श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

पर्युषण एवं दशलक्षण पर्व

आत्मशुद्धि, आत्मचिंतन और आत्मजागरण का महापर्व

“क्षमा वीरस्य भूषणम्” — क्षमा वीरों का आभूषण है।
जैन धर्म में पर्व केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं हैं, बल्कि वे आत्मा को पहचानने, अपने जीवन का मूल्यांकन करने और स्वयं को भीतर से बेहतर बनाने के अवसर हैं। इसी दृष्टि से पर्युषण महापर्व एवं दशलक्षण पर्व का विशेष महत्व है। यह वह समय है जब मनुष्य कुछ समय के लिए बाहरी संसार की भागदौड़ से स्वयं को अलग कर अपने भीतर झाँकने का प्रयास करता है।
श्वेताम्बर परंपरा में पर्युषण सामान्यतः आठ दिनों का और दिगम्बर परंपरा में दशलक्षण पर्व दस दिनों का होता है। दोनों परंपराओं की अपनी विशिष्ट धार्मिक विधियाँ एवं परंपराएँ हैं, परंतु दोनों का मूल संदेश एक ही है—आत्मा की शुद्धि, कर्मों की निर्जरा, संयम, तप, स्वाध्याय, आत्मचिंतन और सभी जीवों के प्रति मैत्री।

पर्व नहीं, आत्मा का उत्सव
आज हम अनेक प्रकार के उत्सव मनाते हैं। अधिकांश उत्सवों में बाहरी सजावट, खान-पान, मनोरंजन और सामाजिक मिलन प्रमुख होते हैं। लेकिन पर्युषण और दशलक्षण हमें एक अलग प्रकार का उत्सव सिखाते हैं—अपने भीतर के गुणों को जागृत करने का उत्सव।
‘पर्युषण’ को आत्मा के निकट आने, आत्मचिंतन करने और कर्मों के क्षय की साधना से जोड़ा गया है। इन दिनों में जैन श्रावक अपनी दैनिक व्यस्तताओं को कुछ कम करके धार्मिक अध्ययन, पूजा, ध्यान, सामायिक, प्रतिक्रमण, तप और संयम की ओर अधिक ध्यान देते हैं।

इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है—
“मैंने पिछले वर्ष क्या किया?”
“मेरे कारण किसे दुःख पहुँचा?”
“मेरे भीतर कौन-से दोष बढ़े?”
“मैं अपने जीवन को कैसे बेहतर बना सकता हूँ?”
यही आत्मचिंतन पर्युषण की वास्तविक शुरुआत है।

दशलक्षण पर्व और आत्मा के दस धर्म
दिगम्बर परंपरा में पर्युषण के पश्चात् दशलक्षण पर्व दस दिनों तक मनाया जाता है। प्रत्येक दिन आत्मा के एक सर्वोत्तम गुण पर चिंतन एवं साधना की जाती है। ये दस धर्म हैं—उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य।

1. उत्तम क्षमा — क्रोध पर विजय
क्षमा केवल किसी दूसरे की गलती को माफ कर देना नहीं है। वास्तविक क्षमा का अर्थ है—अपने भीतर के क्रोध, द्वेष और प्रतिशोध की भावना को समाप्त करना।
जब हम किसी व्यक्ति से वर्षों तक नाराज रहते हैं, तो वास्तव में हम दूसरे को नहीं, स्वयं को ही पीड़ा देते हैं। क्षमा मन को हल्का करती है और आत्मा को शांति प्रदान करती है।
हमें स्वयं से पूछना चाहिए—क्या मेरे मन में किसी के प्रति पुराना वैर है? यदि है, तो इस पर्व पर उसे समाप्त करने का प्रयास करें।

2. उत्तम मार्दव — विनम्रता
अहंकार मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप से दूर कर देता है। धन, पद, प्रतिष्ठा, ज्ञान या सामाजिक स्थिति स्थायी नहीं हैं।
विनम्रता हमें याद दिलाती है कि जीवन में जो कुछ मिला है, उसमें अनेक लोगों का सहयोग है।
सच्चा ज्ञान वही है जो व्यक्ति को विनम्र बनाए।

3. उत्तम आर्जव — सरलता
मन, वचन और कर्म में एकरूपता ही आर्जव है।
आज जीवन में दिखावा बहुत बढ़ गया है। हम जो सोचते हैं, वह हमेशा बोलते नहीं और जो बोलते हैं, उसे हमेशा करते नहीं। आर्जव हमें सरल, निष्कपट और ईमानदार जीवन की प्रेरणा देता है।
जैसा मन में हो, वैसा ही व्यवहार में हो—यही सरलता है।

4. उत्तम शौच — संतोष और आंतरिक पवित्रता
शौच का अर्थ केवल बाहरी स्वच्छता नहीं है। वास्तविक शौच मन की पवित्रता है—लोभ, ईर्ष्या, लालच और असंतोष से मुक्त होना।
भौतिक सुविधाएँ बढ़ती जा सकती हैं, लेकिन यदि इच्छाएँ लगातार बढ़ती रहें तो मनुष्य कभी संतुष्ट नहीं हो सकता।
इसलिए दशलक्षण हमें सिखाता है—
कम वस्तुओं में अधिक संतोष और अधिक संतोष में अधिक सुख।

5. उत्तम सत्य — सत्य का आचरण
सत्य केवल झूठ न बोलने का नाम नहीं है। सत्य का अर्थ है—विचार, वाणी और व्यवहार में ईमानदारी।
सत्य बोलते समय यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि हमारी वाणी किसी को अनावश्यक पीड़ा न पहुँचाए। जैन धर्म में सत्य को अहिंसा से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
सत्य वही श्रेष्ठ है जो हितकारी और अहिंसक हो।

6. उत्तम संयम — इच्छाओं पर नियंत्रण
मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति बाहरी संसार को जीतना नहीं, बल्कि स्वयं पर विजय प्राप्त करना है।
इन्द्रियों की इच्छाओं, क्रोध, लोभ, मोह और असंयम पर नियंत्रण ही संयम है।
आज के उपभोक्तावादी युग में संयम का महत्व और भी बढ़ गया है। आवश्यकता और लालच के बीच अंतर समझना ही संयम की शुरुआत है।

7. उत्तम तप — आत्मअनुशासन
तप का अर्थ केवल उपवास करना नहीं है। उपवास तप का एक रूप है, लेकिन आत्मचिंतन, इन्द्रिय संयम, स्वाध्याय, ध्यान और अपनी बुरी आदतों को छोड़ने का प्रयास भी तप की भावना से जुड़ा है।
तप शरीर को कष्ट देने के लिए नहीं, बल्कि मन और आत्मा को मजबूत बनाने के लिए है।

8. उत्तम त्याग — छोड़ने की कला
हम जीवन में पाने की कला तो सीखते हैं, लेकिन छोड़ने की कला भूल जाते हैं।
त्याग का अर्थ केवल धन या वस्तु का दान करना नहीं है। क्रोध का त्याग, अहंकार का त्याग, ईर्ष्या का त्याग, बुरी आदतों का त्याग और अनावश्यक संग्रह का त्याग भी त्याग है।
कई बार किसी वस्तु को छोड़ना आसान होता है, लेकिन किसी पुराने अहंकार या पूर्वाग्रह को छोड़ना कठिन। यही वास्तविक साधना है।

9. उत्तम आकिंचन्य — अपरिग्रह और अनासक्ति
जैन धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश है—अपरिग्रह।
आवश्यकता से अधिक संग्रह मन में आसक्ति पैदा करता है। मनुष्य जितना अधिक संग्रह करता जाता है, उतनी ही उसकी चिंता भी बढ़ती जाती है।
आकिंचन्य हमें सिखाता है कि वस्तुएँ हमारे उपयोग के लिए हैं, हमारी पहचान बनने के लिए नहीं।
संपत्ति रखना गलत नहीं, संपत्ति का गुलाम बन जाना समस्या है।

10. उत्तम ब्रह्मचर्य — आत्मसंयम
ब्रह्मचर्य का व्यापक अर्थ है—मन, वचन और शरीर की पवित्रता तथा इन्द्रियों पर संयम।
यह मनुष्य को बाहरी आकर्षणों से ऊपर उठाकर आत्मचिंतन और आत्मानुभूति की ओर ले जाता है। अपने विचारों और इच्छाओं पर नियंत्रण रखना ही इसकी मूल भावना है।
क्षमावाणी — पर्व का सबसे सुंदर संदेश
पर्युषण और दशलक्षण पर्व की साधना का चरम बिंदु क्षमा है।
जैन परंपरा का प्रसिद्ध संदेश है—
“मिच्छामि दुक्कडम्।”
अर्थात् यदि मेरे मन, वचन या कर्म से जाने-अनजाने किसी जीव को दुःख पहुँचा हो तो मैं उसके लिए क्षमा चाहता हूँ।
यह केवल एक औपचारिक वाक्य नहीं होना चाहिए। इसके पीछे सच्चा पश्चात्ताप और भविष्य में अपनी गलती न दोहराने का संकल्प होना चाहिए।
जैन क्षमापना की भावना में कहा जाता है—
“मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ और सभी जीव मुझे क्षमा करें। मेरा सभी जीवों के प्रति मैत्री भाव है और किसी के प्रति वैर नहीं है।”
कल्पना कीजिए, यदि परिवारों में, समाज में और पूरे विश्व में यह भावना वास्तविक रूप से विकसित हो जाए तो कितने विवाद अपने आप समाप्त हो सकते हैं।

आज के युग में पर्युषण की प्रासंगिकता
आज मनुष्य के पास सुविधाएँ पहले से कहीं अधिक हैं, लेकिन मानसिक शांति कम होती जा रही है। संचार के साधन बढ़े हैं, लेकिन संवाद कम हुआ है। सोशल मीडिया पर मित्रों की संख्या बढ़ी है, लेकिन मन की निकटता कई बार घट गई है।
ऐसे समय में पर्युषण हमें कुछ दिनों के लिए रुकने का अवसर देता है।
रुकिए…
सोचिए…
अपने भीतर झाँकिए…
और स्वयं से मिलिए।
यदि हम इन दिनों में केवल उपवास करें, लेकिन क्रोध न छोड़ें; पूजा करें लेकिन अहंकार न छोड़ें; मंदिर जाएँ लेकिन किसी के प्रति द्वेष बनाए रखें—तो पर्व की वास्तविक भावना अधूरी रह जाएगी।
पर्युषण का उद्देश्य केवल भोजन का त्याग नहीं, कषायों का त्याग है।
केवल शरीर को तपाना नहीं, मन को निर्मल बनाना है।
केवल धार्मिक अनुष्ठान करना नहीं, जीवन को धर्ममय बनाना है।

नई पीढ़ी को पर्व से जोड़ना हमारी जिम्मेदारी
आज आवश्यकता है कि हम अपने बच्चों और युवाओं को पर्युषण एवं दशलक्षण का अर्थ केवल पूजा, उपवास और धार्मिक कार्यक्रमों तक सीमित करके न समझाएँ।
उन्हें बताएं कि—
क्षमा का अर्थ क्या है।
अहिंसा का वास्तविक अर्थ क्या है।
संयम क्यों आवश्यक है।
अपरिग्रह पर्यावरण और समाज के लिए क्यों महत्वपूर्ण है।
सत्य और ईमानदारी जीवन को कैसे मजबूत बनाते हैं।
त्याग केवल साधु-संतों का विषय नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का हिस्सा है।
यदि हमारी नई पीढ़ी इन दस गुणों में से कुछ गुण भी अपने जीवन में उतार ले तो यही पर्व की सबसे बड़ी सफलता होगी।

पर्युषण की सच्ची साधना
इस पर्व पर हम एक छोटा-सा संकल्प ले सकते हैं—
एक क्रोध कम करेंगे।
एक बुरी आदत छोड़ेंगे।
एक व्यक्ति को क्षमा करेंगे।
एक व्यक्ति से क्षमा माँगेंगे।
कुछ समय स्वाध्याय को देंगे।
कुछ समय मौन और ध्यान को देंगे।
आवश्यकता से अधिक संग्रह नहीं करेंगे।
और प्रत्येक जीव के प्रति मैत्रीभाव रखने का प्रयास करेंगे।
तब पर्युषण केवल कैलेंडर में आने वाला आठ या दस दिन का पर्व नहीं रहेगा, बल्कि हमारे जीवन में निरंतर चलने वाली साधना बन जाएगा।

आत्मा की ओर लौटने का अवसर
पर्युषण और दशलक्षण हमें याद दिलाते हैं कि मनुष्य की वास्तविक पहचान उसके धन, पद, प्रतिष्ठा या बाहरी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उसके विचारों, व्यवहार और आत्मिक गुणों से होती है।
दुनिया को बदलने से पहले स्वयं को बदलना आवश्यक है।
यदि हम अपने भीतर क्षमा पैदा कर लें तो वैर कम होगा।
विनम्रता पैदा कर लें तो अहंकार कम होगा।
सरलता अपना लें तो छल समाप्त होगा।
संतोष अपना लें तो लोभ कम होगा।
सत्य अपना लें तो विश्वास बढ़ेगा।
संयम अपना लें तो जीवन संतुलित होगा।
तप अपना लें तो आत्मबल बढ़ेगा।
त्याग अपना लें तो आसक्ति घटेगी।
अपरिग्रह अपना लें तो चिंता कम होगी।
और ब्रह्मचर्य के भाव को अपनाएँ तो आत्मसंयम मजबूत होगा।
यही दशलक्षण का सार है।
पर्व बाहर नहीं, भीतर मनाया जाता है।
मंदिर में जाना आवश्यक है, लेकिन मंदिर से लौटकर अपने भीतर के मंदिर को भी स्वच्छ करना आवश्यक है।
आइए, इस पर्युषण एवं दशलक्षण पर्व पर हम केवल दूसरों से क्षमा न माँगें, बल्कि स्वयं को भी क्षमा करें; केवल दूसरों की गलतियाँ न देखें, बल्कि अपने दोषों को पहचानें; केवल धर्म को सुनें नहीं, बल्कि उसे अपने आचरण में उतारें।
आत्मा की ओर एक कदम—यही पर्युषण है।
दस गुणों की साधना—यही दशलक्षण है।
सभी जीवों के प्रति मैत्री—यही जैन धर्म की सुंदर भावना है।
मिच्छामि दुक्कडम्।
उत्तम क्षमा।
सभी जीवों के प्रति मैत्री और मंगलभाव।

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