श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

ईमानदार मनुष्य : ईश्वर की सर्वोत्तम कृति

मानव जीवन यूं तो सब पा ही लेते हैं। परंतु मानव, मानव तब कहलाता है जब उसके जीवन में मानवता हो और मानवता वहाँ आ पाती है जहाँ जीवन में ईमानदारी हो। ईमानदार व्यक्ति कभी किसी के साथ छल कपट धोखा नहीं करता। यह एक ऐसा गुण है जो सभी गुणों पर भारी है। एक इस गुण के आने पर व्यक्ति सबका विश्वासपात्र बन जाता है। सर्वत्र आदर, सम्मान पाता है। यदि नौकर ईमानदार है तो मालिक का विश्वास पा लेता है और मालिक उसके भरोसे अपनी पूरी दुकान छोड़ देता है। यदि छात्र ईमानदार है। टीचर के हिसाब से चलता है। टीचर का प्रेम पाता है सबका चहेता बन जाता है। ईमानदार व्यक्ति का व्यक्तित्व निखरा हुआ होता है। यदि दुकानदार ईमानदार है तो उसकी दुकान पर ग्राहकों की भीड़ जमा रहती है। भगाने पर भी ग्राहक जाते नहीं। इंतजारी कर लेंगे, आज माल खत्म हो गया तो कल तक रुक जायेंगे परंतु सामग्री उसी दुकानदार से खरीदेंगे जो ईमानदार हो। क्योंकि उसने विश्वास जमाया है वे लाभ भी लेते हैं तो वह भी फिक्स होती है। सबको मालुम है फिर भी भीड़ लगी है क्योंकि ग्राहक को विश्वास रहता है कि सामग्री अच्छी ही मिलेगी। मिलावट, धोखाधड़ी नहीं होगी। एक शिष्य जो ईमानदार होता है तो गुरु का भी विश्वास पा लेता है। फिर वह गुरु से चाहे जितना भी दूर चला जाए परंतु गुरु को पूरा विश्वास रहता है कि हर कार्य करने से पूर्व मुझसे अनुमति आज्ञा लेगा, अनुशासन में रहेगा। इसके अतिरिक्त जो साधक ईमानदार होगा। वह अपने व्रतों का पालन पूरी दृढ़ता व विश्वास के साथ करेगा। क्योंकि वह अपने स्व के प्रति ईमानदार है। व्रतों में कोई दोष लगे ऐसा काम ही नहीं करेगा परंतु यदि अज्ञान या प्रमादवश कोई दोष हो भी जाए तो दुःखी होगा, मन संतापित होगा। हे भगवन्! धिक्कार है ऐसे प्रमाद व अज्ञान को जो मेरे व्रतों को दूषित करता है मैं दुष्ट हूँ, पापी हूँ, जड़बुद्धि हूँ। हे भगवन्! आप मुझे क्षमा प्रदान करें। ईमानदार साधक गुरुवर के अनुशासन का उल्लंघन नहीं करता। गुरु आज्ञा का ध्यान रखता है कि गुरुवर ने इन-इन कार्यों के लिए निषेध किया है अतः ऐसा कार्य नहीं करना अथवा यह आज्ञा प्रदान की है अतः सौभाग्य मानकर आज्ञा का पालन करना है ऐसा वही कर सकता है जो ईमानदार हो। जो गुरु आज्ञा का ही पालन नहीं कर रहा उसके व्रत भी दूषित हो जाते हैं अतः स्वयं के साथ ही छल हो रहा है और जो स्वयं के साथ छल करेगा वह निश्छल दशा को कैसे प्राप्त हो सकेगा। और जो गुरु आज्ञा व अनुशासन का पालन ठीक-ठीक प्रकार कर रहा है वह व्रतों का भी निश्छलता से पालन करेगा और एक दिन नियम से उसे निश्छल, निश्चल, अविनाशी दशा को प्राप्त कर लेगा।

ईमानदार व्यक्ति यदि मुक्ति पा लेता है तो क्या लौकिक उपलब्धियों को नहीं पायेगा। लौकिक उपलब्धियाँ तो सहजता में ही प्राप्त हो जायेगी। अतः Be honest and get salvation जो मुक्ति प्रदाता है ऐसी  ईमानदारी को धारण करने वाले ईमानदार मनुष्य ईश्वर की सर्वोत्तम कृति बन जाते हैं।

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