श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

जानो मानो मुक्ति पा लो

मनुष्य होना बस, यही परिचायक है इस बात का कि आप ज्ञानवान है आपमें सोचने, विचारने की क्षमता है। परन्तु जब कुछ अभाव या कमी हमारे अन्दर होती है तो दीनता-हीनता आ जाती है। वस्तु के सद्भाव से उत्साह जगता है। कभी माँ कह दे कि बेटा! तू तो निपट अज्ञानी है, तुझे कुछ नहीं आता तो वह हतोत्साहित हो जाता है। उसका उत्साह समाप्त हो जाता है। कोई प्रोत्साहन दे दें कि अरे! आप घबराओं नहीं आत्मा में बहुत ज्ञान भरा है अपनी योग्यताओं को निखारों तो उत्साह शक्ति बढ़ जाती है। ज्ञान हर व्यक्ति के पास है।

धरती का प्रत्येक प्राणी इतना जानता है कि मैं इस धरती पर आया हूँ तो मुझे जाना भी पड़ेगा। न कुछ मैं लेकर आया, न लेकर जाऊँगा। मात्र हमारी अच्छी बुरी करनी का फल ही साथ आता है और जाता है। जानना तो आसान है सभी जानते है परन्तु मानते सब नहीं। ज्ञान तो 11 अंग 9 पूर्व तक का ज्ञान भी हमें हो सकता। परन्तु जानना मात्र पर्याप्त नहीं। जानने के साथ-साथ दो बातें और भी होना अनिवार्य है जानने के साथ-साथ श्रद्धा, विश्वास भी उस जाने हुए पदार्थ पर होना चाहिए। और जानने के साथ मानना भी चाहिए। अर्थात् जो जाना है उसका आचरण भी होना चाहिए। जानने का कार्य तो मिथ्यादृष्टि भी करता है और सम्यग्दृष्टि भी। परन्तु जानने के साथ आस्था होना व मानना ये दो तो मात्र सम्यग्दृष्टि के ही होते है। जिनदेशना को मिथ्यादृष्टि भी जानता है परन्तु श्रद्धान रुप परिणाम सही नहीं और आचरण से तो सर्वथा शून्य ही है क्योंकि समीचीन श्रद्धा के अभाव में जो कुछ भी जाना जाता है वह मिथ्या ही होता है तथा किया गया आचरण मिथ्याचरण कहलाता है इसलिये जानने से पूर्व जो जाना है उसे विश्वास कर लो। यदि जीवन में न भी उतार पाये तो भी श्रद्धा अनंत संसार को घटाकर उपार्द्धपुद्गल परिवर्तन प्रमाण कर देती है। संसार तो घट गया मुक्ति मंजिल का टिकिट भी मिल या। परन्तु मात्र टिकिट मिलना पर्याप्त नहीं वाहन में बैठना भी अनिवार्य है। वाहन में बैठोगे तभी मंजिल मिलेगी। अतः श्रद्धा तो हो परन्तुआचरण भी अनिवार्य है। जानो पर मानो भी। जानना सम्यग्ज्ञान है तो श्रद्धा-सम्यग्दर्शन व मानना – सम्यक्चारित्र है और तीनों की एकता का नाम ही मोक्षमार्ग है तीनों की पूर्णता होने पर भी मुक्ति होती है।

जानते तो आप भी सब कुछ है। परन्तु जानने के साथ-साथ मानों भी। जानने के साथ मानोंगे तो तर जाओगे। धोखा तुम्हें दुनियाँ नहीं देती। अपितु तुम स्वयं अपने आप को धोखा देते हो। जानते हो कि शरीर अलग है आत्मा अलग। फिर भी शरीर की सेवा में ही तत्पर रहते हो। आपकी मान्यता, जानन और मानन तीनों अलग-अलग है। जब तीनों की मित्रता हो जायेगी तो मुक्ति फिर दूर नहीं।

मृत्युबोध से आत्मबोध होता है और सच्च श्रद्धान प्रकट होता है। गुरुजन आते है और कहते है कि हे वत्स! घबराओं नहीं तुम तो अनंतज्ञान के पुञ्ज हो, अनंत सुख के स्वामी हो फिर दुःख से प्रभावित होते हो। अनंतज्ञानी हो फिर अज्ञानता का दुःख क्यों पालते हो।

अनंतशक्ति संपन्न होते हुए अपने को निर्बल क्यों मानते हो। सद्‌गुरु हमें हमारी सुषुप्त शक्तियों से परिचित कराते है कि हे भव्य ! जागो !! क्यों सो रहे हो। स्वरुप को जानो, मान्यता सही करो और जो जानते हो उसे मानो। जब गुरु ऐसा उत्साह हमारे अन्दर भरते है तो लगता है मैं भी भगवान बन सकता हूँ। सब कुछ कर सकता हूँ। दीनता-हीनता समाप्त हो जाती है और उत्साह शक्ति जागृत हो जाती है। इसलिये जानो-मानो मुक्ति पा लो।

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