गतांक से आगे:-
प्रिय आत्मन् !
इष्टोपदेश अध्यात्म की कुंजी है। स्वरूपानुसंधान के निर्देशक पूज्यपाद आचार्य द्वारा प्रणीत यह पावन शास्त्र है। मंगलाचरण हुआ, मंगल और आचरण, दो शब्दों से मिलकर मंगलाचरण बनता है। मंगल शब्द में का अर्थ होता पाप, गल का अर्थ गलना, जो क्रिया, जो आचरण – जो अनुष्ठान, जो भाव पद्धति हमारे पापों को गला दे, उसे मंगलाचरण कहते हैं।
मानसिक मंगलाचरण, मन से होने वाला मंगल जैसे-हम मंत्र जाप करते हैं, मन ही मन में, शुभ चिंतन चलता रहता है। वाचनिक मंगलाचरण, स्तुति, स्तोत्र, पूजा, पाठ भक्तियाँ पढ़ते हैं ये हमारा वाचनिक मंगलाचरण है। हाथ जोड़ना, विनय, व्यवहार करना ये हमारा कायिक मंगलाचरण है।
तीन तरह का मंगलाचरण मन से मानसिक, वचन से वाचनिक, काय से कायिक:
जब हम काय से मंगल करते हैं तो हमारा काय योग शुभ होता है। वचन से मंगल करते है तो हमारा वचनयोग शुभ होता है। मन से मंगल करते हैं तो मन योग शुभ होता है।
शुभ योग से पुण्य कर्म का आस्रव होता है। अपन कितनी अच्छी पद्धति से चल रहे हैं। कायिक मंगलाचरण हाथ जोड़ा पधारिये, विराजिये, हाथ से संकेत। वचन से बोल रहे, मन कि प्रसन्नता चहरे पर झलक रही, मन कि प्रसन्नता चहरे पर झलकती है। पानी गरम होता है, तो भाप ऊपर उठती है। आत्मा की प्रसन्नता चहरे पर झलकती है। स्वागत में कायिक मंगलाचरण, तीर्थकर का स्वागत, सर्वज्ञ का स्वागत, परमात्मा का अभिनंदन कायिक मंगलाचरण।
“वंदे तं सव्वदा सिरसा”
उच्चारण करना वाचनिक मंगलाचरण, भावना भाना मानसिक मंगलाचरण, ये तीनों मन, वचन काय, को शुभ बनाते हैं। हमारे शुभ से शुभ होता है और तीनों के शुभ होने पर उपयोग में निर्मलता आती है। भावनाओं में निर्मलता आती है। उपयोग हमारा शुभ हो जाता है।
और परमात्मा गुणों के स्मरण में, उच्चारण में, चिंतन में, उपयोग जाना शुभ उपयोग है। कुंदकुंद भगवान ने प्रवचन सार में शुभ उपयोग का लक्षण लिखा।
देव जदि गुरु पूजा सु, चेव दाणम्मि वा सुसीलेसु। उवावासा दिसु रत्तो, सुहोव ओगप्पगो अप्पा।।69।। (प्र.सा.)
देव पूजा, गुरु पूजा, साधु पूजा में उपयोग है, दान में जो उपयोग है. शील पालन में जो उपयोग है उपवास में जो उपयोग है ये आपका शुभ उपयोग है।
विसय कसाय ओगाढो, दुस्सुदि दुच्चित्त दुट्ट गोट्ठि जुदो। उग्गो उमग्गपरो, उवओगो जस्स सो असुहो।।158।।
और विषय कषाय आदि में जो उपयोग है, दुष्ट गोष्टी, उन्मार्ग में गमन, अशुभउपयोग है। अशुभ उपयोग से हटना, शुभ उपयोग में लगना यही तपस्या है। पंचम काल में, तपस्या और कुछ नहीं है। अशुभ का संवर और शुभ में प्रवृत्ति
“असुहादो विणिवित्ति, सुहे पवित्ति जाण चारित्तं”
आप सभी स्वाध्याय में आये स्वाध्याय में आना ये आचरण है। क्यों? जब तक स्वाध्याय में रहोगे तब तक आप विषय कषायों से दूर रहोगे।
शुभ में आपकी प्रवृप्ति होगी। अशुभ से हट गये शुभ में जुट गये, ये क्या हो गया? मंगलाचरण !
शुभ, मंगल, क्षेम, कुशल, आनंद, लाभ, धर्म, पुण्य, ये सब एकार्थ वाची हैं। पूत, पवित्र, पावन ये पर्यायवाची नाम हैं।
जो पापों को गलाये वह मंगल है। मंगल चार होते हैं। पांचों पाप जिससे गलन को प्राप्त हो जायें, झड़ जायें, निकल जायें, टूट जायें, रूठ जायें, खंडित हो जायें, मिट जायें, जायें, समाप्त हो जायें वह मंगलाचरण है। वस्तुतः हम पाप को नहीं मिटाना चाहते, हम तो सिर्फ दुख को दूर करना चाहते हैं। दुख का कारण पाप है इसलिए हमने पाप को हटाया है। कोई सोरगुल करे तो अपन कहते हैं उठके चले जाओ उस व्यक्ति को भगाना नहीं चाहते, उसके शोरगुल को हटाना चाहते हैं।
पाप का फल दुख है। पुण्य का फल सुख है। हमने किसको हटाया? पाप प्रवृत्ति जो, शोरगुल कर रहा था, उससे निवेदन कर लिया। पाप दुख पैदा कर रहा था, उससे निवेदनकर लिया, जाओ। मंगलाचरण करने से पाप नष्ट हो जाता है।
दूसरा लक्षण क्या है? मंग (सुख) जो उत्कृष्ट सुख ल-लाये वह मंगल। मंग (सुख) ल (लाये)
“मंगम् सुखम् तल्लाति इति मंगलम्”
जो सुख को लाता है, वह मंगल कहलाता है। अब प्रश्न ये आया कि मंगल ही करना है तो संपूर्ण शास्त्र मंगल है अलग से आपने परमात्मा का नाम क्यों लिया? तो आचार्य विद्यानंदि कहते हैं-
श्रेयोमार्गस्य संसिद्धिः, प्रासादात् परमेष्ठिनः।
इत्याहुस्तद्गुण स्तोत्रं, शास्त्रादौ मुनिपुंगवाः ।।२।।
आप्त परीक्षा
परमेष्ठी के प्रसाद से श्रेयोमार्ग, कल्याण की सम्यक् प्रकार से सिद्धि हो जाये, माँ प्रसन्न हो जाये तो पसंद का खाना मिल जाये। भैया। जब माता-पिता प्रसंन होते हैं तो तुम्हें लौकिक वस्तुओं की प्राप्ति होती है। इसलिए शास्त्र के प्रारंभ में गुण स्मरण रूप मंगलाचरण मुनि श्रेष्ठों ने कहा।
और यदि सेठ प्रसन्न हो जाये तो तुम्हें पैसा दे देगा, राजा प्रसन्न हो जाये तो हाथी दे देगा। किन्तु आचार्य कहते हैं।
“परमेष्ठि प्रसन्नम् श्रेयोमार्ग प्रदानम्”
यदि परमेष्ठि प्रसन्न हो गये तो तुम्हें कल्याण का मार्ग मिल जायेगा। आत्म कल्याण का मार्ग परमेष्ठि कि प्रसन्नता से मिलता है। इसलिए कहा गुरु को नाराज नहीं करना चाहिए। क्यो?
भत्तीए जिणवराणं, रवीयदि जं पुव्वसंचियं कम्में!
आइरिय पसाएण विज्झा मंता य सिज्झंति ।। 571 मू. आ.
आचार्य की प्रसन्नता से विद्या और मंत्रो की सिद्धि होती है। विद्या लाभोगुरुवशात् = विद्या का लाभ गुरु की प्रसन्नता से होता है। इसलिए परमेष्ठि के प्रसाद से कल्याण सिद्ध होता है। गोम्मटसार में लिखा है लेकिन गुरु के उपदेश से व्यक्ति गलत भी समझले तब भी सम्यक् दृष्टि है। गुरु का उपदेश उसे जैसा मिला, स्वीकार किया। भाई परमेष्ठि कितनेहैं? चार। सुना लिया श्रद्धान कर लिया. सम्यक दृष्टि है। गुरु का प्रसाद मान रहा था, जब गुरु बोल रहे थे. तो गुरु का अभिप्राय था संसार में परमेष्ठि चार, शिष्य ने सुन लिया. परमेष्ठि चार ही होते हैं।
अब वह शिष्य सम्यक दृष्टि है कि मिथ्या दृष्टि? तो सम्यक दृष्टि है। क्योंकि उसने गुरु के उपदेश से सुना है। उसे गुरु पर विश्वास है। श्रद्धा है। परमेष्ठि के प्रसाद से, सम्यक सिद्धि होती है।
इसलिए हम किसी भी कार्य को करने के पूर्व क्या करते हैं? मंगलाचरण करते हैं। वीतराग परमात्मा का स्मरण करते हैं। णमोकार महामंत्र का स्मरण करते हैं, उच्चारण करते हैं। जब हम परमेष्ठि की आराधना करते हैं। तो हमारे परिणाम शुभ होते हैं। परमेष्ठि कि प्रसन्नता से अपने परिणामों का शुभ हो जाना कार्य होता है। परमेष्ठि का स्मरण करके अपने परिणाम पवित्र हो जाना यही परमेष्ठि कि प्रसन्नता समझना चाहिए। क्यों सिद्ध परमेष्ठि प्रसन्न होने आयेगे क्या? अरिहंत प्रसन्न होने आयेंगे क्या? नहीं आयेंगे तो इनको याद करने से हमारे भावों में जो निर्मलता आती है, उज्ज्वलता आती है, विशुद्धि आती है. विशुद्धि का जागरण ही परमेष्ठि कि प्रसन्नता है। भावों में निर्मलता आ जाना ही उनका आशीर्वाद है। मिल गया आशीर्वाद। हमने स्मरण किया आचार्य भगवान आशीर्वाद दीजिये। चित्त संतुष्टि हो गई। यही है। उनकी प्रसन्नता यदि परमात्मा को याद करके चित्त मे संतोष होता है तो यही उनकी प्रसन्नता और प्रसाद है।
नास्तिकत्व परिहारस्तु, शिष्टाचार प्रपालनम्।
पुण्यावाप्तिश्च निर्विघ्नः, शास्त्रादौ तेन संस्तुतिः ।।2।। द्र.सं.टी.
मंगलाचरण करने के चार कारण हैं? नास्तिकता का परिहार, शिष्टाचार परिपालन, पुण्य की प्राप्ति, कार्य की निर्विघ्न समाप्ति ।
नास्तिकता का परिहार-कोई वक्तव्य शुरु कर दे लेकिन वह परमात्मा का गुणानुवाद न करे तो लोग सोचेंगे न जाने कौन बोलने लगा? और पहले ही णमोकार मंत्र बोला, सिद्ध हो गया ये जैन धर्म का वक्ता बोल रहा है। फिर गुरुदेव का जयकारा बोला, अमुक गुरु का शिष्य है।आस्तिक है ये तो हमें भी आस्तिकता का पथ दर्शायेगा ही। और सीधा बोलना प्रारंभकर दिया तो कैसा लगेगा? उसे चार रोकने वाले तैयार हो जायेंगे। और विधि वत मंगलाचरण करेगा, तो अपन क्या करेंगे? सम्मान के साथ कहेंगे बहुत बढ़िया। मंगलाचरण करने से नास्तिकता का परिहार होता है।
शिष्टाचार का पालन होता है। आपने प्रवचन को कहा था, मंगलाचरण करने को नह कहा था लेकिन फिर भी मैंने मंगलाचरण किया। क्योंकि यह मेरे शिष्टाचार का पहला लक्षण है। आपने हमसे प्रवचन का कहा था कि मंगलाचरण का? प्रवचन का। फिर हमने मंगलाचरण क्यों किया? क्योंकि शिष्टाचार से ही आगे का पथ प्रशस्त होता है।
क्रमश:-
रचयिता
श्रमणाचार्य डॉ. विभवसागर मुनिराज