1. प्रेम और परमात्मा
संतो की उपदेश देने की रीति-नीति भी अनूठी होती है. कई संत अपने पास आने वाले से ही प्रश्न करते है और उसकी जिज्ञासा को जगाते है; और सही-सही मार्गदर्शन कर देते है.आचार्य रामानुजाचार्य एक महान संत एवं संप्रदाय-धर्म के आचार्य थे . दूर दूर से लोग उनके दर्शन एवं मार्गदर्शन के लिए आते थे. सहज तथा सरल रीति से वे उपदेश देते थे.
एक दिन एक युवक उनके पास आया और पैर में वंदना करके बोला :“मुझे आपका शिष्य होना है. आप मुझे अपना शिष्य बना लीजिए.” संत रामानुजाचार्य ने तब कहा : “इसका अर्थ है कि तुझे परमात्मा से प्रीति करनी है. परन्तु मुझे एक बात बता दे कि क्या तुझे तेरे घर के किसी व्यक्ति से प्रेम है ?” युवक ने कहा : “ना, किसीसे भी मुझे प्रेम नहीं.” तब फिर संतश्री ने पूछा : “तुझे तेरे माता-पिता या भाई-बहन पर स्नेह आता है क्या ?” युवक ने नकारते हुए कहा ,“मुझे किसी पर भी तनिकमात्र भी स्नेह नहीं आता. पूरी दुनिया स्वार्थपरायण है, ये सब मिथ्या मायाजाल है. इसीलिए तो मै आपकी शरण में आया हूँ.” तब संत रामानुज ने कहा : “बेटा, मेरा और तेरा कोई मेल नहीं. तुझे जो चाहिए वह मै नहीं दे सकता.” युवक यह सुन स्तब्ध हो गया. उसने कहा : “संसार को मिथ्या मानकर मैने किसी से प्रीति नहीं की. परमात्मा के लिए मैं इधर-उधर भटका. सब कहते थे कि परमात्मा के साथ प्रीति जोड़ना हो तो संत रामानुजके पास जा; पर आप तो इन्कार कर रहे है.”संत रामानुज ने कहा : “यदि तुझे तेरे परिवार से प्रेम होता, जिन्दगी में तूने तेरे निकट के लोगों में से किसी से भी स्नेह किया होता तो मै उसे विशाल स्वरुप दे सकता था . थोड़ा भी प्रेमभाव होता, तो मैं उसे ही विशाल बना के परमात्मा के चरणों तक पहोंचा सकता था . छोटे से बीजमें से विशाल वटवृक्ष बनता है. परन्तु बीज तो होना चाहिए. जो पत्थर जैसा कठोर एवं शुष्क हो उस में से प्रेम का झरना कैसे बहा सकता हूँ ? यदि बीज ही नहीं तो वटवृक्ष कहाँ से बना सकता हूँ ? तूने किसी से प्रेम किया ही नहीं, तो तेरे भीतर परमात्मा के प्रति प्रेम की गंगा कैसे बहा सकता हूँ
कहानी का सार ये है कि जिसे अपने निकट के भाई-बंधुओं से प्रेमभाव नहीं, उसे ईश्वर से प्रेम भाव नहीं हो सकता. हमें अपने आस पास के लोगों और कर्तव्यों से मुंह नहीं मोड़ सकते। यदि हमें आध्यात्मिक कल्याण चाहिए तो अपने धर्म-कर्तव्यों का भी उत्तम रीति से पालन करना होगा।
2. गरीब किसान और ईश्वर की दया
एक छोटे से गाँव में एक गरीब किसान रहता था जिसका नाम रामू था। रामू बहुत मेहनती और ईश्वरभक्त था, लेकिन उसकी फसलें अक्सर खराब हो जाती थीं और वह कठिनाइयों का सामना करता था। एक दिन, उसने ईश्वर से प्रार्थना की और कहा, “हे प्रभु, मुझे अपना आशीर्वाद दें ताकि मैं अपनी स्थिति सुधार सकूं।” उसी रात, रामू ने एक सपने में देखा कि ईश्वर उसके पास आए और बोले, “रामू, यदि तुम सच्चे दिल से मेहनत करते रहोगे और अपने काम में विश्वास बनाए रखोगे, तो मैं तुम्हारी मदद करूंगा।”
रामू ने सपने को सत्य मानकर पूरी श्रद्धा और मेहनत से काम करना शुरू कर दिया। उसने अपने खेत में नई तकनीकों का इस्तेमाल किया और दिन-रात मेहनत की। धीरे-धीरे, उसकी मेहनत रंग लाई और उसकी फसलें बेहतरीन हो गईं। गाँव के लोग उसकी सफलता देखकर हैरान रह गए और उन्होंने उससे सफलता का रहस्य पूछा। रामू ने विनम्रता से कहा, “यह सब ईश्वर की कृपा और मेरी सच्ची मेहनत का परिणाम है।”
मोरल: सच्ची मेहनत और ईश्वर पर विश्वास से सभी मुश्किलें आसान हो जाती हैं।
3. अंधी महिला और अनुग्रह
एक छोटे से कस्बे में एक अंधी महिला रहती थी जिसका नाम सुनीता था। सुनीता बहुत ही विनम्र और दयालु थी, और अपने आस-पास के लोगों की मदद करती रहती थी। एक दिन, कस्बे में एक बड़ा मेला लगा और सुनीता ने वहां जाने की इच्छा जताई। उसके पड़ोसियों ने कहा, “तुम्हें वहाँ जाने से क्या मिलेगा? तुम तो देख भी नहीं सकती।” लेकिन सुनीता ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं तो बस वहाँ का माहौल महसूस करना चाहती हूँ।”
सुनीता मेले में गई और उसने अपने आसपास की खुशियों को महसूस किया। अचानक, एक सज्जन ने उसे देखा और उसकी मासूमियत और विनम्रता से प्रभावित होकर उससे बातचीत करने लगे। उन्होंने सुनीता की आंखों के ऑपरेशन का खर्च उठाने का प्रस्ताव दिया। सुनीता हैरान थी, लेकिन उसने ईश्वर का धन्यवाद किया और प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। ऑपरेशन सफल रहा और सुनीता की दृष्टि वापस आ गई। उसने अपनी नई जिंदगी का आनंद लिया और सभी को बताया, “जब हम दुनिया को अपनी आत्मा की नजरों से देखते हैं, तो हमें ईश्वर की अनुकंपा प्राप्त होती है।”
मोरल: असल सुंदरता आत्मा की होती है, और सच्चे मन से देखी गई चीजें अनुग्रह प्राप्त करती हैं।
4. चमत्कारी पेड़
एक छोटे से गाँव में एक प्राचीन पेड़ था जिसे लोग ‘चमत्कारी पेड़’ कहते थे। कहते थे कि जो भी सच्चे दिल से प्रार्थना करता था, उसकी इच्छा पूरी होती थी। गाँव के सभी लोग उस पेड़ की पूजा करते थे। एक दिन, गाँव में एक गरीब विधवा महिला अपने छोटे बेटे के साथ आई। उसने सुना था कि पेड़ चमत्कार करता है, इसलिए उसने पेड़ के नीचे प्रार्थना की, “हे ईश्वर, मेरे बेटे की अच्छी शिक्षा और सुखी भविष्य के लिए मेरी मदद करें।”
महिला ने दिल से प्रार्थना की और उसके बाद, उसने अपने बेटे की शिक्षा के लिए पैसे इकट्ठा करने के लिए मेहनत करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे, लोग उसकी मदद करने लगे और उसकी मेहनत रंग लाई। उसका बेटा पढ़ाई में अव्वल रहा और बड़े होकर एक सफल इंसान बना। गांव वालों ने देखा कि उसकी प्रार्थना सच में फली-फूल गई है और वे पेड़ की चमत्कारिकता पर और भी विश्वास करने लगे।
मोरल: सच्ची प्रार्थना और मेहनत का फल अवश्य मिलता है।
5. आशा की किरण
एक गाँव में एक युवा लड़का था जिसका नाम अर्जुन था। अर्जुन बहुत होशियार और मेहनती था, लेकिन उसके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। उसे अपनी पढ़ाई के लिए हमेशा कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। एक दिन, गाँव के स्कूल में एक प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसमें सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले बच्चे को एक छात्रवृत्ति मिलनी थी। अर्जुन ने इस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और पूरी मेहनत से तैयारी की।
प्रतियोगिता का दिन आया और अर्जुन ने अपनी पूरी क्षमता से भाग लिया। परिणाम घोषित होने पर, अर्जुन को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ और उसे छात्रवृत्ति मिल गई। अब वह अपनी पढ़ाई जारी रख सका और आगे चलकर एक सफल इंजीनियर बना। अर्जुन ने अपनी सफलता का श्रेय अपनी मेहनत और ईश्वर की कृपा को दिया। उसके सफलता की कहानी गाँव के सभी बच्चों के लिए प्रेरणा बन गई।
मोरल: कठिनाइयाँ हमें मजबूत बनाती हैं और सफलता की ओर ले जाती हैं।
6. सम्बन्धों में हानि लाभ नहीं देखा जाता
विनोद हाईवे पर गाड़ी चला रहा था।
सड़क के किनारे उसे एक 12-13 साल की लड़की तरबूज बेचती दिखाई दी। विनोद ने गाड़ी रोक कर पूछा “तरबूज की क्या रेट है बेटा? ” लड़की बोली ” 50 रुपये का एक तरबूज है साहब।”
पीछे की सीट पर बैठी विनोद की पत्नी बोली ” इतना महंगा तरबूज नही लेना जी। चलो यहाँ से। “विनोद बोला “महंगा कहाँ है इसके पास जितने तरबूज है कोई भी पांच किलो के कम का नही होगा। 50 रुपये का एक दे रही है तो 10 रुपये किलो पड़ेगा हमें। बाजार से तो तू बीस रुपये किलो भी ले आती है। ”
विनोद की पत्नी ने कहा तुम रुको मुझे मोल भाव करने दो।” फिर वह लड़की से बोली “30 रुपये का एक देना है तो दो वरना रहने दो। ” लड़की बोली ” 40 रुपये का एक तरबूज तो मै खरीद कर लाती हूँ आंटी। आप 45 रुपये का एक ले लो। इससे सस्ता मै नही दे पाऊँगी।”
विनोद की पत्नी बोली” झूठ मत बोलो बेटा। सही रेट लगाओ देखो ये तुम्हारा छोटा भाई है न? इसी के लिए थोड़ा सस्ता कर दो।” उसने खिड़की से झाँक रहे अपने चार वर्षीय बेटे की तरफ इशारा करते हुए कहा।
सुंदर से बच्चे को देख कर लड़की एक तरबूज हाथों मे उठाते हुए गाड़ी के करीब आ गई। फिर लड़के के गालों पर हाथ फेर कर बोली ” सचमुच मेरा भाई तो बहुत सुंदर है आँटी।” विनोद की पत्नी बच्चे से बोली “दीदी को नमस्ते बोलो बेटा। ” बच्चा प्यार से बोला “नमस्ते दीदी। लड़की ने गाड़ी की खिड़की खोल कर बच्चे को बाहर निकाल लिया फिर बोली ” “तुम्हारा नाम क्या भैया? ”
लड़का बोला ” मेरा नाम गोलू है दीदी। ” बेटे को बाहर निकालने के कारण विनोद की पत्नी कुछ असहज हो गई। तुरंत बोली “अरे बेटा इसे वापस अंदर भेजो। इसे डस्ट से एलर्जी है।”लड़की उसकी आवाज पर ध्यान न देते हुए लड़के से बोली “तु तो सचमुच गोल मटोल है रे भाई। तरबूज खाएगा? “लड़के ने हाँ मे गर्दन हिलाई तो लड़की ने तरबूज उसके हाथों मे थमा दिया।
पाँच किलो का तरबूज गोलू नही संभाल पाया। तरबूज फिसल कर उसके हाथ से नीचे गिर गया और फूट कर तीन चार टुकड़ों मे बंट गया। तरबूज के गिर कर फुट जाने से लड़का रोने लगा।
लड़की उसे पुचकारते हुए बोली अरे भाई रो मत। मै दूसरा लाती हूँ। फिर वह दौड़कर गई और एक और बड़ा सा तरबूज उठा लाई।
जब तक वह तरबूज उठा कर लाई इतनी देर मे विनोद की पत्नी ने बच्चे को अंदर गाड़ी मे खींच कर खिड़की बन्द कर ली। लड़की खुले हुए शीशे से तरबूज अंदर देते हुए बोली “ले भाई ये बहुत मिठा निकलेगा।” विनोद चुपचाप बैठा लड़की की हरकतें देख रहा था।
विनोद की पत्नी बोली “जो तरबूज फूटा है मै उसके पैसे नही दूँगी। वह तुम्हारी गलती से फूटा है। “लड़की मुस्कराते हुए बोली “उसको छोड़ो आंटी। आप इस तरबूज के पैसे भी मत देना। ये मैने अपने भाई के लिए दिया है। ”
इतना सुनते ही विनोद और उसकी पत्नी दोनों एक साथ चौंक पड़े। विनोद बोला ” नही बिटिया तुम अपने दोनों तरबूज के पैसे लो।” फिर सौ का नोट उस लड़की की तरफ बढ़ा दिया। लड़की हाथ के इशारे से मना करते हुए वहाँ से हट गई। औ अपने बाकी बचे तरबुजों के पास जाकर खड़ी हो गई।
विनोद भी गाड़ी से निकल कर वहाँ आ गया था। आते ही बोला “पैसे ले लो बेटा वरना तुम्हारा बहुत बड़ा नुकसान हो जाएगा।” लड़की बोली “माँ कहती है जब बात सम्बन्धों की हो तो हानि लाभ नही देखा जाता। आपने गोलू को मेरा भाई बताया मुझे बहुत अच्छा लगा। मेरा भी एक छोटा सा भाई था मगर..”
विनोद बोला “क्या हुआ तुम्हारे भाई को? ”
वह बोली “जब वह दो साल का था तब उसे रात मे बुखार हुआ था। सुबह माँ हॉस्पिटल मे ले जा पाती उससे पहले ही उसने दम तौड़ दिया था। मुझे मेरे भाई की बहुत याद आती है। उससे एक साल पहले पापा भी ऐसे ही हमे छोड़ कर गुजर गए थे।
विनोद की पत्नी बोली “ले बिटिया अपने पैसे ले ले। ” लड़की बोली “पैसे नही लुंगी आंटी।”
विनोद की पत्नी गाड़ी मे गई फिर अपने बैग से एक पाजेब की जोड़ी निकाली। जो उसने अपनी आठ वर्षीय बेटी के लिए आज ही तीन हजार मे खरीदी थी। लड़की को देते हुए बोली। तुमने गोलू को भाई माना तो मै तुम्हारी माँ जैसी हुई ना। अब तू ये लेने से मना नही कर सकती।
लड़की ने हाथ नही बढ़ाया तो उसने जबरदस्ती लड़की की गोद मे पाजेब रखते हुए कहा “रख ले। जब भी पहनेगी तुझे हम सब की याद आयेगी। “इतना कहकर वह वापस गाड़ी मे जाकर बैठ गई।
फिर विनोद ने गाड़ी स्टार्ट की और लड़की को बाय बोलते हुए वे चले पड़े। विनोद गाड़ी चलाते हुए सोच रहा था कि भावुकता भी क्या चीज है। कुछ देर पहले उसकी पत्नी दस बीस रुपये बचाने के लिए हथकण्डे अपना रही थी।कुछ देर मे ही इतनी बदल गई जो तीन हजार की
पाजेब दे आई।
फिर अचानक विनोद को लड़की की एक बात याद आई “सम्बन्धों में हानि लाभ में नही देखा जाता।”
विनोद का प्रॉपर्टी के विवाद को लेकर अपने ही बड़े भाई से कोर्ट मे मुकदमा चल रहा था।।
उसने तुरंत अपने बड़े भाई को फोन मिलाया। फोन उठाते ही बोला ” भैया मै विनोद बोल रहा हूँ। ”
भाई बोला “फोन क्यों किया? ” विनोद बोला “भैया आप वो मैन मार्केट वाली दुकान ले लो। मेरे लिए मंडी वाली छोड़ दो। और वो बड़े वाला प्लॉट भी आप ले लो। मै छोटे वाला ले लूंगा। मै कल ही मुकदमा वापस ले रहा हूँ। ” सामने से काफी देर तक आवाज नही आई।
फिर उसके बड़े भाई ने कहा “इससे तो तुम्हे बहुत नुकसान हो जाएगा छोटे? “विनोद बोला ” भैया आज मुझे समझ मे आ गया है सम्बन्धों में हानि लाभ नही देखा जाता। एक दूसरे की खुशी देखी जाती है। उधर से फिर खानोशी छा गई। फिर विनोद को बड़े भाई की रोने की आवाज सुनाई दी।
विनोद बोला “रो रहे हो क्या भैया?” बड़ा भाई बोला ” इतने प्यार से पहले बात करता तो सब कुछ मै तुझे दे देता रे। अब घर आ जा। दोनों प्रेम से बैठ कर बंटवारा करेंगे। इतनी बड़ी कड़वाहट कुछ मीठे बोल बोलते ही न जाने कहाँ चली गई थी। कल जो एक एक इंच जमीन के लिए लड़ रहे थे वे आज भाई को सब कुछ देने के लिए तैयार हो गए थे।
कहानी का मोरल:-
त्याग की भावना रखिये। अगर हमेशा देने को तत्पर रहोगे तो लेने वाले का भी हृदय परिवर्तन हो जाएगा।
याद रखें सम्बंधों में हानि लाभ नही देखा जाता।
अपनो को निकट रखने के लिए अपना अधिकार भी छोड़ना पड़ता है