श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

भीष्म पितामह : त्याग, ब्रह्मचर्य, पितृभक्ति और नियति के संघर्ष की करुण गाथा

*महाभारत का एक ऐसा महान पात्र, जिसने पिता के सुख के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया; किंतु दूसरों के लिए किए गए त्याग के बीच स्वयं जीवनभर संघर्ष करता रहा।*

महाभारत में भीष्म पितामह का चरित्र अत्यंत गंभीर, प्रेरणादायी और विचारणीय है। उनका जीवन केवल प्रतिज्ञाओं की कठोरता की कहानी नहीं है, बल्कि त्याग, कर्तव्य, ब्रह्मचर्य, राजधर्म, पारिवारिक दायित्व और नैतिक द्वंद्व की ऐसी गाथा है, जिसमें एक महान व्यक्तित्व की उपलब्धियों के साथ उसकी विवशताएँ भी दिखाई देती हैं।

भीष्म के जीवन को देखते हुए ऐसा लगता है, मानो उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुखों का विसर्जन करके दूसरों के जीवन को सँवारने का संकल्प लिया था। उन्होंने पिता के सुख के लिए विवाह का त्याग किया, राजवंश की रक्षा के लिए अपने अधिकार छोड़े और हस्तिनापुर की गद्दी के प्रति निष्ठा निभाते-निभाते अंततः ऐसे संघर्ष में जा पहुँचे, जहाँ उन्हें धर्म और राजनिष्ठा के बीच कठिन निर्णयों का सामना करना पड़ा।

उनके जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही थी कि वे त्याग करते रहे, किंतु परिस्थितियाँ उनके अनुकूल नहीं हुईं। उन्होंने जिस राजवंश को सुरक्षित रखने के लिए अपना जीवन अर्पित किया, उसी राजवंश का विनाश अपनी आँखों के सामने देखा।

1. जन्म से ही असाधारण व्यक्तित्व

भीष्म का मूल नाम देवव्रत था। वे राजा शांतनु और देवी गंगा के पुत्र थे। गंगा के पुत्र होने के कारण उन्हें गांगेय भी कहा जाता था।

परंपरागत महाभारत-कथा के अनुसार, देवव्रत ने शस्त्रविद्या, शास्त्रज्ञान, नीति, धर्म और राजकाज की शिक्षा प्राप्त की थी। वे असाधारण योद्धा, बुद्धिमान राजनीतिज्ञ और दृढ़ संकल्प वाले पुरुष थे।

उनके जीवन का वास्तविक मोड़ तब आया, जब राजा शांतनु मत्स्यगंधा सत्यवती के प्रति आकर्षित हुए और उनसे विवाह करना चाहते थे।

सत्यवती के पिता की शर्त थी कि सत्यवती से उत्पन्न पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा बने। उस समय देवव्रत युवराज थे। यदि वे अपना राजाधिकार छोड़ देते, तब भी उनके भावी पुत्रों के कारण भविष्य में उत्तराधिकार का विवाद उत्पन्न हो सकता था।

देवव्रत ने पिता के सुख और विवाह की इच्छा को पूर्ण करने के लिए अपना युवराज-पद त्याग दिया। जब सत्यवती के पिता ने उनके भावी पुत्रों के अधिकार को लेकर प्रश्न उठाया, तब देवव्रत ने आजीवन ब्रह्मचर्य का संकल्प ले लिया।

उनकी इस भयानक प्रतिज्ञा से देवता भी विस्मित हो उठे। तभी से वे ‘भीष्म’ नाम से प्रसिद्ध हुए। इस नाम में उनकी प्रतिज्ञा की भीषण दृढ़ता का भाव निहित है।

यह त्याग सामान्य नहीं था। देवव्रत केवल राजगद्दी नहीं छोड़ रहे थे, बल्कि अपने भावी पारिवारिक जीवन, विवाह और संतान-सुख का भी परित्याग कर रहे थे।

उन्होंने पिता के सुख को अपने सुख से ऊपर रखा। यही उनकी पितृभक्ति की सर्वोच्च अभिव्यक्ति थी।

2. त्याग की पराकाष्ठा और जीवनभर का ब्रह्मचर्य

भीष्म की प्रतिज्ञा उनके संपूर्ण जीवन का आधार बन गई। उन्होंने विवाह नहीं किया और हस्तिनापुर के राजवंश की रक्षा को अपना कर्तव्य माना।

उनका जीवन हमें बताता है कि संकल्प की शक्ति मनुष्य को असाधारण बना सकती है। किंतु साथ ही यह प्रश्न भी उठता है कि क्या प्रत्येक त्याग का परिणाम सुखद ही होता है?

भीष्म ने जिस उद्देश्य से त्याग किया था, वह था अपने पिता को सुख देना और हस्तिनापुर के राजवंश को सुरक्षित रखना। परंतु आगे चलकर राजवंश में अनेक ऐसी घटनाएँ हुईं, जिन पर उनका नियंत्रण नहीं था।

सत्यवती के पुत्रों का जीवन भी कठिनाइयों से घिरा रहा। चित्रांगद युद्ध में मारे गए और विचित्रवीर्य की भी संतानहीन अवस्था में मृत्यु हो गई। भीष्म ने जिस वंश की रक्षा के लिए अपना व्यक्तिगत जीवन समर्पित किया था, उसी वंश के अस्तित्व पर संकट आ गया।

यहाँ से उनके जीवन की विडंबना और अधिक गहरी होती जाती है।

3. राजवंश की रक्षा का दायित्व

विचित्रवीर्य की मृत्यु के बाद हस्तिनापुर के उत्तराधिकार का प्रश्न गंभीर हो गया। सत्यवती के आग्रह पर महाभारत की कथा में व्यास के माध्यम से धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म हुआ।

धृतराष्ट्र जन्म से नेत्रहीन थे। पांडु हस्तिनापुर के राजा बने, जबकि विदुर अपनी बुद्धि, नीति और धर्मनिष्ठा के लिए प्रसिद्ध हुए।

भीष्म इन तीनों के जीवन में संरक्षक की भूमिका निभाते रहे। उन्होंने राजवंश को स्थिर रखने, राजकुमारों को शिक्षित करने और राज्य की व्यवस्था बनाए रखने का प्रयास किया।

लेकिन जीवन में केवल सद्भावना पर्याप्त नहीं होती। कभी-कभी परिस्थितियाँ ऐसी उलझ जाती हैं कि व्यक्ति की बुद्धि, शक्ति और अनुभव भी उन्हें पूरी तरह सुलझा नहीं पाते।

धृतराष्ट्र की सत्ता की आकांक्षा, पांडु का राजपद, गांधारी का विवाह, कुंती का जीवन और आगे चलकर कौरव-पांडवों के बीच उत्पन्न संघर्ष—इन सबने भीष्म के सामने निरंतर नई चुनौतियाँ खड़ी कीं।

वे परिवार के वरिष्ठ सदस्य थे, किंतु परिवार के प्रत्येक सदस्य के निर्णय पर उनका अधिकार नहीं था। वे राज्य के रक्षक थे, किंतु राज्य के भीतर बढ़ते अधर्म को हमेशा रोक नहीं सके।

4. कौरव-पांडव संघर्ष और भीष्म की विवशता

धृतराष्ट्र के पुत्रों में दुर्योधन प्रमुख था। पांडु के पुत्र पांडव कहलाए। प्रारंभ में दोनों पक्षों के राजकुमार साथ रहते और शिक्षा प्राप्त करते थे, लेकिन धीरे-धीरे ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा और सत्ता की लालसा ने उनके संबंधों को विषाक्त कर दिया।

दुर्योधन पांडवों की योग्यता और लोकप्रियता से असहज था। भीम की शक्ति, अर्जुन की धनुर्विद्या और युधिष्ठिर की धर्मनिष्ठा उसके मन में प्रतिस्पर्धा उत्पन्न करती थी।

भीष्म हस्तिनापुर के वरिष्ठ संरक्षक थे। वे कौरवों और पांडवों, दोनों के हितैषी थे। इसके बावजूद वे राजपरिवार में बढ़ते वैमनस्य को समाप्त नहीं कर पाए।

यहीं उनके चरित्र का सबसे बड़ा प्रश्न सामने आता है।

*क्या किसी व्यवस्था के प्रति निष्ठा उस समय भी उचित है, जब उस व्यवस्था के कुछ संचालक अन्याय करने लगें?*

भीष्म की राजनिष्ठा ने उन्हें हस्तिनापुर से बाँध रखा था। वे जानते थे कि पांडवों के साथ अन्याय हो रहा है, फिर भी वे राजसत्ता के प्रति अपनी प्रतिज्ञा और कर्तव्य से मुक्त नहीं हो पाए।

उनकी स्थिति एक ऐसे व्यक्ति की थी, जो धर्म को पहचानता था, किंतु अपने संकल्पों और राजकीय दायित्वों के कारण हर परिस्थिति में धर्म के अनुरूप कार्य नहीं कर पाता था।

5. द्रौपदी का अपमान और भीष्म का नैतिक द्वंद्व

महाभारत के सबसे पीड़ादायक प्रसंगों में द्रौपदी का राजसभा में अपमान एक प्रमुख घटना है।

जब द्रौपदी को सभा में लाया गया और उनके अधिकार तथा सम्मान पर प्रश्न उठे, तब वहाँ अनेक वरिष्ठ और विद्वान व्यक्ति उपस्थित थे। भीष्म भी उनमें से एक थे।

भीष्म धर्म के ज्ञाता थे, लेकिन उस सभा में वे धर्म की स्थिति को लेकर असमंजस व्यक्त करते दिखाई देते हैं। उनका यह मौन और असमर्थता उनके चरित्र का अत्यंत विचारणीय पक्ष है।

यह प्रसंग हमें सिखाता है कि केवल धर्म का ज्ञान होना पर्याप्त नहीं है। अन्याय के समय धर्म के पक्ष में खड़ा होना भी आवश्यक है।

कभी-कभी मनुष्य अपने पुराने वचनों, पद, प्रतिष्ठा और संबंधों से इतना बँध जाता है कि सत्य को पहचानने के बावजूद उसके समर्थन में निर्णायक कदम नहीं उठा पाता।

भीष्म का जीवन इस कठिन सत्य को सामने रखता है कि महान व्यक्ति भी नैतिक द्वंद्व में पड़ सकते हैं और उनके निर्णयों की आलोचना भी हो सकती है।

उनका सम्मान करना और उनके निर्णयों की विवेचना करना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।

6. महाभारत का युद्ध और भीष्म का ब्रह्मतेज

कुरुक्षेत्र का युद्ध आरंभ हुआ, तो भीष्म कौरव सेना के सेनापति बने। वे जानते थे कि पांडवों के पक्ष में श्रीकृष्ण हैं और पांडवों का दावा धर्म की दृष्टि से अधिक न्यायसंगत है। फिर भी उन्होंने हस्तिनापुर की राजसत्ता के प्रति अपनी निष्ठा के कारण कौरवों की ओर से युद्ध किया।

महाभारत की परंपरा में भीष्म को अद्वितीय धनुर्धर और महान योद्धा माना गया है। उनकी युद्धकला, अनुभव और शौर्य के सामने बड़े-बड़े महारथी भी सावधान रहते थे।

उनकी प्रतिज्ञा, ब्रह्मचर्य और तपश्चर्या का उल्लेख करते हुए कई धार्मिक एवं लोकपरंपराओं में उनके असाधारण तेज का वर्णन मिलता है।

लेकिन यह समझना आवश्यक है कि ब्रह्मचर्य का वास्तविक मूल्य केवल शारीरिक संयम तक सीमित नहीं है। उसका व्यापक आध्यात्मिक अर्थ है—इंद्रियों पर नियंत्रण, मन की एकाग्रता, विचारों की पवित्रता और आत्मबल की वृद्धि।

भीष्म का जीवन इस आदर्श की प्रेरणा देता है। साथ ही उनका युद्ध में कौरवों की ओर खड़ा होना यह प्रश्न भी उठाता है कि व्यक्तिगत तप और शक्ति का सर्वोच्च उपयोग तभी है, जब वह विवेक और धर्म के साथ जुड़ा हो।

7. श्रीकृष्ण और भीष्म का संघर्ष

महाभारत में भीष्म और श्रीकृष्ण का संबंध अत्यंत रोचक है। दोनों एक-दूसरे की शक्ति और महानता से परिचित थे, लेकिन युद्ध में उनकी भूमिकाएँ अलग थीं।

श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी बने और पांडवों का मार्गदर्शन किया। दूसरी ओर भीष्म कौरव सेना के सेनापति थे।

भीष्म की युद्धक्षमता इतनी प्रबल थी कि पांडव सेना को भारी संकट का सामना करना पड़ा। महाभारत के प्रसिद्ध प्रसंग में श्रीकृष्ण ने अर्जुन की शिथिलता देखकर क्रोध में रथ से उतरकर भीष्म की ओर प्रस्थान किया। उनके हाथ में सुदर्शन चक्र लेने की घटना भी इसी संदर्भ में वर्णित है।

भीष्म ने श्रीकृष्ण के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की। यह प्रसंग युद्ध की भीषणता के बीच भी दोनों महापुरुषों के परस्पर सम्मान को प्रकट करता है।

इस घटना का एक गहरा संदेश है—शक्ति का वास्तविक महत्व केवल विजय प्राप्त करने में नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य, संकल्प और आदर्शों के प्रति दृढ़ रहने में भी है।

फिर भी महाभारत का व्यापक संदेश यह है कि शक्ति और प्रतिज्ञा के साथ धर्मबुद्धि का होना भी अनिवार्य है।

8. भीष्म का पतन और शरशय्या

भीष्म को पराजित करना पांडवों के लिए अत्यंत कठिन था। अंततः शिखंडी को आगे रखकर अर्जुन ने उन पर बाणों की वर्षा की। भीष्म ने शिखंडी पर शस्त्र नहीं उठाया और अर्जुन के बाणों से वे धरती पर गिर पड़े।

उनका शरीर बाणों से विद्ध हो गया। वे भूमि पर नहीं, बल्कि बाणों की शय्या पर लेटे थे। इसी कारण इस अवस्था को ‘शरशय्या’ कहा जाता है।

भीष्म को इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था। उन्होंने तत्काल प्राण त्यागने के स्थान पर उत्तरायण की प्रतीक्षा की। इस अवधि में उन्होंने युधिष्ठिर को राजधर्म, नीति, दान, कर्तव्य और जीवन के अनेक महत्वपूर्ण विषयों का उपदेश दिया।

महाभारत के शांतिपर्व और अनुशासनपर्व में भीष्म के उपदेशों का विस्तृत वर्णन मिलता है। इन उपदेशों में शासन की मर्यादा, न्याय, लोककल्याण, आत्मसंयम और नैतिक आचरण पर विशेष बल दिया गया है।

इस प्रकार युद्धभूमि में पराजित होने के बाद भी भीष्म का ज्ञान और अनुभव समाज के लिए उपयोगी बना रहा।

उनका जीवन समाप्त होने की ओर बढ़ रहा था, लेकिन उनकी शिक्षाएँ आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बन रही थीं।

9. भीष्म के जीवन की सबसे बड़ी विडंबना

भीष्म के जीवन पर गहराई से विचार करने पर एक बात स्पष्ट होती है—उन्होंने त्याग बहुत किया, लेकिन त्याग से सभी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ।

उन्होंने पिता के लिए विवाह छोड़ा, फिर राजवंश की रक्षा के लिए जीवन लगाया। उन्होंने राजसत्ता के प्रति निष्ठा निभाई, लेकिन उसी राजसत्ता में अन्याय बढ़ता गया। उन्होंने परिवार को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया, लेकिन परिवार महायुद्ध की ओर बढ़ गया।

यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—क्या प्रत्येक प्रतिज्ञा जीवनभर निभाना ही महानता है, या परिस्थितियों के अनुसार अपनी प्रतिज्ञा और कर्तव्य की धर्मसम्मत समीक्षा करना भी आवश्यक है?

प्रतिज्ञा मनुष्य को दृढ़ता देती है, लेकिन यदि प्रतिज्ञा के पालन में न्याय और मानवता की उपेक्षा होने लगे, तो विवेकपूर्वक धर्म का विचार करना आवश्यक हो जाता है।

भीष्म का चरित्र इसी कारण इतना जटिल और शिक्षाप्रद है। वे केवल त्याग के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि उस त्याग की सीमाओं पर विचार करने की प्रेरणा भी देते हैं।

10. आज के जीवन के लिए भीष्म की शिक्षाएँ

भीष्म का जीवन आज भी अनेक महत्वपूर्ण संदेश देता है।

*पहली शिक्षा—त्याग के साथ विवेक भी आवश्यक है।* किसी व्यक्ति के सुख के लिए त्याग करना महान हो सकता है, लेकिन उस त्याग के दूरगामी परिणामों पर विचार करना भी आवश्यक है।

*दूसरी शिक्षा—संकल्प की शक्ति असाधारण होती है।* देवव्रत की प्रतिज्ञा ने उन्हें भीष्म बनाया। दृढ़ संकल्प मनुष्य के व्यक्तित्व को ऊँचाई देता है।

*तीसरी शिक्षा—अन्याय के समय मौन रहना उचित नहीं।* ज्ञान, पद और प्रतिष्ठा तभी सार्थक हैं, जब उनका उपयोग सत्य और न्याय की रक्षा में हो।

*चौथी शिक्षा—कर्तव्य और अंधनिष्ठा में अंतर है।* किसी परिवार, संस्था या शासन के प्रति निष्ठा का अर्थ यह नहीं कि उसके प्रत्येक निर्णय का समर्थन किया जाए।

**पाँचवीं शिक्षा—जीवन में सफलता केवल बाहरी उपलब्धियों से नहीं मापी जाती।** भीष्म का जीवन व्यक्तिगत सुखों से रहित था, लेकिन उनका ज्ञान, साहस और त्याग उन्हें भारतीय महाकाव्य परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण पात्र बनाते हैं।

उपसंहार : महानता केवल त्याग में नहीं, धर्मपूर्ण निर्णय में भी है

भीष्म पितामह का जीवन त्याग, ब्रह्मचर्य, पितृभक्ति, वीरता और कर्तव्यनिष्ठा का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने अपने जीवन में जितना त्याग किया, उतना ही कठिन संघर्ष भी सहा।

उनकी महानता इस बात में है कि उन्होंने व्यक्तिगत सुखों से ऊपर उठकर अपने कर्तव्य को महत्व दिया। उनकी त्रासदी इस बात में है कि कर्तव्य की उनकी व्याख्या कई बार उन्हें ऐसे निर्णयों से बाँधती रही, जिनके परिणाम दुखद हुए।

महाभारत हमें भीष्म के माध्यम से केवल यह नहीं सिखाता कि प्रतिज्ञा कैसे निभाई जाए, बल्कि यह भी सिखाता है कि प्रतिज्ञा निभाते समय धर्म, न्याय और विवेक को विस्मृत नहीं करना चाहिए।

*त्याग जीवन को महान बनाता है, संयम व्यक्तित्व को तेजस्वी बनाता है और विवेक उस महानता को सही दिशा देता है।*

भीष्म के जीवन का सबसे गहरा संदेश यही है कि मनुष्य को अपने वचन का पालन अवश्य करना चाहिए, लेकिन वचन, पद, संबंध और परंपरा—इन सबके ऊपर धर्म और न्याय की प्रतिष्ठा होनी चाहिए।

यही भीष्म के चरित्र का प्रेरणादायी पक्ष भी है और उसकी करुण त्रासदी भी।

पारस मल जैन
जोधपुर

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