श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

क्षमा

क्षमा से उत्थान

एक बार की बात है कि एक व्यक्ति कुदाली से मिट्टी को खोद रहा था, तभी मिट्टी ने धरती माँ से कहा- माँ माँ मुझे बहुतकष्ट हो रहा है । तब धरती माँ ने उसे समझाया-बेटी, क्षमा धारण करो। इसके बाद वह व्यक्ति उस मिट्टी को गठरी में
रखकर ले जाने लगा जिससे वह मिट्टी पुनः रोने लगी । धरती माँ फिर वही बात कहती है बेटी, क्षमा धारण करो। इसकेबाद वह घर ले जाकर आँगन में पटकता है फिर उस मिट्टी का रोना शुरू होता है । धरती माँ फिर समझाती है, इस प्रकारबारी-बारी से कष्टों को सहन करते हुये मिट्टी अंत में घड़ा बनने के लिए कुम्हार द्वारा चाक पर घुमाई जाती है जिससे उसेबहुत कष्ट होता है । तब धरती माँ पुनः समझाती है – कि बेटी थोड़ा सा कष्ट और है। घड़ा बनने के बाद तथा पकने के बाद कुम्हार जब घड़ों को बाजार में ले जाता है तो बड़े संभाल करके ले जाता है, तब मिट्टी बहुत खुश होती है, तब धरती माँ कहती है- देख बेटी, तूने हर बार कष्ट, पीड़ा को सहन करके क्षमा धारण की, इसलिये तू ऊपर उठ गई । अतः ऊपर उठने के लिये, पतित से पावन बनने के लिए अपने हृदय में क्षमा धारण करना चाहिए ।

क्षमा की महिमा

पंडित गोपालदास जी बरैया क्षमाशील स्वभाव के थे। पर उनकी पत्नि क्रोधी व झगड़ालू प्रकृति की थी। पंडित जी विभिन्न पूजा-प्रतिष्ठा, शिविर आदि में जाने के कारण घर विलंब से पहुँचते थे। इस बात पर उनकी पत्नि रोज उन पर नाराज होती व झगड़ा करती थी। लेकिन पंडित जी निरुत्तर होकर सुनते रहते थे । एक बार पंडित जी कहीं प्रवचन करने गये और श्रीमती जी से शाम ७-०० बजे तक वापिस आने का बोल गये। लेकिन चर्चा छिड़ जाने के कारण रात्रि १२-०० बजे तक वापिस आ पाये। इधर श्रीमती जी क्रोध से लाल-पीली होकर अपनी योजना बना रही थी, कि आज पंडित जी को मजा चखाऊँगी । जैसे ही पंडित जी आये उन्होंने दरवाजा खटखटाया , पंडिताईन ने सुना लेकिन अनसुना कर दिया । जब बार-बार दरवाजा खटखटाया तो अंदर से पंडिताईन पानी से भरी बाल्टी लेकर आई और धीरे से एक हाथ से दरवाजा खोलकर पंडित जी के ऊपर डाल दिया । उन दिनों बहुत ठंडी थी और पंडित जी विशेष गर्म कपड़े भी नहीं पहिने थे । अतः ठंडा पानी अचानक डाल देने पर वे काँपने लगे लेकिन उन्हें बिल्कुल क्रोध नहीं आया बल्कि मुस्कुराते हुये बोले – मैं सोचता था कि जो गरजते हैं वो बरसते नहीं, पर तुम रोज गरजती थी लेकिन आज तो बरस भी गई । पंडिताईन पानी-पानी हो गई । तुरंत ही पंडित जी के पैरों पर पड़कर पंडिताईन ने उनसे क्षमा याचना की। यह है क्षमा धारण करने की महिमा ।

दुनियाँ झुकती है – क्षमा से

एक बार एक क्षमाशील जुलाहे से किसी मनचले व्यक्ति ने एक कपड़े की कीमत पूछी । जुलाहे ने कहा १०० रूपये । उस व्यक्ति ने कपड़े के दो टुकड़े करके एक टुकड़े का दाम पूछा। तब जुलाहे ने शांति से उत्तर दिया – ५० रूपये। इसी प्रकार पुनः उसके दो टुकड़े करके पूछा कि इसका दाम क्या है ? उसने कहा – २५ रुपये । इसी प्रकार वह एक के बाद एक टुकड़े करता रहा, और उससे दाम पूछता रहा। अंत में उस व्यक्ति का सिर शर्म के कारण झुक गया। तब उस व्यक्ति ने जुलाहे के सामने २०० रुपये रख दिये । जुलाहे ने लेने से इंकार कर दिया । तब उस व्यक्ति ने सभी टुकड़े रख लिये और २०० रुपये दिये । तब जुलाहे ने मात्र १०० रुपये लिये और उसे क्षमा कर दिया। इस प्रकार हमें क्षमा धारण करने की आवश्यकता है। क्योंकि क्षमा के आगे सारी दुनियाँ को झुकना पड़ता है ।

क्षमा से मित्रता

एक बार गाँधी जी को एक अंग्रेज ने एक चाँटा मार दिया। गाँधी जी ने दूसरा गाल उसके सामने कर दिया, अंग्रेज ने दूसरा चाँटा मार दिया। गाँधी जी ने पुनः पहले वाला गाल उसके सामने कर दिया। वह अंग्रेज तीसरा चाँटा मारने ही वाला था कि वह रुक गया और गाँधी जी से बोला-आप ऐसा क्यों कर रहे हैं ? मैं आपको मार रहा हूँ और आप शांत हैं। गाँधी जी ने कहा- यदि मुझे मारने से आपको प्रसन्नता होती है, सुख-शांति की प्राप्ति होती है तो अच्छा है, और मैं किसी को सुख दे सकूँ ऐसा करने से मुझे प्रसन्नता होती है। अतः क्षमा से सभी को खुश किया जा सकता है। क्षमा से ही परायों को अपना बनाया जा सकता है ।

क्षमा से लाभ

एक बार की बात है कि एक पंडित जी राजा के खजाने के कोषाध्यक्ष थे। एक दिन खजाने के हिसाब में गलती होने से कुछ रुपये कम हो रहे थे । सभासद ने पंडित जी पर आरोप लगा दिया। सभी ने कहा-रुपये पंडित जी ले सकते हैं। पंडित जी ने कहा-मैंने रुपये नहीं लिये। लेकिन लोगों का आक्षेप बढ़ता गया। पंडित जी ने सोचा-इस समय हमारी सत्य बात कोई नहीं मानेगा । पंडित जी ने पैसे अपनी जेब से निकाल कर दे दिये। पैसे देने के कारण सभी लोगों ने मान लिया कि, पैसे पंडित जी ने ही लिये होंगे । पंडित जी घर चले गये, दूसरे दिन वे पैसे गिने गये तब जो पंडित जी ने पैसे दिये थे वे अधिक थे। उसी समय जिसको समस्त बात का पता था तथा जिसने पंडित जी पर आरोप लगाया था, वह पैसे लेकर पंडित जी के घर गया और पैसे वापिस करते हुये क्षमा माँगी । पंडित जी ने उसे क्षमा कर दिया । जब पंडित जी राजा के दरबार में आये तो उनसे पूछा गया- कि आपने ऐसा क्यों किया ? तब पंडित जी ने कहा- मैं जानता था कि हिसाब गलत था, परंतु उस समय मैं जो कहता उसको सत्य नहीं माना जाता और बात बढ़ जाती, मेरे पैसे जैसे मेरी जेब में थे, वैसे ही खजाने में थे।मैं जानता था मुझे मेरे पैसे वापिस मिल जायेंगे पैसे न देने से दोनों का क्रोध बढ़ता, यदि मेरे पैसे देने से शांति हो गई तो मेरा पैसा देना उचित था । राजा इस बात को सुनकर बहुत खुश हुआ और पंडित जी को इनाम दिया। तात्पर्य यह है कि क्षमा से लाभ ही होता है ।

क्षमा ही धर्म

एक बार की बात है, गौतम बुद्ध और उनके शिष्य आनंद विहार करते हुये कहीं जा रहे थे, रास्ते में चलते-चलते बुद्ध ने अपने शिष्य आनंद से पूछा – कि आनंद, अगर तुम्हारे लिये कोई गाली देगा तो तुम क्या करोगे ? आनंद बोला – भगवन् ! मैं उसे अपना सबसे बड़ा उपकारी तथा हितैषी मानूँगा, कि उसने मुझे सिर्फ गाली ही तो दी है और कुछ तो नहीं दिया है और फिर मैंने उसे लिया ही नहीं तो फिर देना क्या ? जो लेगा वो देगा, मैं लूँगा ही नहीं । इस प्रकार बुद्ध ने आनंद से अनेक प्रश्न किये कि वह अगर तुमको चाँटा मारेगा, लाठी से मारेगा, पत्थर से मारेगा, हाथ-पैर को अलग कर देगा तथा तुम्हारी जान भी ले लेगा तो तुम क्या करोगे ? तब आनंद कहता है कि हे भगवन् ! अगर वह मेरे साथ इन सब क्रियाओं के साथ अन्य भी कुछ करेगा तो भी मैं उससे कुछ नहीं कहूँगा, मैं यही सोचूँगा कि उसने मुझे चाँटा ही तो मारा है और कुछ तो नहीं किया, लाठी से ही तो मारा है और कुछ तो नहीं किया, पत्थर से ही तो मारा है, हाथ- पैर ही तो तोड़े हैं तथा मुझे जान से ही तो मारा है मेरे धर्म को तो नहीं छुड़ाया, मेरे व्रत तथा नियम तो नहीं तोड़े और फिर मेरी आत्मा तो अजर- अमर है आदि इस प्रकार से चिंतन करूँगा। और उसको क्षमा प्रदान करूँगा, क्योंकि क्षमा ही धर्म है ।

गाँधी जी की क्षमा

एक बार गाँधी जी के कार्यालय में किसी विरोधी व्यक्ति ने एक कागज में गालियाँ लिखकर टेबिल पर रख दी । गाँधी जी ने उस कागज को देखा, और पढ़ा, किन्तु उनके मन में कोई विकल्प नहीं हुआ, कागज को रद्दी की टोकरी में डाल दिया और उसमें से पिन निकाल ली। उस व्यक्ति को पता चला तो वह लज्जित होकर गाँधी जी के चरणों में झुक गया ।

क्षमा का प्रभाव

वैशाली ग्राम में एक सेठ रहता था, जिसका नाम जिनदत्त था, वह प्रकृति का दयालु, क्षमावान तथा जैन धर्म का अनुयायी था। एक बार उसने सम्यग्ज्ञान के प्रचार हेतु एक पाठशाला का निर्माण कराया, जिसमें अनेक बच्चे अध्ययन कर अपने अज्ञान अन्धकार को दूर करते थे। उस पाठशाला में प्रवेश पाने हेतु एक बालक आया जिसका नाम था राजकमल वह स्वभाव से शैतान था । जब वह क्लास में पढ़ने आता तो बच्चों को परेशान करता तथा शिक्षक की आज्ञा को भी भंग करता । तब शिक्षक ने उसे क्लास से निकाल दिया। सेठ जी ने उसको अपने पास रख लिया। अब वह घर की वस्तुओं की तोड़फोड़ करने लगा । सेठ जी ने तब भी उससे कुछ नहीं कहा। एक दिन सेठ जी की घड़ी फोड़ दी तब भी सेठ जी ने कुछ नहीं कहा। घड़ी के फूटने पर राजकमल को पश्चाताप हुआ । सेठ जी से क्षमा माँगी, और आँखों से अविरल अश्रुधारा प्रवाहित होती रही । अब वह शैतान राजकमल शांत हो गया और बहुत बड़ा विद्वान हुआ । सेठ जी के क्षमा गुण के प्रभाव से वह भी क्षमा का सागर बन गया।

क्षमा आत्मा का स्वभाव

बहुत पुरानी बात है, ईसा मसीह एक बहुत बड़े दयालु संत थे, उन्होंने अपने जीवन में कभी क्रोध नहीं किया। सुना जाता है कि जब किसी कारणवश उनको शूली पर चढ़ाया गया तब उन्होंने भगवान से प्रार्थना की हे भगवन् ! मुझको सूली पर चढ़ाने वाले ये लोग अज्ञानी हैं, मैं इनका अपराध क्षमा करता हूँ, इन्हें कभी कष्ट न देना। इस दुनियाँ में ऐसे भी प्राणी हैं जो कि प्राण जाने के बाद भी अपराधी पर क्रोध नहीं करते हैं। क्योंकि क्षमागुण आत्मा का स्वभाव है ।

क्षमा प्रशंसनीय

जब महाभारत हुआ था उस समय की घटना है कि कौरव और पाण्डवों के बीच में महाविनाशकारी युद्ध छिड़ गया । कौरवों के पास योद्धाओं की कतार लगी हुयी थी । पाण्डवों के पास मात्र सिर्फ श्री कृष्ण जी और पाँचों पाण्डव सहित अर्जुन के पाँच बेटे थे । अश्वत्थामा ने अर्जुन के पाँचों बेटों को मार डाला। द्रोपदी ने सुना तो मूर्च्छित हो गई । भीम ने जब इस बात को सुना तो बोले कि, जब तक अश्वत्थामा की बोटी-बोटी काटकर पक्षियों को नहीं खिला दूँगा तब तक मैं भोजन नहीं करूँगा । द्रोपदी ने भीम की इस प्रतिज्ञा को सुनकर कहा कि जैसे-मेरे बेटों के मारे जाने पर मैं तड़फ रही हूँ। वैसे ही अश्वत्थागा के मारे जाने पर उसकी माँ तड़फेगी, इसलिये इसके अपराध को क्षमा कर दो। द्रोपदी की दयालुता, सहिष्णुता, क्षमागुण प्रशंसनीय था ।

क्षमा विवेक के साथ

गणेश प्रसाद जी (बड़े वर्णी जी) से प्रायः लोग परिचित हैं उनकी धर्म माता चिरोजा बाई बड़ी सरल प्रकृति की थी। एक बार की बात है कि चिरोजा बाई के पास में उनकी ननद बाई रहती थी, वह अक्षर ज्ञान से शून्य थी । एक बार चिरोजा बाई ने समझाया कि झाडू लगाते समय कोई भी कागज मिल जाये तो उसको उठा कर रख दिया करो । एक बार झाडू लगाते समय भक्तामर स्तोत्र जी को कचड़े के साथ फेंक रही थी, तभी चिरोजा बाई मंदिर से आ गई, उन्होंने देखा तो उन्हें गुस्सा आ गई और उनके सिर के बाल पकड़कर सिर दीवाल से टकरा दिया किन्तु दीवाल में अपना हाथ लगा लिया । ताकि चोट न आ जाय, यह थी कषाय की मन्दता का परिणाम । यह विवेक क्षमावान को ही होता है।

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