सेवानिवृत्ति के बाद न कोई नौकरी न कोई दिनचर्या ! और एक शान्त घर, जो अब सन्नाटे की गूँज है! मैंने अंततः अपने असली अस्तित्व को खोज लिया, मैं कौन हूँ? मैंने बंगले बनवाये, छोटे बड़े कई निवेश किए। परिवार की आर्थिक व्यवस्था मजबूत बनाई ! फार्म हाऊस खड़े किए ! साईकिल से मोपेड़, मोपेड़ से बाईक, फिर कार तक की रफ्तार, जीवन में उतार-चढ़ाव के बाद शान्तिक्षणों से अब धीरे-धीरे चलता हूँ! वो भी अकेले अपने कमरे के भीतर छोटे-छोटे कदमों के साथ ।
सुबह की गुनगुनी धूप में होठ गुनगुनाते थे तब प्रकृति मुस्कराई और पूछा कौन हो तुम? प्रिय मित्र, मैंने कहाँ बस मैं हूँ ! राज्य देखे, परदेश घूमा, पर आज मेरी यात्रा ड्राईंग रूम से रसोई तक सीमित है। संस्कृतियाँ, परम्परायें सीखी, बस अब केवल अपने ही परिवार को समझने की इच्छा है! नींद और भूख लगना ही मेरी खुशी है ! शरीर में सिमरन ने कब्जा कर आत्मा की अदालत भी मौन हो गई ! प्रकृति ने फिर पूछा मुस्कराते हुए तुम कौन हो ? प्रिय मित्र
मैंने कोमल स्वर में उत्तर दिया, मैं बस मैं हूँ! कभी जन्मदिन, सगाई, शादियाँ धूमधाम से मनाई ! जीवन में जो उपलब्धि हासिल की वे शान्त बैठी है, किसी काम की नहीं! आँखों की झपकियों के सहारों से चारदीवारी के अन्दर सीमित हो गया! पर आज सब्जियाँ खरीदने के लिए सिक्के गिनता हूँ! प्रकृति फिर मुस्कराई तुम कौन हो प्रिय मित्र ?
मैं चौंका उसकी माधुर्य वाणी पर, मैंने आ हँ भर स्नेह से उत्तर दिया, मैं बस मैं हूँ! सोना चाँदी हीरे लॉकर्स में चुपचाप पड़े हैं, सूट-ब्लेजर अलमारी में टंगें, बिना छुए। पर अब मैं नरम सूती कपड़ों में जीता हूँ। काम के सिलसिले में शहर-शहर घूमता रहा! अब उन फायदों और नुकसानों को यादों से तोलता हूँ। व्यापार चलाया, परिवार बसाया, अनेक रिश्ते बनाऐं, नियमों का सदैव पालन किया, नियम बनाये, पर आज उन्हीं नियमों की चीरफाड़ कर आलोचना होती है। शिक्षा में आगे बढ़ा। अब समझ में आया, जीवन के वास्तविक मायने क्या हैं।
प्रकृति ने कोमलता से मुस्कराते हुए पूछा तुम कौन हो ? प्रियमित्र ! मैंने भी मुस्कराते हुए उत्तर दिया, तुम मैं हो, और मैं तुम। कभी मैं आकाश में उड़ता था। अब जमीन को सम्मान से छूता हूँ। जीवन आशाओं का प्रकाश – पुँज का सूरज भी धीरे-धीरे ओझल होता जा रहा है। जिन्दगी की हर ऊँच-नीच के बाद शान्त पल में मेरी आत्मा ने मुझसे फुसफुसा कर कहा है यात्री बस अब तैयार होजा, अन्तिम यात्रा की तैयारी कर ! श्मशान की फुसफुसी आवाज भी गूंज रही है, हे यात्री, जब तेरी अन्तिम यात्रा आएगी, मखमल के सफेद चादर में लिपटकर मैं तैयार हूँ स्वागत के लिए!
प्रकृति ने गम्भीर स्वर से पूछा तुम कौन हो प्रिय मित्र, मैंने विनम्र भाव से उत्तर दिया बस मैं तुम में, मुझे क्षमा करो, क्षमा दान दो, एक और मौका दो जीने का, पैसा कमाने की मशीन नहीं, एक सच्चा इंसान बनकर कृत — कारित — अधर्म — असत्य — पाप कर्मों को काटने के लिए। सत्य — संयम — साधना, माधुर्य एवं सेवा भाव के लिए!
छगन लाल जैन
हरसाना वाले
रि. अध्यापक 3 / 308 शालीमार अलवर