श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

मोक्षमार्ग का अंक : सम्यग्दर्शन

जिंदगी में अंक होना चाहिए। स्कूल में वह अंक 1 है। शैशवावस्था में माँ की गोद मोक्षमार्ग पर अंक सम्यग्दर्शन है। सम्यग्दर्शन के अभाव में दिशा, दशा, चिंतन, विचार, हमारी सोच, आचरण व ज्ञान सब विपरीत हो जाता है। जो मुख पूर्व में होना चाहिए व पश्चिम में हो जाता है सम्यग्दर्शन के अभाव में सब कुछ मिथ्या रूप परिणत हो जाता है। यदि टेलीविजन का ऐंटीना सही दिशा में न हो तो टी.वी. पर चित्र सही नहीं आते मच्छर भनभनाने लगते हैं। बस इसी प्रकार मुक्ति पथ की दिशा यदि सही नहीं तो सब कुछ गड़बड़ है। आपकी चलने की रफ्तार तेज हो, चलना भी प्रशस्त गति से हो रहा हो, परन्तु यदि दिशा सही नहीं तो मंजिल कैसे मिलेगी बस उसी प्रकार कितना भी ज्ञानार्जन कर लो, तपश्चरण कर लो, व्रत, नियम संयम का पालन करो। सम्यग्दर्शन के बिना सब अधूरा है। शून्य की तरह है।

सम्यग्दर्शन कोई ऐसी वस्तु नहीं जो बाजार में मिल जाए किसी शॉप या फ्रूट की दुकान पर मिले। वह तो आत्मा की परिणति है। आप चश्मा लगाते हैं तो बहुत सारे different quality के Lence लगा-लगाकर देखे जाते हैं और distance marking भी की जाती है तब जाकर सही नम्बर का चश्मा बनता है। ठीक इसी प्रकार सम्यग्दर्शन को प्राप्त करने हेतु तत्वश्रद्धान, आत्मश्रद्धान, पाँच अस्तिकाय, छः द्रव्य, नौ पदार्थ, इन सबके प्रति श्रद्धा है तो देव, शास्त्र, गुरु के प्रति भी सच्ची श्रद्धा होगी ही।

पहले तो सच्चे देव, शास्त्र व गुरु का स्वरूप मालूम होना चाहिए कि आखिर सच्चे देव है कौन? जो वीतरागी है, सर्वज्ञ है, हितोपदेशी है वे सच्चे देव हैं। देव के स्वरूप को जान लिया परंतु श्रद्धा कहीं हमारी लौकिक प्रयोजन तक तो सीमित नहीं। यदि बीमारी ठीक हो गई तो भगवान सच्चे, यदि 1st division आया तो भगवान आप सच्चे, मेरी दुकान चले तो आप सच्चे। आपके सच्चेपन की परिभाषा सम्यक् नहीं है। क्योंकि सच्चेपन की परिभाषा हमने पहले ही देख ली कि जो राग-द्वेष से रहित है वे सच्चे परमात्मा है यदि वे आपकी डिमाण्ड की पूर्ति करते रहेंगे तो रागी हो जायेंगे कदाचित डिमाण्ड पूरी न कर पाये तो द्वेषी हो जायेंगे। फिर सच्चेपन की परिभाषा गलत हो जायेगी। इसलिए पहले सच्चे परमात्मा के स्वरूप को जानो।

एक बच्ची को मैंने एक दिन पेंसिल दे दी तो बोली माँ- मैं तो महाराज के पास जाऊँगी क्यों बेटा! महाराज पेंसिल देते हैं। प्रारंभिक अवस्था में सम्यग्दर्शन के पथ पर लाने के लिए गुरु लालच देते हैं जैसे स्कूल जाने के लिए माँ लड्डू-पेडे का लालच बच्चे को देती है। वैसे पेडे-आचार्यगण भी बांटते हैं कि कम से कम व्यक्ति भगवान् के द्वार पर तो आये। आ जाए उसके बाद आगे का पाठ पढ़ायेंगे। परंतु कुछ लोग लड्डू-पेडे तक ही सीमित रह जाते हैं वह पर्याप्त नहीं आगे भी कुछ बढ़िये। पेडे बहुत खा लिये अब कुछ आगे भी बढ़े। आचार्य कहते हैं- देखो बेटा! ये राग-द्वेष से रहित, वीतरागी परमात्मा है जो सब कुछ जानते हैं और हित का उपदेश देते हैं। इनके जैसा ही हमें बनना है। जब हमारा ज्ञान सम्यक् नहीं होता तो दर्शन करते हुए भी दर्शन नहीं कर पाते, भगवान् के पास तो गये परंतु घर-परिवार, दुकान मकान ही दिखता है प्रभु नहीं दिख पाते। इसीलिए दर्शन कैसे करें? उसकी प्रक्रिया का ज्ञान भी होना चाहिए। सम्यग्दर्शन के बिना सच्चा दर्शन नहीं हो पाता। यदि परमात्मा पर सच्ची श्रद्धा है तो परमात्मा का स्वरूप दिखता है। सम्यग्दर्शन के अभाव में दर्शन करते हुए भी बिना दर्शन के रह जाते हैं। दर्शन के समय अन्य काम स्थिगितकर दें व भगवान में उपयोग को केंद्रित करें।

एक सज्जन बड़े प्रभु भक्त थे। वे भक्ति इतनी तल्लीनता से करते हैं कि फिर और कुछ नहीं करना। नृत्य गान, वस्त्राभूषण पहन कर करते थे और नौकरों को कह देते थे जब तक मेरी भक्ति चल रही है कोई सूचना समाचार मुझे न दिया जाए।

यही सच्ची भक्ति है जिसमें परमात्मा ही परमात्मा नजर आये। परमात्मा के सिवाय और कुछ भी नजर न आये। जैसे अर्जुन को अपना लक्ष्य ही दिखता था। पू.आ. विमल सागर जी सोनागिर जब पहुँचे भगवान चंद्रप्रभु की परिक्रमा लगा रहे थे सामने बड़ी-बड़ी शिलाएं थी। वे उन्हें नमस्कार करने लगे। लोगों ने नमस्कार करने का कारण पूछा तो बोले- तुम्हे इतनी इतनी खड़गासन, प‌द्मासन प्रतिमाएँ नहीं दिखाई दे रही। ये श्रद्धा के नेत्र थे जो पत्थरों में परमात्मा को देख रहे थे। यही सच्ची श्रद्धा है।

भगवान का आदर सम्मान, विनय हर्ष भाव सम्यग्दृष्टि को होता है। सम्यग्दृष्टि को देव, शास्त्र, गुरु के समागम से आत्मिक आल्हाद होता है हर्षभाव होता है। यही हर्ष उसकी आंतरिक समीचीन श्रद्धा का प्रतीक है। सम्यग्दृष्टि रत्नत्रय देखता है। मिथ्यादृष्टि-शरीर देखता है। मिथ्यादृ‌ष्टि शरीर की भक्ति करता है। सम्यग्दृष्टि रत्नत्रय से मंडित आत्मा की आराधना करता है। सम्यग्दृष्टि कहता है-

(1) ‘गुणी जनो को देख-हृदय में मेरे प्रेम उमड़ आवे। बने जहाँ तक उनकी सेवा करके यह मन सुख पावे ।।’

(2) ‘रहे सदा सत्संग उन्हीं का, ध्यान उन्हीं का नित्य रहे। उन ही जैसी चर्या में यह, चित्त सदा अनुरक्त रहे।’ दर्शन पाकर भक्त कहता है-

मो उर हर्ष ऐसो भयो, मनु रंक चिंतामणि लयो।

जब कोहिनूर हीरा की कीमत मापना कठिन है तो चिंतामणी की क्या कहें? चिंतामणी रत्न के सामने मात्र चिंतन से वस्तु मिल जाती है। किसी भिखारी को वह रत्न मिल जाए तो कितना खुश होता है उसी प्रकार सच्चा भक्त सम्यग्दृष्टि परमात्मा को, गुरुओं को पाकर वैसा ही खुश हो जाता है। जीवन को धन्य मानता है।

भगवान वीतरागी, सर्वज्ञ है अतः जो कहते हैं वह सत्य ही कहते हैं, उनकी वाणी ही जिनवाणी है इसलिए श्रद्धा का स्थान है। साधुओं की तपस्या को देखते है श्रद्धा से मस्तक झुक जाता है। आत्महित के लिए साधु बना जाता है। ज्ञान, ध्यान, तप में लीन साधु ही सच्चे गुरु हैं। वे ही हमारी श्रद्धा के स्थान होते हैं। उनके प्रति श्रद्धा जमाकर जीवन के सम्यक् अंक को पा लीजिए। परमार्थ के अंक को यदि आपने पा लिया तो मुक्ति रूपी अंक की प्राप्ति शीघ्र हो जायेगी।

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