प्राचीन काल में बाल-विवाह का प्रचलन बहत अधिक था। इसे सभी जातियों तथा सभी वर्गों में मान्यता प्राप्त थी। बेमेल विवाह भी खूब होते थे। लोग इन्हें भी बुरा नहीं मानते थे। जब छोटे बच्चों का विवाह होता था तब उन्हें यह मालुम तक नहीं होता था कि विवाह का अर्थ क्या है। लेकिन बाद के वर्षों में बाल-विवाह को एक कुरीति की तरह समझा जाने लगा। राजा राममोहन राय जैसे समाज-सुधारकों ने इसका घोर विरोध किया। धीरे-धीरे इनका यह आन्दोलन तेज हो गया। अब स्थिति प्रायः बदल चुकी है। बाल-विवाह निरोधक क़ानून भी बन चुका है। हालाँकि अपवाद-रूप में देश के कुछ भागों में बाल-विवाह अब भी हो जाते हैं, लेकिन कोई भी समझदार व्यक्ति बाल-विवाह को उचित नहीं ठहराता है।
जिस प्रकार बाल-विवाह का प्रचलन था, उसी प्रकार बाल-दीक्षाओं का भी प्रचलन था। वाल-विवाह का प्रवाह अब थम चुका है; लेकिन बाल-दीक्षाओं को नहीं रोका जा सका है। आज भी बाल-दीक्षाएँ खूब समारोहों के साथ दी जाती हैं और इस कृत्य को समाज और धर्म के नेता सराहते हैं। अफ़सोस इस बात का है कि हमारे धार्मिक नेता अभी तक यह नहीं समझ पाये हैं कि बाल-दीक्षा भी उसी प्रकार का अनुचित कृत्य है, जिस प्रकार का वाल-विवाह। बच्चा यह समझ भी नहीं पाता है कि दीक्षा का अर्थ क्या है और उसे मुनि बना दिया जाता है।
मैं एक बार एक महाराज जी के पास उनसे मिलने गया। कुछ धार्मिक चर्चा भी चली। चूँकि मुनि संघ कुछ बड़ा था, अतः कई अलग-अलग स्थानों पर मुनि बैठे हुए थे तथा श्रावक लोग भी उनके पास बैठे थे। आचार्य श्री के पास कुछ अधिक श्रावक थे। इतने में अनायास मेरी निगाह एक बालक पर गयी। उम्र होगी कोई आठ-नौ वर्ष। वह बालक साधु-वेश में था। मैं कुछ देर तक उसे देखता रहा। वह काफी चंचल स्वभाव का था और प्रसन्न मुद्रा में भी था। बच्चे तो उछल कूद करते ही है, अतः स्वभावतः वह भी कभी एक महाराज के पास जाता, तो कभी दूसरे के पास। सभी उसे प्यार करते और वह प्यार पा कर धन्य हो जाता। इसी प्रकार वह उन महाराज के पास भी आ गया, जिनके पास में बैठा हुआ था और फिर वह उनसे बतियाने लगा; फिर अचानक उसने एक पुस्तक उठा ली और उसे खोल कर उसमें चित्र इत्यादि ढूँढ़ने लगा। जब वह पुस्तक अच्छी नहीं लगी, तब फिर एक अच्छे गैट-अप / कवर वाली पुस्तक हाथ में ले ली तथा उलटी तरफ से खोलने लगा। फिर उसने महाराजजी से पूछा कि यह क्या है? महाराजजी ने उसे समझाया कि यह धर्म की पुस्तक है तथा इसे सीधे इस प्रकार पकड़ते हैं। बालक पुस्तक के पत्रों को फर्र-फर्र कर खोलने लगा। महाराज जी ने उसे समझाया कि ऐसा नहीं करते, पुस्तक फट जाएगी। और फिर इतना कह कर महाराज जी ने उससे वह पुस्तक वापस ले ली। महाराजजी ने उसे पुचकारते हुए उसके सिर पर हाथ फेरा और फिर वह बालक दूसरे महाराज के पास चला गया।
उसके जाने के बाद अनायास ही मैंने महाराज जी से पूछ लिया, कि ‘क्या यह बालक दीक्षित है?’ महाराज जी ने कहा- हाँ। एक बारगी तो में सन्न-सा रह गया। आगे महाराज जी ने बताया कि इसकी मुनि दीक्षा कुछ माह पूर्व ही हुई है; लेकिन दीक्षा हमारे आचार्यश्री ने नहीं दी है दूसरे आचार्य ने दी है। उनका संघ भी यहाँ आया हुआ हैं। फिर जिज्ञासा-वश महाराज जी से कुछ और प्रश्न पूछे; प्रश्नोतर कुछ इस प्रकार थे-
प्र.: ‘महाराज जी, इन नव-दीक्षित मुनि की आयु क्या होगी? शायद आठ वर्ष।’
उ.: ‘नहीं, दस वर्ष’।
प्र.: ‘क्या ये मुनि-चर्या को पूरा कर पाते हैं?’
उ. ‘हाँ, ये वही खाते-पीते हैं, जो हम लोग खाते-पीते हैं।’
प्र.: ‘क्या ये पद-विहार भी करते हैं।’
उ. ‘हाँ, लेकिन कभी-कभी हाथ-गाड़ी में भी बैठ सकते हैं।’
प्र. ‘क्या ये केशलोंच भी करते हैं?’
उ. ‘छोटी आयु के मुनि केशलोंच भी कर सकते हैं और नाई से भी बनवा सकते हैं. लेकिन केशलोंच की ‘प्रैक्टिस’ जरूर करते हैं।’
प्र.: ‘क्या ये अपने बाल अपने-आप उखाड़ पाते हैं?’
उ. ‘अधिकतर नहीं, बाल उखाड़ने में दूसरे साधु मदद करते हैं।’
प्र. ‘क्या वरिष्ठ साध्वियां भी इन नवदीक्षितों को नमस्कार करती है?’
उ. ‘करती हैं, लेकिन न करें तो कोई विशेष दोष नहीं है।’
हमारी इस बातचीत में कहीं कटुता न आ जाए इस भय से इस प्रसंग को मैंने यहीं समाप्त करना चाहा और यह कह कर कि मैं बाल-दीक्षाओं को उचित नहीं मानता हूँ, चुप हो गया। महाराजजी भी चुप रहे और फिर हमने प्रसंग बदल लिया।
इस घटना से कई प्रश्न उठ खड़े होते हैं। बाल-मुनि कभी इधर जा रहे थे, कभी उधर। कभी एक चौपड़ी देख रहे थे, तो कभी दूसरी; मन में नयी-नयी जिज्ञासाएँ लिये हुए अनेक बातें कर रहे थे। तो क्या यह सब उन्हें नहीं करना चाहिये? क्या इस प्रकार की चंचलता के लिए बाल मुनि को दोषी ठहराया जा सकता है? क्या बालक को मुनि बना देने से उसकी चंचलता को रोका जा सकता है? कदापि नहीं, क्योंकि चंचलता तो बच्चों के स्वभाव में ही होती है। गोस्वामी तुलसीदास तो बालकों की तुलना बन्दर की उछल-कूद से करते हुए कहते हैं- ‘बानर बालक एक समाना।’ बालक का स्वभाव तो चंचल होता ही है, वह तो उछल-कूद करेगा ही। यदि कोई बच्चों की उछल-कूद और चंचलता पर अंकुश लगाता है, तो यह सरासर अन्याय है, उसके बचपन, उसके नैसर्गिक स्वभाव के साथ खिलवाड़ है; अतः उछल-कूद करने आदि में भी बाल-मुनि का कोई दोष नहीं है। दोष तो वस्तुतः उन लोगों का है, जो बालक के बालपन के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं; दोष तो उन लोगों का है, जो बच्चे को बालपन का एहसास ही नहीं होने देना चाहते हैं। जब इस प्रकार की दीक्षाएँ बच्चों की नासमझी की उम्र में उन पर थोपी जाएँ तो यह अन्याय है।
बच्चों को तो जैसा सिखाया जाता है, वे वैसा ही सही मान लेते है, अच्छे-बुरे का ज्ञान तो उन्हें बड़े होने पर ही होता है। यदि बाल दीक्षित से पूछा जाए कि क्या तुम इस दीक्षा से प्रसन्न हो तो वह ‘हाँ’ में ही उत्तर देगा, क्योंकि उसे वैसा ही रटा/सिखा दिया गया होता है। उस बच्चे की स्थिति तो एक बन्धुआ मजदूर की सी हो जाती है। एक बन्धुआ मजदूर को जैसा रटा दिया जाता है, वह वैसा ही बयान कोर्ट-कचहरी तक में दे देता है; क्योंकि उसकी भावनाएँ इतनी दबा दी जाती हैं, या फिर मर जाती हैं कि वह अपना अस्तित्व ही भूल जाता है।
बच्चों को पिच्छी का रहस्य मालुम नहीं, कमण्डलु का रहस्य मालुम नहीं, फिर भी यदि उन्हें ये दे दिये जाएँ तो वह उन्हें खिलौना समझ कर ही व्यवहार करेगा। यह बात अलग है कि कुछ सीनियर (वरिष्ठ) मुनियों को भी पिच्छी- कमण्डलु का रहस्य नहीं मालुम होता है और यदि मालुम होता भी है तो वे उसे भूल जाने में ही भलाई समझते हैं तथा कभी-कभार तो उसे लड़ाई / पिटाई में भी काम में ले लेते हैं; लेकिन प्रत्येक मुनि को इसका भान होना चाहिये। जब ‘सीनियर’ मुनि तक उसके रहस्य को भूल जाते हैं, तब एक बालक से कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह उसके रहस्य को समझेगा तथा याद रख पायेगा?
सब लोग मिल कर एक छोटे बच्चे के बाल उखाड़ दें, यह तो सरासर अन्याय लगता है। शास्त्रों में यह प्रावधान है कि प्रत्येक साध्वी मुनि को नमस्कार करे चाहे मुनि कितना ही छोटा क्यों न हो। फिर होता यह है कि काफी ‘सीनियर’ साध्वी वाल-मुनियों को नमस्कार करने में हिचकिचाती हैं: इसीलिए अलिखित तौर पर यह स्वीकार कर लिया गया है कि यदि सीनियर’ साध्वी ‘नव दीक्षित’ को नमस्कार न भी करें तो कोई बाधा नहीं है। तो क्या शास्त्रों के खिलाफ मुनियों का अपमान नहीं है?
कई बार नासमझी में दी गयी दीक्षा आगे चल कर गलत साबित होती है। मुनि तथा साध्वी अपने मार्ग से हट कर अलग व्यवहार करने लगते हैं। कई धर्म तथा साधु-मार्ग को कलंकित करने वाली अरुचिकर घटनाएँ प्रकाश में आ चुकी हैं। मुनि दीक्षा देना स्कूल में दाखिला देने जैसा नहीं है, जिसमें उस अध्यापक का रिजल्ट बहुत अच्छा माना जाता है, जिसके दस में से नौ बच्चे पास हो गये हों। यहाँ तो दस में से यदि एक भी मुनि भ्रष्ट हो गया तो परिणाम (रिजल्ट) बहुत खराब ही नहीं बल्कि शून्य ही समझें। उस आचार्य के लिए तो बहुत शर्म की बात है, जिसने सही पात्र का चुनाव किये बगैर ही, अपने शिष्य बढ़ाने के लोभ में दीक्षा दे दी।
जब कभी किसी आचार्य से यह कहा जाता है कि बाल-दीक्षा उचित नहीं है, तब वे शास्त्रों के आधार पर उसे उचित ठहराते हैं। उनका यह कार्य तो उन वेदान्ती लोगों जैसा ही है, जो पशु बलि को सही मानते थे तथा वेदों (ब्रह्म वाक्यों) को खोल-खोल कर दिखाते थे। फिर हममें तथा दूसरों में क्या फर्क रह जाएगा? हम शास्त्रों का तो सहारा लें; लेकिन साथ ही अपनी बुद्धि और विवेक को भी जाग्रत रखें तभी हम उचित और अनुचित में भेद कर पायेंगे। वर्तमान परिवेश को भी नहीं नकारा जा सकता है; उसका भी भरपूर ध्यान रखना चाहिये।
आज हम सब यह महसूस करने लगे हैं कि बाल-विवाह उचित नहीं है; क्योंकि बच्चों का शरीर दाम्पत्य जीवन व्यतीत करने के लिए पूर्ण विकसित नहीं होता है। छोटी उम्र की कन्याओं का शरीर इतना पुष्ट नहीं होता कि वे गर्भ धारण कर सकें। तो हम यह कैसे मान सकते हैं कि छोटे बच्चों का शरीर त्याग और तपस्या के लिए पूर्ण रूप से विकसित हो जाता है? धर्म की साधना के लिए शरीर का परिपूर्ण विकास आवश्यक है।
अब यहाँ यह स्पष्ट हो जाना चाहिये कि बाल-दीक्षा एक अनुचित और अनैतिक कार्य है; अतः जितना जल्दी हो सके इसे जड़मूल से समाप्त कर देना चाहिये; लेकिन यह कार्य साधु और समाज दोनों के सहयोग के बिना संभव नहीं है; अतः सभी जागरूक लोगों से निवेदन है कि वे इस कार्य में आगे आयें तथा इस दुष्कृत्य को समाप्त करने का संकल्प लें।
डॉ. अनिल कुमार जैन
बापू नगर, जयपुर
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