पुनः आगमन नहीं
ऊर्ध्वगति होने के बाद जीवात्मा का किसी भी परिस्थिति में पुनरागमन नहीं होता। जिस प्रकार बीज को जला देने पर वह अंकरित नहीं होता, उसकी पुनरुत्पत्ति नहीं होती. उसी प्रकार राग-द्वेष के अभाव हो जाने पर मुक्तात्माओं का संसार में पुनरागमन नहीं होता।’ राग-द्वेष ही संसार में उत्पत्ति के बीज हैं। कारण के बिना कार्य नहीं होता।
अवतारवाद असंगत
कुछ दार्शनिक, जीवात्मा के मुक्त हो जाने के बाद, उनका संसार में पुनः आगमन मानते हैं। उनके मतानुसार जब-जब धरती पर धर्म का नाश होता है, अधर्म बढ़ता है, तब ईश्वर धर्म का प्रस्थापन करने के लिए संसार में अवतरित होते हैं। उक्त बात तर्कसंगत प्रतीत नहीं होती; क्योंकि अवतरण नीचे उतरने का द्योतक है। एक बार मुक्त हो जाने के बाद पुनः संसार में आने का कोई कारण नहीं बनता। यदि बनता है तो फिर मुक्त होने का कोई अर्थ नहीं है; क्योंकि मुक्ति तो पूर्णता का नाम है। संसार में लौटना अपूर्णता की निशानी है। अकस्मात् कोई कार्य नहीं होता है। यदि अकस्मात् ही उनका पुनरागमन होता है तब तो किसी जीव को कभी भी मोक्ष हो ही नहीं सकता, क्योंकि मुक्ति हो जाने के बाद भी अकारण ही उसका पुनः आगमन हो जायेगा।
जैन-दर्शन में जीव को दूध में घी की तरह माना गया है। जिस प्रकार मथने/भाने आदि क्रिया विशेषों से एक बार दूध से घी को अलग कर लेने पर घी पुनः दूध रूप नहीं होता, उसी प्रकार जीवात्मा भी एक बार शुद्ध हो जाने के बाद पुनः अशुद्ध नहीं होता, न ही वह दुबारा संसार में लौटता है, बल्कि लोक-शिखर पर विराजमान हो जाता है। अतः अवतारवाद को मानने का कोई औचित्य समझ में नहीं आता है। जैन-दर्शन में इसीलिए अवतारवाद को स्थान नहीं दिया गया है। वस्तुतः जैन-दर्शन अवतारवादी नहीं है उत्तारवादी है, क्योंकि जैन धर्म समस्त प्राणियों को संसार सागर से पार उतरने का मार्ग प्रशस्त करता है।
इसके अतिरिक्त मुक्तात्माओं के पुनरागमन नहीं होने में एक दूसरा वैज्ञानिक कारण भी है. वह है गुरुत्व का अभाव। गुरुत्व स्वभाव वाले पौदगलिक पदार्थ ही ऊपर से नीचे गिरते हैं, मुक्तात्माओं में यह नहीं होता। संसारी आत्मा-कर्म-पुदगलो के संयोग से गुरुत्व रूप हो जाती है। मुक्तात्माओं में उसका अभाव हो जाता है। अतः पेड़ से टूटने वाले फल के टपकने की तरह मुक्तात्माओं की मोक्ष से च्युति नहीं होती, और न ही पानी भर जाने से जहाज की तरह डूबना होता है।’
संसार खाली नहीं होगा
यहाँ हमारे मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि जब मुक्तजीवों का पुनरागमन नहीं होता और संसारी जीव सीमित हैं, तो फिर जीवों के निरन्तर मुक्त होते रहने से एक दिन ऐसा भी आ सकता है, जबकि पूरा संसार खाली हो जाये? उक्त प्रश्न के लिए भी कोई अवकाश नहीं है। क्योंकि जीवों की राशि अनन्त है। अनन्त का अर्थ वह राशि है जो आयरहित व्यय होते रहने के बाद भी अव्यय हो अर्थात् ज्यों की त्यों बनी रहे।’
जिस प्रकार भविष्य काल प्रति समय घट रहा है फिर भी वह अनन्त ही है, उसकी राशि में कोई न्यूनता नहीं आती। जब भी भविष्य काल की परिगणना की जाती है वह अनन्त ही रहता है। यद्यपि वह प्रतिक्षण क्षीण हो रहा है। उसी प्रकार निरन्तर मुक्त होते रहने से यद्यपि जीव राशि में न्यूनता आती है फिर भी उस राशि का कभी भी अन्त नहीं होता। परिमित वस्तु ही घटती-बढ़ती है तथा उसी का अन्त सम्भव है। अपरिमित वस्तु में न्यूनाधिकता तथा सर्वथा विनाश होने का प्रश्न ही नहीं उठता। जीव राशि अनन्त है, अतः उनके मुक्त होते रहने पर भी संसार के खाली होने की कोई आशंका नहीं रहती।
मुक्तात्मा का आकार
कुछ भारतीय दार्शनिक मुक्तात्मा को आकृति शून्य निराकार मानते हैं। जैन दर्शन उनके उक्त मत से सहमत नहीं है। जैन दर्शन में आत्मा को अमूर्तिक मानते हुए भी उसे आकृति शून्य नहीं माना गया है। इन्द्रियों से दिखाई नहीं पड़ने के कारण ही मुक्तात्मा को जैन दर्शन में निराकार कहा गया है। इसलिए जैन दर्शन में जीव निराकार होते हुए भी आकृति शून्य नहीं है। इस दृष्टि से मुक्त जीवों का आकार मुक्त हुए शरीर से कुछ कम होता है। मुक्त जीव के अंतिम शरीर से कुछ कम होने का कारण यह है कि नाक, कान, नाखून आदिक अंगोपांग खोखले होते हैं।अर्थात् उनमें आत्म-प्रदेश नहीं होते।’ कहा भी है मुक्त शरीर के कुछ खोखले अंगों में आत्म-प्रदेश नहीं होते। मुक्तात्मा छिद्ररहित होने के कारण अपने पहले के शरीर से कुछ कम (लगभग 1/3 कम), मोमरहित साँचे के बीच के आकार को तरह अथवा छाया के प्रतिबिंब (परछाई) की तरह आकार वाले होते हैं।
मोक्ष का सुख
न्याय-वैशेषिक दार्शनिक सिद्धों में सुख का अभाव मानते हैं। उनके अनुसार बुद्धि, इच्छा, सुख, दुःख आदि आत्मिक गुणों का अभाव हो जाना ही मुक्ति है। वे सिर्फ दुःख के अभाव को ही मुक्त जीवों का सुख मानते हैं। इस प्रकार तो मुक्त जीव भी पाषाण की तरह सुख के अनुभव से रहित हो जायेंगे। सिद्धों का सुख इस प्रकार का नहीं होता; क्योंकि इस प्रकार के सर्वविनाशी निरर्थक मोक्ष के लिए मोक्षार्थी-तपश्चरण, योग-साधना, समाधि आदि कार्य क्यों करेगा? इसी से खिन्न होकर कुछ लोगों ने वैशेषिकों के मोक्ष का उपहास करते हुए कहा है- “गौतम ऋषि वैशेषिकों की मुक्ति की अपेक्षा वृन्दावन में सियार होकर रहना अच्छा समझते हैं।”
जैन-दर्शन मान्य मुक्तात्माओं का सुख मात्र दुःखाभाव रूप ही नहीं होता, अपितु मुक्तात्माओं का सुख, इन्द्रियातीत आत्मा से उत्पन्न हुआ, विषयों से अतीत, अनुपम, अनन्त और विच्छेदरहित होता है। संसार के सुख, विषयों की पूर्ति, वेदना का अभाव और पुण्य कर्मों के इष्ट फल-रूप है, जबकि मोक्ष-सुख कर्म क्लेश के क्षय से उत्पन्न परम सुखरूप है। सारे लोक में ऐसा कोई पदार्थ नहीं है, जिसकी उपमा सिद्धों के सुख के लिए दी जा सके, वह सुख अनुपम है। संसारी जीवों का सुख इन्द्रियाधीन होने के साथ बाधा-सहित है, जबकि सिद्धों का सुख- अतीन्द्रिय और बाधारहित है। उनके उस सुख को अव्याबाध-सुख कहते हैं। कोई-कोई सिद्धों के सुख को सुषुप्तावस्था के समान मानते हैं पर उनकी मान्यता ठीक नहीं है; क्योंकि सिद्धों में सुखानुभव रूप क्रिया होती है, जबकि सुषुप्तावस्था श्रम, क्लम, मद, व्याधि आदि निमित्तों से उत्पन्न होती है और वह मोह विकार रूप है।’
अन्य दर्शनों में मोक्ष
जैन-दर्शन में निरूपित मोक्ष के स्वरूप को हमने समझा। आइए, अब एक दृष्टि इतर दर्शनों में मान्य मोक्ष पर भी डाल लें।
1. बौद्ध- बौद्ध-दर्शन में दीपक के बुझने की तरह, चित्त सन्तति के अभाव को मोक्ष माना गया है। इससे उच्छेदवाद का प्रसंग आता है।
2. न्याय-वैशेषिक- न्याय-वैशेषिक के अनुसार सुख-दुःख चेतना आदि सभी आत्मा के आगन्तुक गुण हैं। मुक्तात्माओं के शरीर विच्छेद के साथ-साथ आगन्तुक गुणों का भी अभाव हो जाता है। उनका मानना है कि सुषुप्तावस्था जिस प्रकार सुख-दुःख से रहित अवस्था होती है, उसी प्रकार मोक्षावस्था में भी आत्मा सुख-दुःख से अतीत होता है। नींद की अवस्था अकाल्पनिक होती है, परन्तु मोक्षावस्था स्थायी होती है।’
3. सांख्य – सांख्य-दर्शन के अनुसार मूल प्रकृति के निवृत्त हो जाने पर पुरुष ऐकान्तिक और आत्यन्तिक रूप से कैवल्य की प्राप्ति कर लेता है।’ इस प्रकार प्रकृति से निवृत्त होना ही मोक्ष है। मोक्ष की अवस्था में आत्मा को आनन्द की अनुभूति नहीं होती, क्योंकि वे पुरुष को स्वभावतः मुक्त और त्रिगुणातीत मानते हैं।
4. मीमांसा– मीमांसा दर्शन के अनुसार चैतन्य रहित अवस्था ही आत्मा की स्वाभाविक अवस्था है। इस दृष्टि से मोक्ष सुख-दुःख से परे है। इस अवस्था में न चैतन्य रहता है, न ही आनन्द।
5. अद्वैत वेदान्तः न्याय, वैशेषिक और मीमांसा दर्शनों के विपरीत अद्वैत-वेदान्त में मोक्ष पूर्ण चैतन्य और आनन्द की अवस्था है। अनादि अविद्या से मुक्त होकर आत्मा का ब्रह्म में विलीन हो जाना ही मोक्ष है। वस्तुतः आत्मा ब्रह्म ही है, परन्तु वह अज्ञान से प्रभावित होकर अपने को ब्रह्म से पृथक् समझने लगता है। यही बन्धन है। अनादि अज्ञान का आत्यन्तिक अभाव ही मोक्ष है।’
6. जैन-दर्शन- जैन दर्शन में मोक्ष को बौद्धों की तरह अभावात्मक नहीं माना गया, न ही सांख्यों की तरह मोक्ष को आनन्द रहित माना गया है। न्याय-वैशेषिक और मीमांसक जहाँ मोक्षावस्था में चैतन्य गुणों का अभाव मानते हैं, वहाँ जैन-दर्शन में मोक्ष का अर्थ शुद्ध चैतन्य गुणों की प्राप्ति से है; क्योंकि चैतन्य आदि जीव के स्वाभाविक गुण हैं, उनका कभी अभाव नहीं हो सकता। वेदान्त की तरह जैन-दर्शन में आत्मा की ब्रह्मलीनता को मोक्ष नहीं कहा गया, बल्कि मोक्ष आत्मा की पूर्ण शुद्ध अवस्था मानी गयी है तथा मोक्ष दशा में भी प्रत्येक आत्मा की स्वतन्त्र सुखी सत्ता को जैन-दर्शन स्वीकार करता है।
उपर्युक्त तुलनात्मक विवेचन का सारांश यह है कि जैन दर्शन-मान्य मोक्ष आत्म-स्वरूप के लाभ का ही नामान्तर है, जोकि कर्म-मलों के क्षय से प्राप्त होता है। मोक्ष में बौद्धों की तरह आत्मा का अभाव नहीं होता; क्योंकि मोक्ष आत्म-स्वरूप की प्राप्ति है।’ ज्ञान और चेतनत्व आत्मा का स्वाभाविक गुण होने के कारण मोक्ष में आत्मा न्याय-वैशेषिकों की तरह ज्ञान-शून्य और अचेतन भी नहीं होता। मोक्ष आत्मा की परम और पूर्ण अवस्था है।
मुनिश्री प्रमाणसागरजी महाराज