जैसा कि सब जानते हैं कि श्रीरामकृष्ण परमहंस परम तपस्वी परम ज्ञानी परम साधक परम भक्त ऋषि हुए है।कहते हें परमात्मा को उन्होंने पा लिया था।
एक आदमी श्री रामकृष्ण परमहंस के पास आया। वह हजार सोने की अशर्फियां उन्हें भेंट करने का संकल्प कर के ही आया था। उसने उनके चरणों में सोने के सिक्कों से भरी वह थैली रख दी। और बोला कि मुझे यह आपको देनी है इन्हें स्वीकार करें।
श्रीरामकृष्ण ने कहा कि ठीक है अब तू ले आया है तो लौटाऊंगा नहीं, नहीं तो तू बुरा मान जाएगा।सोने के सिक्कों से भरी थैली अपने हाथ में ले ली। उन्होंने कहा कि अब यह मेरी हो गई। उस आदमी ने कहा कि हां अब यह आपकी हो गयी। श्रीरामकृष्ण परमहंस ने उस आदमी से कहा कि अब तू इतना काम और कर दे मेरी तरफ से इनको ले जाकर गंगा में डालआ।वह आदमी भोंचक रह गया।बड़ा असमंजस मै था कि में सही सुन तो रहा हूं।
गंगा कोई ज्यादा दूर नहीं थी, वह आदमी थैली ले कर गंगा की तरफ गया।काफी समय हो गया पर लौटा नहीं। काफी समय इंतजार करने के बाद श्री रामकृष्ण ने कहा कि अरे जरा जाकर तो देखो अभी तक लौट कर नहीं आया। उन के दो शिष्य जब उस आदमी की खोज में गंगा की तरफ जाने लगे तो श्री रामकृष्ण ने कहा चलो मै भी साथ चलता हूं।गंगा के किनारे पर वह आदमी बैठा दिखाई दिया वह वहां पर एक-एक अशर्फी को बजा बजा-बजाकर खनका- खनका कर फेंक रहा था। भीड़ इकट्ठी हो गई चमत्कार हो रहा था लोग देख रहे थे कि यह आदमी क्या कर रहा है और वह एक-एक को बजाता पररखता, फिर गंगा में फेकता गिनती भी करता जाता 303- 304 ऐसा धीरे-धीरे किए जा रहा था। उसका सारा ध्यान सिक्कों को परखने और गिनने में लगा था। रामकृष्ण कब उसके पास आकर खड़े हो गये उसे पता ही नहीं चला।रामकृष्ण ने कहा ना समझ जब इकट्ठी करनी है तो एक-एक अशर्फी को जांच कर परख कर गिनती करके खाते में लिख- लिख कर जमा करना पड़ता है। जब पूरी फैंकनी ही हैं, नदी में तो हजार हुई कि 999 हुईं सब फैंकनी ही हैं तो इकट्ठा फैंका जा सकता है गिन गिन करके वहां क्या कर रहा है।
वह आदमी बड़े व्यथित मन से बोला मैं यह सोने के सिक्के आप को भेंट करना चाहता था आप इस धन से मठ का जीर्णोधार करवा सकते थे,यहां इतने लोग आते हें उनके भोजन प्रसादी में उपयोग लिए जा सकते थे, मुझे संतोष होता पर आपने तो इन्हे गंगा में डालने का आदेश दे दिया।आपकी आज्ञा का उलंघन तो मै कर नहीं सकता पर मेरा मंतव्य भी पूरा नहीं हुआ सो एक साथ फैंकने में बहुत कष्ट हो रहा है।
श्री रामकृष्ण हंसे और बोले जब तू यह मेरे लिए ही लाया है तो मै इनका कुछ भी करु तेरे को कष्ट किस बात का।
वह आदमी कोई जबाब नहीं दे सका।
रामकृष्ण ने कहा कि मै जानता हूं आदमी का माया के प्रति लगाव मोह कितना हे बिना चाहत के तो वह छिदाम भी नहीं दे सकता, तू तो एक हजार स्वर्ण मुद्राएं दे रहा हे बता इसके पीछे तेरी चाहत क्या है और देख मुझ से झूठ मत बोलना।
वह आदमी बोला मैंने आपके बारे में यह सुना था कि आप किसी की भेंट स्वीकार कर लें तो वह हजार गुने में फलीभूत होती हे।इसी सोच के साथ मैंने आपको हजार स्वर्ण मुद्राएं देने का विचार किया था।
श्री रामकृष्ण परमहंस बहुत जोर से हंसे, तेरी गलती नहीं हें, अधिकांश दान लोग इसी वृति के कारण करते है और अपने कर्म बांधते है। निस्वार्थ भाव से किया गया दान ही फलीभूत होता हे।जा अपनी पोटली को अपने साथ ले जा गंगा ने इन्हें स्वीकार नहीं किया।
और श्री रामकृष्ण परमहंस अपने मठ की ओर चल दिए।
शालू जैन
2बी रामद्वारा कालोनी महावीर नगर जयपुर