पूरी दुनिया पुद्गल के परिणमन को चमत्कार मानती है।
अज्ञानी ने जो कुछ भी देखा नहीं और वैसा अप्रत्याशित रूप से घटित हो जाए तो वह उसको चमत्कार मान लेता है। जबकि वह तो पुद्गल के परमाणुओं का स्वतंत्र परिणमन है। इसमें चमत्कार जैसा कुछ नहीं है।
उदाहरण के माध्यम से समझते हैं।
जैसे वाधिराज मुनिराज को कई वर्षों तक कुष्ट रोग रहा और किसी पुण्य उदय से जब वह कुष्ट रोग दूर हुआ और मुनिराज का शरीर स्वर्ण की भाँति चमकने लगा तो जगत के लोगों को वह चमत्कार दिखाई दिया कहने लगे अरे चमत्कार हो गया।
परन्तु वह चमत्कार नहीं है।वह तो शरीर के पुद्गल परमाणुओं का स्वतंत्र परिणमन है।
चमत्कार तो यह है कि उस असहनीय रोग के काल में भी मुनिराज को एक क्षण के लिए भी उस कुष्ट रोग को दूर करने का विकल्प नहीं आया।
चमत्कार तो यह है की मुनिराज का उपयोग एक क्षण को भी उस कुष्ट रोग की तरफ नहीं गया। और एक क्षण को भी उस रोग की वजह से अपने को दुखी अनुभव नहीं किया।
ऐसा ही होता है चैतन्य का चमत्कार जो उसमें रम जाता है। उसे दूसरे बाहर के विकल्प ही नहीं आते। मुनिराज की परिणति ने तो अपने चैतन्य ( आत्मा ) का वरण कर लिया था और वह परिणति धन्य हो गई।
अब शरीर की जो अवस्था हो सो हो उनका शरीर की ओर का विकल्प ही टूट चूका था। जब कुष्ट रोग दूर हुआ तो भी वह मात्र ज्ञाता-द्रष्टा थे।
वह तो अपने अतीन्द्रिय सुख-आनंद का वेदन करते थे तो ज्ञानी के लिए या भव्य जीवों के लिए स्वयं का चैतन्य ही चमत्कार है।
एक बात और ध्यान रखना चाहिए कि रोग के काल में भी जीव अपने राग से ही दुखी है।
यदि शरीर रोग रूप परिणमन करने के लिए स्वतंत्र है तो आप भी या हम भी तत्व चिंतन पूर्वक शरीर से राग से भेद विज्ञान करने के लिए स्वतंत्र हैं और स्वयं को रोग के काल में भी सुखी अनुभव करने के लिए स्वतंत्र हैं।
यही तो है चैतन्य का सच्चा चमत्कार…!!!!
अत: कह सकते हैं की ज्ञानी जीवों को निकट भव्य जीवों को अपना चैतन्य ही चमत्कारी लगता है।और अपने चैतन्य की ही पुरुषार्थ पूर्वक साधना-आराधना करते हुए वीतरागता बढ़ाते हुए मुक्ति को प्राप्त होते हैं –पूर्ण वीतरागी होते हैं।
त्रिभुवन जैन
कोटा