पहले इंसान संयुक्त परिवार में रहता था। बचपन से ही इंसान को बहुत सारे रिश्ते देखने को मिलते थे, जैसे दादा-दादी, चाचा – चाची, उसके बाद बुआ – फूफा, नाना – नानी, मामा – मामी, मौसा – मौसी, यह सब रिश्ते बच्चों को बचपन में ही समझाए जाते थे और इन सभी के द्वारा बच्चों को बेहद प्रेम और स्नेह मिलता था। बच्चों की परवरिश आत्मीयता के साथ होती थी। एक घर में कई बच्चे होते थे, छोटे बच्चों को प्रेम करने के लिए उसके बड़े भाई बहन हुआ करते थे। सब बहुत खुश रहा करते थे सब लोगों के बीच में गहन भाईचारा हुआ करता था। घर में कभी भी एक सदस्य को कोई तकलीफ होती थी तो सभी उसकी मदद के लिए तत्पर हो जाते थे, घर के किसी सदस्य को खांसी भी आ जाती थी तो कुछ लोग तुरंत उसकी पीठ सहलाने लगते थे, बड़े बुजुर्ग उसके सिर पर हाथ फैरने लगते थे, घर की बुजुर्ग महिला कोई ना कोई घरेलू नुस्खा बताती थी और उस नुस्खे को घर की ओर महिलाएं तुरंत तैयार करके लाती थी और उसे दवा के रूप में पिलाया जाता था। और वह ठीक हो जाता था यानी कि कहने का मतलब है कि सभी लोग बहुत प्यार और भाईचारे के साथ रहते थे। सभी लोगों के दिल में संवेदनाएं होती थी और घर में भेदभाव नहीं हुआ करता था। अपना बच्चा और अपने भाई के बच्चे में कोई अंतर नहीं हुआ करता था, यहां तक की पड़ोसियों के बच्चों को भी उतना ही प्रेम दिया जाता था जितना अपने बच्चों को दिया जाता है। बच्चे कैसे पल जाते थे पता भी नहीं चलता था।
धीरे-धीरे समय परिवर्तित हुआ संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार में रहना लोग ज्यादा पसंद करने लगे। अब लोग घर में नहीं फ्लैट में रहना पसंद करने लगे। लोगों के अंदर उपभोक्तावादी सोच ने घर बना लिया, हर व्यक्ति सिर्फ अपने फायदे के बारे में सोचने लगा। रिश्ते और लोग सब युज एंड थ्रो की सोच पर चलने लगे। दुनिया और दुनिया की सोच बिल्कुल परिवर्तित हो गई , अब लोग अकेले रहने लगे तथा दुख दर्द बांटने वाला कोई नहीं होता है। इंसान अपनी सारी फ्रस्ट्रेशन अपने परिवार पर निकलने लगा लोगों के अंदर तनाव बढ़ गया, डिप्रेशन में जीने लगे। आत्महत्या ज्यादा होने लगी, तलाक बहुत ज्यादा होने लगे। परिवार सीमित हो गया, रिश्ते धीरे-धीरे सब खत्म हो गए।
इसका मूल कारण है पश्चिमी सोच। हम लोग अपने मूल सिद्धांतों को भूलकर पश्चिमी देशों की सोच को फॉलो करने लग गए हम उनके जैसे रहन-सहन उनके जैसा खान-पान उनके जैसा जीवन जीने की कोशिश कर रहे हैं। ना हम उनके जैसे बन पा रहे हैं और ना हम पूर्णतया भारतीय रह पा रहे हैं। हम बीच में लटक गए हैं कि ना इधर के रहे ना उधर के रहे। एक कहावत है कि धोबी का कुत्ता घर का ना घाट का हमारी भी स्थिति कुछ इसी तरह की हो गई है। उन लोगों का रहन-सहन उन लोगों का खानपान उन लोगों का जीवन जीने का तरीका उनके वहां की जलवायु के अनुसार होता है। उनके यहां बहुत सारी चीज मजबूरी में उन्हें करनी पड़ती है और हम खम्मा का ही उनको देखकर यह सारी चीज़ फॉलो कर रहे हैं, जैसे उनके यहां सर्दी ज्यादा पड़ती है तो वह शादी में सूट पहनते हैं ,उनके यहां सर्दी ज्यादा पढ़ने की वजह से वह तला भुना ज्यादा मसालेदार भोजन करते हैं और हम लोग उनको फॉलो करने के चक्कर में गर्मी में सूट पहन कर शादी कर रहे हैं और तला भुना खा रहे हैं। जबकि हमारे यहां की जलवायु पहले ही बहुत गर्म है इसलिए हमारा रहन-सहन खान सब अलग तरीके से होना चाहिए। लेकिन हम उनको देखकर सड़ा गला तेज मसाले वाला जंक फूड खा रहे हैं जिसकी वजह से हम लोगों के शरीर में न जाने कितने प्रकार के रोग पनपने लगे हैं मुझे सोच के आश्चर्य होता है कि हमारे यहां पाइल्स जैसी बीमारी हर दूसरे व्यक्ति में हो रही है जबकि यह बीमारी बहुत ज्यादा गर्मी बढ़ने से होती है और भी बहुत सारी बीमारियां हैं जो हमारे देश में जंक फूड खाने की वजह से पनप रही है। लगभग 50 साल पहले की बात करें तो हमारे देश में लोग बीमार ही नहीं हुआ करते थे और अगर कोई छोटी-मोटी बात होती थी तो घरेलू इलाज से ही सही हो जाया करते थे , लेकिन आज बीमारी से हॉस्पिटल भरे हुए हैं
हम लोग पश्चिमी सोच से इतने प्रभावित है कि हम फटे कपड़े पहनना ऑड़े टेढ़े बाल बनाना शरीर के न जाने कैसे-कैसे अंगों पर टैटू बनवाना फैशन के नाम पर आज के युवा लड़के और लड़कियां वह सब कर रहे हैं कि उन्हें देखकर कोई भी
सभ्य व्यक्ति शर्मा सार हो जाए और उस पर यह नए-नए आडंबर लिव इन कॉन्सेप्ट , समलैंगिक विवाह जैसे बढ़ते हुए प्रचलन ने हमारे देश की संस्कृति को धूमिल कर दिया है। हम इंसान से जानवर बनने की तरफ अग्रसर है।
माना की परिवर्तन संसार का नियम है लेकिन कुछ परिवर्तन हमारे लिए अच्छे होते हैं तो कुछ परिवर्तन हमारे लिए बर्बादी के कारण भी बन सकते हैं। ऐसे परिवर्तन हमें पतन के रास्ते पर ले जाते हैं। हमें दुनिया के साथ कम से कम मिलने के लिए कुछ परिवर्तन आवश्यक है जैसे टेक्नोलॉजी में दुनिया बहुत आगे जा रही है और हमें भी दुनिया की बराबरी करने के लिए टेक्नोलॉजी को अपनाना जरूरी है। लेकिन टेक्नोलॉजी का सही तरीके से इस्तेमाल करके हमें अपने देश को आगे बढ़ाने में सहयोग करना चाहिए ना की टेक्नोलॉजी के गुलाम बनकर अपने आप को अपने देश को बर्बादी की तरफ ले जाना चाहिए। इसी प्रकार बहुत सारी जगह है जहां हम अपने आप को परिवर्तित करके अपने देश को बहुत आगे बढ़ा सकते हैं, लेकिन कुछ चीज सारस्वत होती है ,वह कभी भी परिवर्तित नहीं होती है जैसे सूरज पूर्व से निकलता है और पश्चिम में जाकर छुप जाता है। वह सारस्वत है हमेशा इसी प्रकार चलता है इसी प्रकार हमारे बहुत सारे सिद्धांत हैं जो सारस्वत है और उन्हें परिवर्तन करने की कोशिश भी करना अपने आप को पतन की ओर ले जाना है।
अंत में बस इतना ही कहना चाहूंगा कि बदलाव उतना करो कि हम और हमारा देश आगे बढ़ सके और हमें देखकर दुनिया का हर व्यक्ति हमारे देश पर गर्व कर सके। बदलाव ऐसा ना करें कि हमें देखकर हमारे देश और संस्कृति का मजाक उड़ाया जाए और हम जोकर कहलाने लगे।
महेंद्र कुमार जैन
अलवर