हे तत्व ज्ञानी – कितना सुनहरी पलों का सपना, सुनहरी पलों के साथ जीओ और सुनहरी पलों में जीने दो । अहो कितनी गगन भेदी, प्रभु के सर्वाग से एक विचित्र गर्जना रूप ऊँकार ध्वनि निकलती है जो अनाक्षरात्मक होती है। अरिहन्त के होठ – तालु, कण्ठ दाँत आदि नहीं हिलते। इसे अर्धमागधी भाषा कहते हैं। यह ध्वनि एक योजन तक सुनी जा सकती है। जीओ और जीनों दो की गम्भीर वाणी प्रत्येक जीव के लिए थी, ताकि प्रत्येक जीव स्वच्छन्द एवं निर्भीक जीवन का रस स्वादन कर सके। जीओ और जीने दो, यह करुण आवाज नेत्रों में समा जायेंगी, हृदय को छेद कर आत्मा में प्रवेश हो जायेगी तो राग- -द्वेष-भय का जन्म ही नही होगा।
हे भव्य जीव यह नारा नहीं, जीवन जीने का तत्व ज्ञान और जीने दो का तत्व भेद था । तत्व ज्ञान और तत्व भेद का मंथन करने पर माखन अर्थात मक्खन निकलता है। जिज्ञासा का दीपक जब सजोया जाता है तो कल्पवृक्ष बन जाता है। जीवन स्वयं प्रभु की वाणी बन जायगा। क्या आपने जिनवाणी का अमृत पिया है, हृदय जागृति के लिए विवेक का दीपक प्रज्वलित किया है। करुणा रस का दान दीजिए, हृदय में ममता का बीज बोईए । बाँह फैलाते हुए गिरते हुए को उठाईए, शीतलहर से जूझते हुए प्राणों को गर्मी का अहसास कराईयें, तभी तो जीओ और जीने दो आत्मा और हृदय से निकल कर कण्ठ का नारा बन पायेगा ।
हे सुनहरी पलों के कर्णधार- यह आह्वान आदिनाथ के समय से ही था, उनकी वाणी परोक्ष थी, महावीर स्वामी की प्रत्यक्ष थी। भक्तिरस का स्वादन करें, भक्ति का रास्ता बड़ा फिसलन का है, महावीर की वाणी में आता है अन्दर की गन्दगी को हटाये बिना बन्दगी न बन पायेगी । कूड़ा कचरा-कामना दूर किये बिना प्रभु एवं प्रार्थना प्रकट नहीं हो पायेगी। आज का पाप भविष्य के दुख का आरक्षण है । भक्तामर स्तोत्र, महावीराष्टक स्तोत्र, मेरी भावना समाधि भावना, सामयिक पाठ, आलोचना पाठ, इनका मंथन कर आत्मा में उतारते हैं तो मंथन से मक्खन जो निकलता है, उससे हमारा रोम रोम पवित्र हो जाता है। केवल पढना या नेत्रों के समक्ष निकालना या गुनगुनाना नहीं बल्कि अन्तर गाथा में उतारते हैं, तो आत्मा से जीओ और जीने दो की आवाज गूंजेगी । अन्तर की आवाज की भक्ति से ही द्रौपदी का चीर बढ़ता हुआ चला गया।
अरे भव्य प्राणी अनेक उदाहरण है जीओ और जीने दो रस से सने हुए। हनुमानजी पहाड़ को ही उठा लाए, लक्ष्मण के प्राणों की रक्षा के लिए । विष्णु कुमार महामुनि ने राजा बलि से तीन कदम जमीन माँगी थी, ब्राह्माण रूप धारण कर- विक्रिया ऋद्धि से 700 मुनियों का कष्ट दूर किया। प्रत्येक जीव यदि परमात्मा की अमृतमयी गोद में बैठना है तो होश का दीपक जगाना होगा। प्रभु के आव्हान को नेत्रों के विम्ब पर उतारकर जीओ और जीने दो के मधुर फव्वारे से सरस करें। दर्शन कला में झाँकिए, बोलना जीवन की कला है, मुस्कराना चेहरे की कला है, समझना मन की कला है, पवित्रता आत्मा की कला है, ये कलाएँ ही जीओ और जीनों के द्वार खोलती हैं। जिनके एक कंत है और एक पंथ है, उनके जीवन में बसन्त है। हे श्रावक गण- जब यह आवाज प्राणी मात्र के हृदय में समा जाऐगी, तब मन वचन – काय से पीडा न पहुंचाना भी यज्ञ है। लोभ-मोह – अहंकार पास आ ही नही सकते। हे मानव मन की आँखे खोल ताकि भीतर सड़ता नरक से बच सके।
छगन लाल जैन
रिटायर्ड अध्यापक शालीमार, अलवर
( हरसाना वाले)
सुविचार –
बिखरती रहे आपके जीवन की खुशबू ।
मुस्कराहट की एफ. डी. मत कराना,
वरना पाओगे बाधाएँ ब्याज सहित |