श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

क्षरण होती रिश्तों की आयु

 

संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते।।

अर्थात- हम सब एक साथ चलें; एक साथ बोलें; हमारे मन एक हों। प्राचीन समय में देवताओं का ऐसा आचरण रहा इसी कारण वे वंदनीय हैं।

हम सब एक ऐसी संस्कृति और समाज से आते है जहां रिश्तों को सजीव पूंजी माना गया है।
जहां रिश्तों को शक्ति और सामर्थ्य का प्रतीक माना जाता रहा है।
जहां रिश्तों को सुख और दुख का सारथी माना गया।
जहां रिश्तों को भगवान के द्वारा रचित माना गया है।
जहां रिश्तों को धर्म का, खून का कहकर सम्बोधित किया जाता है।

जहां रिश्तों को समुत्कर्ष और समुन्नति का आयाम माना गया है।

जहां रिश्तों को आनन्द और सुख का पर्याय माना जाता रहा है।

जहां रिश्तों को जीवन की संजीवनी माना जाता रहा है।

लेकिन कालचक्र की अतिशय बढ़ती गति, तेजी से बदलता मानव मन, असत(नश्वर सामान) के प्रति बढ़ती अभीप्सा लालसा व लिप्सा का सिर चढ़कर बोलना, संस्कार विहीन शिक्षा पद्धति, माता-पिता का मूल्य रहित आचरण। इन सब कारणों की वजह से आज रिश्तो की आयु बहुत अल्प हो गयी है। ह्रास होता घरों से पुण्य और सामाजिक परम्पराओ का प्रवाह। कतिपय परिवार ऐसे भी होंगे जिनके रिश्ते आजीवन चलते होंगे। लेकिन अधिकांश देखने मेंआता है कि रिश्ते अल्पायु में ही खत्म हो रहे है।
आज बहुत कम रिश्ते है जो जीवन पर्यंत तक चलते है। समय से पहले ही रिश्ते दम तोड़ने लगते है। क्योकि रिश्तों के प्रति जैसा त्याग, समर्पण, उद्दात भाव, विराट दिव्य दृष्टि, हृद्ध्य में गहराई, व उत्कृष्ट गुणवत्ता की आत्मीयता चाहिए उसका आज विलोपन हो गया है।

इस सबके मूल में हम सबका स्वाध्याय से दूर होना, धर्म एवं अध्यात्म के मर्म को व्यवहार रूप में और यथार्थ में नही समझना। कर्म को शास्त्र सम्मत व धर्म के अनुसार नही करना। कर्म को कर्तव्य समझकर नही करना। लघु पथ (shortcut)की सोच की ओर आकर्षित होना। सकाम कर्म करना अर्थात काम के बदले में अपेक्षा रखना।
आज छोटे-2 अनपेक्षित मुद्दों पर रिश्तों को तिलांजलि दे दी जाती है। शुद्ध रिश्ता त्याग समर्पण और असीम सहन शक्ति के बल पर दीर्घायु को प्राप्त करता है।
विचारणीय है कि आज प्रति दूसरा घर भाईयों में मन मुटाव व आपसी कलह की वजह से पीड़ित है। फिर शुरू होता रिश्तों का स्खलन। सुधि पाठको से निवेदन है कि हम सब निरपेक्ष और निसंकोच होकर रिश्तों और मित्रों की सूची बनॉए और उनका विश्लेषण करे की पहले जो रिश्ते आत्मीयता व समर्पण के रहे। क्या आज भी उनमें उसी तरह की मिठास(स्निग्धता) है क्या?

जब तक दूसरे के व्यक्तित्व की समीक्षा करना बन्द नही करेंगे तब तक रिश्ते बनते रहेंगे और टूटते रहेंगे। समीक्षा स्वयं के त्याग, धैर्य और सहन शक्ति की करो कि हममें कितना त्याग, धैर्य सहनशक्ति है?

आज चारो ओर एक ही बात सुनने को मिलती है की उससे मेरा व्यावहार और बोलचाल अब कम हो गया है। जब पूछते है तो कारण सामने आता है जिनमे सहनशक्ति और त्याग की न्यूनता की वजह से ऐसा हुआ है।

रिश्तों को केअर (सहेजना, संवारना) करना, उन्हें समझना, समयकाल परिस्थिति अनुसार उनका मूल्यांकन करते समय अकूत सहनशक्ति की आवश्यकता है।

आज प्रेम की अविरल धारा जो कभी सागर के रूप में थी आज वो सिकुड़ कर पगडंडी के रूप में रह गई। उसका कारण अनावश्यक मुद्दों पर समीक्षा करना। छोटी छोटी बातों से अपना तादात्मय स्थापित करना।
आज रिश्ते महाकाव्य से कुंजी बनकर रहगये है। फिर हम मिथ्यारोप लगाते है की समय बदल गया। जबकि समय नही बदला है हमारी सोच व अंतर्दृष्टि बदल गयी है।

डिजिटल प्लेटफार्म (फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर देखो तो एक व्यक्ति के हजारों आभासी मित्र है। आखिर क्या है ये सब? पूंछो तो कहते है कि मेरे 2000-5000 हजार फेसबुक मित्र है। ये एक ऐसी संस्कृति है जिससे हम यथार्थ जीवन से दूर होकर आधारहीन, मूल्यहीन जीवन की ओर बढ़ रहे है।
आज विचार करे की हमारे रिश्त चिरंजीवी कैसे रहे, हमारे रिश्ते दीर्घायु को कैसे प्राप्त हो।

आज आवश्यकता है हम मूल्यपरक प्रायोगिक जीवन के पथ पर आगे बढ़े ईमानदारी के साथ तभी बच्चे अनुकरण करेंगे। केवल भाषण देंगे तो वो कुछ भी अर्जित नही करेंगे। हमारा जीवन उदाहरण बने, हमारा आचरण अनुकरणीय बने इसके लिए जीवन पथ पर कदम कदम पर धर्मानुकूल आचरण हो। छोटी छोटी बातों का ध्यान रखे जो रिश्तो को स्वस्थ बनॉए रखने में सहायक हो। अभिवादन, आदर सत्कार और मिलना जुलना होता रहे।

शुद्ध सात्विक प्रेम अपने कार्य का आधार है
प्रेम जो केवल समर्पण ही समर्पण जानता है।
और उसमें ही स्वयं की धन्यता बस मानता है।
दिव्य ऐसे प्रेम में ईश्वर स्वयं साकार है।।
निष्कर्षतः रिश्तों में प्रेम की स्निग्धता बनी रहे इसके लिए अनावश्यक बातों को भूलने का प्रयास रहे।

पवन कुमार जैन
परवेणी

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