जैन धर्म के पौराणिक ग्रंथों, विशेषकर हरिवंश पुराण और जैन महाभारत में द्वीपायन मुनि (जिन्हें द्वैपायन भी कहा जाता है) एक अत्यंत महत्वपूर्ण पात्र हैं,उनके क्रोध और द्वारका नगरी के विनाश की कथा जैन साहित्य में कर्म के सिद्धांत को दर्शाने वाली प्रमुख घटनाओं में से एक है ।
1.पृष्ठभूमि और भविष्यववाणी:-
जैन ग्रंथों के अनुसार, भगवान नेमिनाथ (22वें तीर्थंकर) के समवशरण में श्रीकृष्ण और बलभद्र (बलराम) ने अपने भव-भवांतर और भविष्य के बारे में पूछा था,तब भगवान ने बताया था कि भविष्य में यादवों द्वारा किए गए अपमान के कारण द्वीपायन मुनि के क्रोध से द्वारका नगरी भस्म हो जाएगी ।
2.मुनि द्वारा संयम और द्वारका गमन:-
यह सुनकर द्वीपायन मुनि ने तुरंत मुनि दीक्षा (संयम मार्ग) ले ली और द्वारका से दूर अन्यत्र विहार कर गए ताकि उनके कारण कभी कोई अनर्थ न हो,लेकिन घटनाक्रम ऐसा बना कि ग्यारह वर्ष बीत जाने के बाद, वे यह मानकर कि विनाश का समय टल गया है, फिर से द्वारका लौट आए और एक पर्वत पर ध्यान (प्रतिमा योग) में लीन हो गए |
3. मुनि पर उपसर्ग (अपमान) और क्रोध:-
उधर द्वारका के यादव कुमार (शंब आदि) मद्यपान के नशे में उन्मत्त होकर वन में क्रीड़ा कर रहे थे ,घूमते हुए वे द्वीपायन मुनि के पास पहुँचे और नशे की हालत में उन पर उपद्रव (कष्ट पहुँचाना) करने लगे |इससे मुनि द्वीपायन की ध्यान अवस्था टूट गई और उनके मन में घोर क्रोध उत्पन्न हो गया
4. द्वारका का विनाश:-
अत्यधिक क्रोध के कारण मुनि के शरीर से एक भयंकर और अशुभ तेजो-पुतला (अग्नि की लपटें) बिल्ली के आकार में निकला,उस अग्नि ने पूरी द्वारका नगरी को अपनी चपेट में ले लिया ,असहाय श्रीकृष्ण और बलराम चाहकर भी आग को नहीं बुझा सके और अंततः उन्हें नगर छोड़ना पड़ा |
5.कर्म का अटल सिद्धांत:-
द्वीपायन मुनि की यह कथा जैन धर्म के कर्म-फल सिद्धांत को प्रमाणित करती है – “जो बोओगे, वही काटोगे।” मुनि को जो उपसर्ग हुआ, वह उनके पूर्व कर्मों का उदय था, और उनके क्रोध से हुआ विनाश उन यादवों के कर्मों का फल था |