खुराना साहब के पिताजी जब पाकिस्तान से हिन्दुस्तान में आये तो आकर सीधे दिल्ली में आ बसे, दिल्ली के लाल किले के पास ही काम धंधे के लिए उन्हें एक थड़ीनुमा दुकान भी सरकार द्वारा अलाट कर दी गई, जिसमें वे साइकिल के पंचर जोड़ने और साइकिल रिपेयरिंग की दुकान करने लगे। अपनी कड़ी मेहनत और चालबाज दिमाग के कारण थोड़े दिन में ही साइकिल रिपेयरिंग की दुकान पर नई साइकिलें बिकने लगी। मार्केट चल निकला, सो खुराना साहब ने आस-पास के अपने पुराने पाकिस्तानियों को अलाट दुकानें भी खरीद ली और 1962 में एक बड़ा शौरूम बना कर साइकिलों के बड़े व्यापारी बन गये। 1962 में ही उनकी पत्नी लक्ष्मी ने एक पुत्र रत्न को जन्म दिया, सो खुराना साहब ने उसका नाम भागचन्द रखा। भागचन्द थोड़ा बड़ा होकर स्कूल जाने लगा, उसका मन पढाई में नहीं लगता था । इधर खुराना जी बड़े व्यापारी बनते जा रहे थे, सो वे अपने पुत्र भागचन्द को अत्यन्त भाग्यशाली मानकर उसकी हर जायज नाजायज बातों पर हमेशा लाड़ लड़ाते रहते थे। माँ लक्ष्मी जरूर हर दिन खुराना साहब को भागचन्द की नई-नई हरकतों की कहानियां सुना-सुना कर अपने भाग्य को कोसती रहती थी, परन्तु खुराना साहब पर इसका कोई असर नहीं होता था। वे बड़ी दीठता से कहते, अरे लक्ष्मी भागू मेरा पुतर है।
धीरे-धीरे भागचन्द की उम्र 18 वर्ष की हो गई और वह हर बार दसवी में फैल हो जाता। लक्ष्मी को भागचन्द के विवाह की चिन्ता थी और खुराना साहब भी अपनी रैपूटेशन के कारण भागचन्द को कुछ बनाना चाहते थे, उनकी इच्छा थी कि भागचन्द डॉक्टर बन जाये, पर क्या करते, भागचन्द तो दसवीं भी पास नहीं कर पा रहा था। एक दिन मेरठ से खुराना साहब की मौसी से पैदाइशी भाई नन्दलाल खुराना उनसे मिलने आये । सुख – दुःख, घर – व्यापार, सभी विषयों पर बातें हुई, तो खुराना साहब ने अपनी तमन्ना और लाचारी दोनों नन्दलाल को बताई। नन्दलाल पहले मुस्कराये, फिर बोले घबराता काये को है, अरे डॉक्टर ही तो बनाना चाहता है भागू को बनवा देंगे। खुराना साहब ने बताया कि भागू तो दसवीं में ही तीन बार फेल हो गया है, कैसे डॉक्टर बनेगा। नन्दलाल बोले- ‘अरे चिन्ता क्यों करता है। मैं अपने साथ भागू को मेरठ ले जाऊँगा, उसका दाखिला डॉक्टर की पढ़ाई वाले स्कूल में करवा दूंगा। भागू को डॉक्टरों वाले स्कूल में जाना भी नहीं पड़ेगा और भागू डॉक्टर भागचन्द खुराना बन जायेगा। कुछ पैसे जरूर खर्च होंगे। खुराना जी ने नन्दलाल जी के घोटुंओं से हाथ लगाया, और बोले- भाई जी, पैसों की चिन्ता न करो, बस भागू को डॉक्टर भागचन्द खुराना बनवा दो और दोनों हाथ जोड़कर बोले, आपकी मुझ पर बड़ी मेहरबानी होगी।
भागचन्द कुछ समय अपने ताऊ नन्दलाल के साथ मेरठ में रहा और डॉक्टर की डिग्री लेकर दिल्ली वापस लौट आया। भाई- बिरादरी में पता लगने लगा खुराना जी साइकिल वालों का बेटा भागचन्द डॉक्टर भागचन्द आर. एम. पी. बन गया है। सो भाई बिरादरी में चर्चा होने लगी। खुराना जी की माली हालत अब और भी अच्छी हो गई थी, फिर बेटा भागचन्द के पास डाक्टर की डिग्री भी थी, सो बडे-बडे घरानों के रिश्ते नाते आने लगे। परन्तु भागचन्द की माँ लक्ष्मी देवी अपनी बचपन की सहेली शकुन्तला को पहले ही वचन दे चुकी थी कि यदि मेरे लड़की हुई और तेरे लड़का हुआ तो आपस में उनका ब्याह करेगें और यदि इससे उल्टा हुआ तब भी अपने वायदे को नहीं भूलेगें । शकुन्तला की लड़की भागचन्द से डेढ़ वर्ष छोटी थी सो किसी प्रकार की अड़चन भी नहीं थी ।
खुराना जी बड़े पशोपेश में थे। कभी अपनी काली गोल टोपी को माथे पर लगाते और कभी हाथ में लेकर बैचेन से घर में चहलकदमी करते, घर में एक द्वन्द्वात्मक शांत वातावरण था। एक तरफ बड़े घरानों के रिश्ते थे जिसमें दहेज भी भारी मिलने की संभावना थी, दूसरी ओर लक्ष्मी का वायदा जो जिद में बदल गया था । खुराना जी बैचेन – चिन्तित, चिन्तन में तल्लीन, आखिर घरवाली की जिद जीत गई। शकुन्तला का आदमी भी कोई छोटा-मोटा आदमी नहीं था सो बड़ी धूमधाम से खुराना जी और लक्ष्मी देवी के बेटे डॉ. भागचन्द खुराना का शुभ विवाह मनसुख लाल और शकुंतला की बेटी माया के साथ सम्पन्न हो गया।
कुछ दिन बाद भागचंद की पत्नी माया ने भागचन्द को अपने डाक्टरी पेशे के अनुकूल एक हॉस्पीटल खोलने की सलाह दी। भागचन्द कुछ दिन तो हाँ हूं करता रहा, आखिर एक दिन अपनी पत्नी माया को सारी बातें सच-सच बता दी। माया को अफसोस तो बहुत हुआ पर अब क्या कर सकती थी, उस जमाने में महिला कानून भी इतने सख्त नहीं थे, भारतीय परम्परायें कुछ ऐसी ही थीं, सो उसने अपने कर्म फोड़ते हुए समझौता कर लिया और सबर कर लिया कि बिंद गये सो मोती ।
दुनिया हमेशा सही कहती आई है कि किसी भी आदमी की कामयाबी में औरत का बहुत बड़ा हाथ होता है। सो एक दिन रात्रि में प्यार मोहब्बत के समय माया ने, डॉ. भागचन्द को एक आईडिया दे दिया। बस अब क्या था डॉक्टर साहब उस आइडिये की कामयाबी में ऐसे लगे कि फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा ।
डाक्टर भागचन्द ने अपने पिताजी के शोरूम के एक हिस्से में अपना एक अलग से ऑफिस बनवाया और उस पर एक शानदार ग्लोसाईन बोर्ड लगवाया ‘डॉ. खुराना विवाह केन्द्र’ बस एक बार मिल तो लें, कुछ और स्लोगन और नारे उन्होंने कागज पर तैयार किये। लाल किले के आस-पास और चाँदनी चौक के आस-पास के सभी पेंटरों की एक मीटिंग बुलाकर उनको सारी स्कीम समझा दी गई, फिर वे स्लोगन उन सभी वॉल पेन्टरों को दे दिये गये। सभी वॉल पेंटरों को निर्देश दिये गये कि रेलपटरी के साथ-साथ जो भी दिवाल खाली दिखे उस पर यह स्लोगन डॉ. खुराना विवाह केन्द्र के पूरे पते एवं टेलीफोन नम्बर सहित सफेद रंग की सफैदी से लिखने हैं। देश भर की कोई दीवार ऐसी नहीं रहनी चाहिए जिस पर यह न लिखा हो- ‘एक बार मिल तो लें, लड़की हो या लड़का शादी हम करायेंगें।’ ‘कैसी लड़की चाहिए हमें बताये और निश्चित हो जायें, बस एक बार मिल तो लें’, डॉ. साहब से मिलने से पूर्व टेलिफोन पर संपर्क कर समय अवश्य ले लें।
डॉ. भागचन्द ने अपने वैवाहिक केन्द्र का इतना प्रचार किया कि कोई पेपर ऐसा नहीं जिसमें उनका इश्तहार न छपा हो, रेल लाइन के साथ-साथ चलने वाली हर दिवाल पर उनका ही नाम हिमालय की पहाड़ी से लेकर चम्बल के खारों पर डॉ. खुराना विवाह केन्द्र का नाम
‘बस एक बार मिल तो लें।’
धीरे-धीरे डॉ. भागचन्द की दुकान जो पहले साइकिलों के शोरूम के एक हिस्से में थी अब वहाँ से साइकिलें पूरी तरह से गायब हो गईं और पूरा शोरूम एक वैवाहिक ऑफिस में बदल गया। जिसमें टाई सूट पहने अनेक नौजवान और नवयुवतियां अपने-अपने केबिनों में काम करते। रिसेप्शन पर लाल सुर्ख लिपिस्टिक लगाये विभिन्न मुद्राओं और वेशभूषाओं में नवयौवना टेलीफोन के एक चोंगे को रखती दूसरे को उठाती । आने वालों का एक छोटा सा इन्क्वायरीनुमा इन्टरव्यू सा लेकर उन्हें सामने पड़े सोफाओं पर बड़ी नफासत के साथ बैठाया जाता। कई सफेद पट्टीदार नीली ड्रेस पहने हुये कर्मचारी सोफे पर बैठे हुये लोगों के लिये जल एवं चाय की व्यवस्था में संलग्न थे। पानी आने वाले सभी लोगों को सर्व किया जा रहा था। फ्लोर मैनेजर मिस मोनिका एक-एक क्लाइन्ट के पास आती, फिर उनको एक नम्बर वाली केबिन में भेजा जाता तो किसी को दो नम्बर केबिन में भेजा जाता। एक नम्बर वाली केबिन से जब क्लाइंट निकलता तो उसे सीधे केबिन नं. 8 में भेजा जाता। इस प्रकार एक क्लाइंट को कई केबिनों के अन्दर बाहर आने-जाने के बाद एक कार्ड दिया जाता और बताया जाता कि आप फलां दिनांक को इतने बजे आयें। सारा काम बड़ा व्यवस्थित था। रिसेप्शन पर ही एक केबिन बनी हुई थी, वहाँ पर रसीद कटवाने के बाद ही सोफे पर बैठने के लिए कहा जाता था।
भागचन्द की माया का आइडिया हिट हो गया था। लक्ष्मी पुत्र पर माया का साया इस कदर पड़ा कि जब वे अपना सोने के फ्रेम वाला चश्मा लगाकर कार की ओर बढ़ते थे, तब उनकी चाल में जो रौनक होती थी उसे देखकर खुराना साहब जो हमेशा एक कोने में बैठे भागू की केबिन की ओर टकटकी लगाये रहते थे तब उनका मन करता था कि भाग कर जायें और भागू को गले लगाकर चूम लें, परन्तु डॉ. भागचंद खुराना उनकी ओर नजर उठाकर भी नहीं देखता सीधे अपनी बी.एम.डब्ल्यू. कार की ओर बढ़ जाता। फिर भी खुराना साहब मुग्ध मुद्रा में जहाँ तक भागू की कार दिखाई देती उसे टकटकी लगाकर देख कर ही आत्ममुग्ध होते रहते ।
धीरे-धीरे समय बीतता गया, डॉ. खुराना का विवाह केन्द्र दिल्ली से बम्बई, मद्रास, बंगलोर, हैदराबाद, अहमदाबाद आदि बड़ी-बड़ी जगह पर खुल चुका था। डॉ. भागचन्द खुराना ने अपने विवाह केन्द्र को ट्रेडमार्क आथर्टी से रजिस्टर्ड कराने के साथ-साथ लोगो वर्डमार्क सब रजिस्टर्ड करवा लिये थे। अब तो जगह-जगह वे अपनी फ्रेंचाइजी देने के काम में लग गये थे। रोजाना अखबारों में बड़ा-सा इश्तहार छपवाया जाता था कि ‘नक्कालों से सावधान, हमारा रजिस्टर्ड ऑफिस फलां है। हमारे ब्रांच ऑफिस यहां यहां पर हैं। कई फरेबी, धोखेबाज हमारे नाम से गलत तरीके का व्यापार कर रहे हैं, उनसे सावधान रहें।’ खुराना साहब ने वैवाहिक संस्कार की प्रक्रिया को एक व्यापारिक प्रक्रिया में बदलने का जो महान कार्य किया उससे विदेशी कम्पनियां भी बड़ी प्रभावित होने लगी। अतः अमेरिका की लव एण्ड मैरिज कम्पनी ने सी.एम. डी. डॉ. खुराना से सम्पर्क करने का विचार बनाया और उनके इस वैवाहिक संस्कार के व्यापारिक विचार को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर करने के लिए उनसे चिठ्ठी-पत्री कर सम्पर्क स्थापित करने का प्रयास किया। खुराना साहब पढ़ाई-लिखाई में तो शुरू से ही ठोड थे परन्तु उनका दिमाग बहुत तेजी से चलता था, सो उन्होंने तुरन्त माया देवी से सलाह मसविरा किया, माया देवी बड़ी तेजस्वी महिला थीं, उसने तुरन्त अपने पति की समस्या का हल कर दिया। माया देवी ने कुछ डपटते हुए कहा कि कब तक मेरे पल्लू से बंधे रहोगे। अब आपकी उम्र पचपन की हो गई है कुछ तो अकल से काम लिया करो। कोई पढ़ा-लिखा इन्जीनियर एम. बी. ए. एक्सपर्ट को नौकरी पर रख लो, उसे अच्छी तनख्वा दो, सारे काम वह सम्हालेगा । इन्टरव्यू लेते समय कुछ विद्वानों को मोटी रकम देकर बैठाओ, मैं भी बैठूंगी, बढ़िया से बढ़िया आदमी को नौकरी पर रखो। वह सब काम सम्भालेगा, अब कोई सारे काम आप ही करते रहोगे क्या, फिर नौकर चाकर क्या करेंगे।
माया देवी की मीठी झिड़की और सही सलाह फौरन डॉ. खुराना के चालू दिमाग में आ गई, फिर क्या था, आई.आई.एम. और आई.आई.टी. बॉम्बे से तीन-तीन मास्टरों का एक पैनल तैयार कर अंग्रेजी, हिन्दी के समाचार पत्रों में विज्ञापन छपवा दिया गया । इन्टरव्यू वाले दिन कोई सौ सवा सौ केन्डीडेट अपनी-अपनी योग्यता और अनुभवों के प्रमाण पत्र लेकर डॉ. खुराना विवाह केन्द्र के ऑफिस में आ गये । इन्टरव्यू का दौर तीन दिन तक चलता रहा, सभी इन्टरव्यू देने वालों के रहने, ठहरने खाने-पीने की व्यवस्था होटल ड्रीमलैण्ड में की गई थी। जो भी केंडीडेट इन्टरव्यू देने के लिए आये उन्हें फर्स्ट क्लास ए.सी. का भाड़ा दिया गया । विद्वत मण्डली द्वारा तीन मैनेजरों का चयन किया गया। अब सारी जिम्मेदारी उन्होंने सम्हाल ली। हाँ, खुराना साहब के लिये एक पर्सनल सैकेट्री का भी सलैक्शन इसी दौरान कर दिया गया।
अब लव एण्ड मैरिज कम्पनी अमेरिका से सम्पर्क साधने का कार्य इन मैनेजरों को करना था, सो उन्होंने अमेरिकी कम्पनी से सम्पर्क कर सारा कार्यक्रम तैयार कर लिया। लव एण्ड मैरिज कम्पनी अमेरिका के सी. एम. डी. मिस्टर ड्यूज ने तुरन्त भारत आने का प्रोग्राम बनाया और डॉ. खुराना विवाह केन्द्र के सी.एम. डी. डॉ. खुराना से मिलने का कार्यक्रम निर्धारित कर लिया गया।
दोनों कम्पनियों के सी. एम. डी. की बैठक होटल माया में आयोजित करने का बन्दोबस्त किया गया। बैठकों के सात राउण्ड चले, आखिर निष्कर्ष कुछ इस प्रकार से तय किये गये ।
1. डॉ. खुराना विवाह केन्द्र नाम इन्टरनेशनल लेवल पर चलने योग्य नहीं है, अतः इस का नाम लव एण्ड मैरिज डाट कॉम रखा जाये ।
2. इन्टरनेशनल लेवल पर इस व्यापार को स्थापित करने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाये। जिसमें कम्यूटर और इन्टरनेट के प्रयोग को प्राथमिकता दी जाये, इसके लिये मि. ड्यूज की कम्पनी डॉ. खुराना की कम्पनी में 30 करोड़ डॉलर का निवेश करेगी।
3. डॉ. खुराना इस व्यापार के जनक हैं। अतः इस व्यापार की गुडविल के रूप में लव एण्ड मैरिज ग्रुप 200 करोड़ रूपये डॉ. खुराना को गुडविल एमाउट के रूप में देगी।
4. डॉ. खुराना इस व्यापार के जनक हैं, अतः लव एण्ड मैरिज डॉट कॉम 3 करोड रु. हर माह उन्हें तनख्वा के बतौर देगी तथा बोनस
का हिसाब-किताब हर वर्ष के अन्तिम दिनों में किया जायेगा।
5. श्रीमती माया देवी डॉ. खुराना विवाह केन्द्र की एम. डी. हैं अतः उन्हें भी 2 करोड रु. महीने तनख्वा के रूप में दिये जाते रहेगें। कुछ अन्य शर्तों और सुविधाओं के साथ डॉ. खुराना और मिस्टर ड्यूज की कम्पनी में व्यापारिक समझौता सम्पन्न हो गया। मिस्टर ड्यूज सुलझे हुए कुटिल और शातिर दिमाग के व्यक्ति थे, सो उन्होंने आधुनिकता के सभी प्रचार साधनों का सद्प्रयोग करते हुए इन्टरनेट के तमाम प्रयोग और सोशल मीडिया की अन्तर्राष्ट्रीय छवि का ऐसा इस्तेमाल कर सभी पूरी दुनिया में अपना ऐसा जाल बिछाया कि देशी- विदेशी, धर्म-जाति, नस्लवादी, काले-गोरे सभी की दीवारें गिरनी शुरू हो गई। विश्व एक ग्लोबल गाँव में परिवर्तित हो गया केवल एक ही जाति और धर्म विश्व में बच गया। अतः सारे रोड़े जो वैवाहिक संस्कारों के समय बाधक होते थे, वे सब समाप्त हो गये और एक नया विश्व भविष्य के झरोखों से झाकने का उतावली के साथ तैयारी करने लगा। जिसमें औरत और आदमी होने का दृष्टिकोण ही प्रमुखता के साथ उभरने लगा।
ड्यूज साहब यह बात अच्छी तरह जानते थे कि सदियों से चले आ रहे धार्मिक, नस्लवादी और जातिवादी संस्कार यूंही समाप्त तो हो नहीं जायेंगें, अतः कुछ दिन तक लव एण्ड मैरिज डॉट काम के द्वारा विवाह बन्धन में बन्धने वालों के प्रेम-मोहब्बत के भूत के उतरने के बाद ऊंच-नीच, नस्ल धर्म-जाति, धन-दौलत, पद- मार्यादा, गरिमा, अध्ययन कई प्रकार की महत्वाकांक्षा और अहंकार के शिकार ये नव- दम्पति होने लगेंगे। अतः आपस में कलह-विवाद आये दिन की चर्चा का अंग बन जायेगा। ड्यूज साहब यह भी जानते थे कि वैवाहिक सम्बन्धों में एक बार जब खटास आनी शुरू होगी तो वह डिप्रेशन, मानसिक बीमारी, असुरक्षा, घृणा, फ्रस्टेशन में बदलने लगेगी और फिर शिकायत पुलिस, एफ. आई. आर. कोर्ट कचहरी की हद तक पहुँचने लगेगी।
सो ड्यूज साहब ने अपने पार्टनर डॉ. खुराना से सलाह मसविरा कर एक नई कम्पनी बनाई जिसका नाम लव एण्ड मैरिज साइको रिसर्च सेंटर रखा गया। इस सेंटर की शाखायें हर उस स्थान पर खोली गई जहाँ-जहाँ पर लव एण्ड मैरिज डॉट कॉम के कार्यालय पहले से ही कार्यरत थे। उन्होंने अपने साइको रिसर्च सेंटर की एक वेबसाइट भी बनाई जिसमें कुछ फीस ऑन-लाइन जमा कराने पर साइको स्पेसलिस्टों के द्वारा वैवाहिक जीवन में मधुरता और विश्वास पैदा करने के तरीके बताये जाते थे।
मि. ड्यूज साहब के बारे में पहले ही बताया जा चुका है कि वे बड़े धूर्त किस्म के व्यापारी थे, सो उन्होंने अपने पुत्र जार्ज के नाम से एक लॉ फर्म खोल दी जो इन्टरनेशनल लेविल पर विवाह सम्बन्धी विवादों पर कानूनी सलाह देने का काम अपने एक सौ पैसठ ऑफिस और लगभग तीन हजार दो सौ वकीलों के नेटवर्क के साथ वैवाहिक विवादों को सुलझाने के कार्य में सलंग्न हैं।
वर्तमान में एक अन्दाजे के अनुसार खुराना एण्ड ड्यूज की कम्पनी लव एण्ड मैरिज डॉट कॉम और लव एण्ड मैरिज साइको रिसर्च सेंटर की मार्केट वेल्यू दो सौ पैंसठ लाख डॉलर मार्केट में आंकी जा रही है। मिस्टर जार्ज की लॉ फर्म का सन् 2011-12 का टर्नओवर भी लगभग दो लाख डॉलर पर पहुंच गया है जिसका 2025 में पच्चीस लाख डॉलर तक होने की सम्भावना है।
डॉ. खुराना और श्रीमान ड्यूज अब नये-नये विवाह सम्बन्धी व्यापारों में अपने धन का इनवेस्टमेंट करने का विचार कर रहे हैं। कई योजनायें पाइप लाइन में हैं। आने वाले समय में यह योजनायें विश्व की जनता को किस रूप में प्रस्तुत की जायेगी और उनका क्या लाभ मानव जाति को मिल सकेगा, यह अभी सामने आना बाकी है।
अशोक कुमार जैन
2 बी, रामद्वारा कॉलोनी, महावीर कॉलोनी,
टोंक रोड, जयपुर