत्राता एवं उपकारक होते हैं। इसलिए सच्चा साधक परीषहो के आने पर उद्विग्न, चिन्तित, विक्षुब्ध एवं धैर्यच्युत नहीं होता किन्तु शरीर और आत्मा के भेद विज्ञान के प्रकाश में वह वस्तु-स्थिति का ज्ञाता-द्रष्टा बनकर उन्हें शान्ति एवं समभाव से सहत्ता है। परीषहो के द‌बाव में आकर साधक अपनी स्वीकृत संयम मर्यादाओं से एक इंच भी इधर उधर नहीं होता। वह विघ्न बाधाओं के सामने चट्टान की तरह दृढ रहता है, उनके समक्ष हार कर घुटने नहीं टेकता, किन्तु अपने उत्कृष्ट तप, त्याग एवं संयम के बल पर उन्हें पराजित करके वह श्रमण धर्म को सुरक्षित रखता है।

परीषह सहन का अर्थ शरीर मन या इन्दियों को मारना या व्यर्थ कष्ट देना नहीं है, न ही आये हुए कष्टो को लाचारी से सहना है और न संयम मर्यादाओं को भंग करके उनका प्रतिकार करना है और न प्रतिकुलताओ से घबराकर इधर-उधर भागना है, और न वातावरण के प्रभाव में बहना है
और न ही कष्टों से बचने का कोई ग़लत दोषयुक्त मार्ग अपनाना है। किन्तु तन मन की आदतों इन्द्रियों की विषयानुकूलताओं तथा सुख सुविधाओं की लालसाओं को विवेकपूर्वक छोडकर प्रत्येक प्रतिकूल परिस्थिति को प्रसन्नतापूर्वक स्वेच्छा से निर्भय एवं निर्द्वंद्व होकर स्वीकार करना है।

निम्नलिखित 22 परीषहों का उल्लेख उत्तराध्ययन सूत्र के द्वितीय अध्याय में किया गया है-
1. क्षुधा परीषह

२- पिपासा परीषह

3- शीत परीषह

4- उष्ण परीषह

5- दंशमशक परीषह

6- अचेल परीषह

7- अरति परीषह

8- स्त्री परीषह

9 – चर्या परीषह

10- निषद्या परीषह

11- शय्या परीषह

12- आक्रोश परीषह

13- वध परीषह

14- याचना परीषह

15- अलाभ परीषह

16- रोग परिषह

17- तृणस्पर्श परीषह

18- जल्ल (मल) परीषह

19-सत्कार-पुरस्कार परीषह

२०- प्रज्ञा परीषह

21- अज्ञान परीषह

२२- दर्शन परीषह

उपरोक्त परिषहों में से प्रत्येक परीषह को समभावपूर्वक सहन करना चाहिए।

इन बाइस परीषहों में से क्षुधा, पिपास, शीत उष्ण आदि बीस परीषह तीव्र परिणाम वाले होने से आचारांग में इन्हे प्रतिकूल अर्थात “उष्ण” कहा गया है।

तथा स्त्री और सत्कार- पुरस्कार ये दो परीषह मन्द परिणाम वाले होने से अनुकूल अर्थात “शीत” कहें गए हैं।

सभी बाइस परीषह ज्ञानावरणीय, दर्शन-मोह, चरित्रमोह, अन्तराय और वेदनीय, इन चार कर्मो के उदय से होते हैं।

प्रज्ञा और अज्ञान में ज्ञानावरणीय कर्म के उदय से, अलाभ परीषह अन्तराय कर्म के उदय से, दर्शन परीषह दर्शन मोहनीय के उदय से तथा अरति, अचेल, स्त्री निषधा याचना, आक्रोश और सत्कार- पुरस्कार ये सात परीषह चरित्रमोह के उदय से होते हैं। शेष ग्यारह परीषह वेदनीय कर्म के उदय से उत्पन्न होते हैं। 7वे गुणस्थान तक तो ये सभी परीषह हो सकते हैं, किन्तु दसवें गुणस्थान में चरित्र मोहनीय के उदय से अरति आदि सात तथा दर्शन- मोहनीय के उदय से उत्पन्न होने वाले दर्शन परीषह के सिवाय शेष चौदह परीषह होते हैं। छ्द्मस्थ वीतराग यानी ग्यारहवें – बारहवें गुणस्थान वर्ती मुनि में भी ये चौदह परीषह सम्भव है। केवली में केवल वेदनीय कर्म के उदय से होने वाले ग्यारह परीषह पाये जाते हैं।

उत्तराध्ययन सूत्र से-

श्रीचन्द जैन
पूर्व राष्ट्रीय् महामंत्री अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

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