श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

आत्मविकास के क्रमिक सोपान

गतांक से आगे –

जैनाचार

आचार और विचार व्यक्तित्व के समान शक्ति वाले दो पक्ष हैं। दोनों अन्योन्याश्रित हैं। विचारों के आधार पर ही हमारा आचरण फलता है तथा आचरण से ही विचारों में स्थिरता आती है। इन दोनों पक्षों के सन्तुलित विकास होने पर ही व्यक्तित्व का विशुद्ध विकास होता है। इस प्रकार के विकास को हम ज्ञान और क्रिया का विकास कह सकते हैं, जो दुःख मुक्ति के लिए अनिवार्य है।

आचार और विचार की एक दूसरे पर इसी निर्भरता को दृष्टिगत रखते हुए, भारतीय तत्त्व-चिन्तकों ने धर्म और दर्शन का साथ-साथ प्रतिपादन किया है। उन्होंने एक ओर जहाँ तत्त्वज्ञान की प्ररूपणा कर दर्शन की प्रस्थापना की है, वहीं दूसरी ओर आचार-शास्त्रों का निरूपण कर साधना का मार्ग प्रशस्त किया है। भारतीय परम्परा में आचार को धर्म तथा विचार को दर्शन कहा गया है। जब मानव-विचारों के गर्भ में प्रवेश करता है, तब दर्शन जन्म लेता है तथा जब विचारों को आचरण में ढालता है, तब धर्म प्रकट होता है। धर्म तथा दर्शन परस्पर पूरक हैं। एक के बिना दूसरा एकांगी और अपूर्ण है। दर्शन रहित आचरण अन्धा है। जिस आचरण में विवेक की जगमगाती ज्योति नहीं है, वह सही और गलत की अन्ध गलियों में भटकता रहेगा। आचार का मार्गदर्शक विचार है। विचार ही आचार को सन्मार्ग पर चलाता है। दूसरी ओर आचार रहित विचार पंगु है। मुक्ति के साधना-पथ पर आचार रहित साधक आगे नहीं बढ़ सकता। दीपक की चर्चा से प्रकाश प्रकट नहीं होता, प्रकाश तो दीप जलाने की क्रिया आचरण से ही प्रकट होता है। इस तरह आचार रहित विचार और विचार रहित आचार दोनों ही निरर्थक हैं। दोनों का समन्वय ही सच्ची धर्म साधना है जिसके द्वारा मुक्ति की मञ्जिल प्राप्त की जा सकती है।

जैन-परम्परा में आचार और विचार को समान स्थान दिया गया है। अहिंसा मूलक आचार और अनेकान्त मूलक विचार का प्रतिपादन जैन-परम्परा की प्रमुख विशेषता है।

अहिंसा

अहिंसा जैनाचार का प्राण तत्त्व है। इसे ही परमब्रह्म और परमधर्म कहा गया है। अहिंसा का जितना सूक्ष्म विवेचन और आचरण जैन-परम्परा में मिलता है, उतना किसी अन्य परम्परा में नहीं। अहिंसा का मूलाधार आत्म-साम्य है। प्रत्येक आत्मा चाहे वह सूक्ष्म हो या स्थूल, स्थावर हो या त्रस, तात्त्विक दृष्टि से समान है। सभी जीवों में एकसी ही आत्मा का वास है। सुख-दुःख का अनुभव प्रत्येक प्राणी को होता है। जीवन-मरण की प्रतीति सब करते हैं। जिस प्रकार हमें जीवन प्रिय है मरण अप्रिय, सुख प्रिय है दुःख अप्रिय, अनुकूलता प्रिय है प्रतिकूलता अप्रिय, लाभ प्रिय है हानि अप्रिय, स्वतन्त्रता प्रिय है परतन्त्रता अप्रिय, उसी प्रकार अन्य प्राणियों को भी जीवन आदि प्रिय है तथा मरण आदि अप्रिय, इसलिए हमारा कर्त्तव्य है कि हम मन से भी किसी प्राणी के वध आदि की बात न सोचें। शरीर से किसी को कष्ट पहुँचाना तो पाप है ही, वचन से भी इस प्रकार की प्रवृत्ति करना पाप है। मन, वचन और काय से किसी भी प्राणी को कष्ट पहुँचाने से बचाये रखना ही सच्ची अहिंसा है। वनस्पति आदि एकेन्द्रिय प्राणी से लेकर मानव तक के प्रति अहिंसक आचरण की भावना जैन-परम्परा की प्रमुख विशेषता है। इसे अहिंसक आचार का परमोत्कर्ष भी कहा गया है। आचार का यह अहिंसक विकास जैन-संस्कृति की अनमोल निधि है।

अहिंसा अव्यवहार्य नहीं

जैन धर्म में प्रतिपादित अहिंसा के मर्म को न समझ पाने के कारण कुछ लोग इसे कायरता की जननी समझते हैं तथा कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सिद्धान्ततः इसे श्रेष्ठ समझते हुए भी उसे अव्यवहार्य मानते हैं। उनका यह मानना है कि अहिंसा अच्छी चीज होते हुए भी उसे पाला नहीं जा सकता, इसलिए वह अव्यवहार्य है। यह नासमझी का ही परिणाम है। न तो अहिंसा कायरता है और न ही वह ऐसी है कि उसको पाला ही न जा सके, जिससे ‘उसे अव्यवहार्य कहा जा सके। हिंसा और अहिंसा के स्वरूप पर गहराई से विचार करने पर उक्त आशंका को स्थान ही नहीं मिलता।

किसी जीव को मारना मात्र हिंसा नहीं है। हिंसा और अहिंसा का सम्बन्ध तो हमारे भावों, परिणामों, विचारों से है। इसे हमें व्यापक अर्थों में समझना चाहिए। यूँ तो संसार में सर्वत्र जीव भरे हैं तथा वे प्रति समय अपने-अपने निमित्तों से मरते रहते हैं। इतने मात्र से कोई हिंसक नहीं हो सकता। जैन धर्म के अनुसार हिंसा रूपपरिणाम होने पर ही किसी को हिंसक कहा जा सकता है। हिंसा की परिभाषा बताते हुए आचार्य उमास्वामी ने तत्त्वार्थ सूत्र में कहा है कि-

“प्रमत्तयोगात् प्राणव्यपरोपणं हिंसा।”

“जब कोई प्रमादी बनकर, जान-बूझकर, असावधानी अथवा लापरवाही से किसी भी जीव का घात करता है अथवा कष्ट पहुँचाता है तभी उसे हिंसक कहा जा सकता है।” आशय यह है कि हिंसा तीन परिस्थितियों में होती है। पहली जान बूझकर-अभिप्रायपूर्वक, दूसरी असावधानी या लापरवाही जन्य तथा तीसरी हिंसा न चाहते हुए भी, पूर्ण सावधानी बरतने पर भी, अचानक/अनायास किसी जीव का वध हो जाने पर। जब कोई स्वार्थ प्रेरित व्यक्ति कषाय के वशीभूत हो किसी पर वार करता है तो यह हिंसा कषाय प्रेरित हिंसा कहलाती है तथा जब हमारी असावधानी या लापरवाही से किसी का घात होता है अथवा किसी को कष्ट पहुँचता है तो वह हिंसा असावधानीकृत हिंसा कही जाती है, लेकिन पर को कष्ट पहुँचाने की भावना से शून्य पूरी तरह से सावधान व्यक्ति द्वारा यदि अनायास किसी प्राणी का घात हो जाता है तो उक्त परिस्थिति में उसे हिंसक नहीं कहा जा सकता। इस बात को स्पष्ट करते हुए आचार्य श्री कुन्द-कुन्द कहते हैं कि-

“उच्चालिदाम्मि पादे इरियासमिदस्स णिग्गमट्ठाणे।

आबाघेज्ञ्ज कुलिंगो मरेज्ज तं जोगमासेज्ज ।। 1।।

णहि तस्स तण्णिमित्तो वन्धो सुरुमोवि देसिदो समये।”

“यदि कोई मनुष्य सावधानीपूर्वक जीवों को बचाते हुए देखभाल कर चल रहा है, फिर भी यदि कदाचित् कोई जीव उसके पैरों के नीचे आकर मर भी जाये तो उसे तज्जन्य हिंसा सम्बन्धी सूक्ष्म पाप भी नहीं लगता, क्योंकि उसके मन में हिंसा के भाव नहीं हैं तथा वह सावधान है। ”

इसके विपरीत, यदि कोई मनुष्य “मेरी इस प्रवृत्ति से किसी का घात हो रहा है या नहीं, किसी को कष्ट पहुँच रहा है या नहीं” इस बात का विचार किये विना एकदम लापरवाही और असावधानी से चल रहा है तो उसे हिंसानिमित्तक पाप अवश्य लगेगा, भले ही जीव का वध हो या न हो।

मरदु व जीवदु व जीवा अयदाचारस्स णिच्छिदा हिंसा।
पयदस्स णत्थि बंधो हिंसा मित्तेण समिदस्स ।।

“यदि कोई असावधानीपूर्वक अयत्नाचारी बनकर अपनी प्रवृत्ति कर रहा है तो जीव मरे या न मरे, उसे तेज्जन्य पाप से कोई बचा नहीं सकता तथा सावधानी से प्रयत्नपूर्वक चलने वाले मनुष्य द्वारा हिंसा हो जाने पर भी वह पाप का भागीदार नहीं होता। ”

अतः यह स्पष्ट है कि जैन धर्म में मान्य हिंसा और अहिंसा जीवों के वधावध पर निर्भर न होकर जीव के भावों पर आधारित है। द्रव्य हिंसा और भाव हिंसा की उक्त व्याख्या को हम लोक प्रचलित इस उदाहरण से सहज ही समझ सकते हैं।

मान लीजिये – किसी शहर में एक साथ तीन घटनाएँ घट जाती हैं। पहली में एक डाकू एक व्यक्ति को मारकर उसका धन लूट लेता है, दूसरी में एक वाहन दुर्घटना में एक व्यक्ति की जान जाती है और तीसरी में ऑपरेशन टेबल पर एक व्यक्ति का जीवन समाप्त हो जाता है।

तीनों घटनाओं में एक-एक व्यक्ति के निमित्त से एक-एक व्यक्ति का जीवन समाप्त हुआ है। स्थूल दृष्टि से देखने पर तीनों का परिणाम प्रतिफल भी एक ही है, लेकिन तीनों की मानसिकता में बहुत अन्तर है। यही कारण है कि पुलिस भी डाकू, ड्राइवर और डाक्टर तीनों पर अलग-अलग जुर्म कायम करती है तथा अदालत में भी तीनों को अलग-अलग निर्णय सुनाया जाता है।

पहली घटना में डाकू को हत्या के आरोप में आजीवन कारावास अथवा मृत्युदण्ड भी दिया जाता है। उसके प्रहार से यदि सामने वाला बच भी जाये तो भी हत्या के प्रयास के कारण उसे कड़ी सजा भोगनी पड़ती है, क्योंकि यह हिंसा स्वार्थ से प्रेरित अभिप्रायपूर्वक हुई है।

ड्राइवर को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, उसे घटना के तथ्यों के अनुरूप या तो अयोग्य वाहन चलाने अथवा असावधानी से वाहन चलाने का दोषी मानकर हल्का दण्ड दिया जाता है। यह असावधानीकृत हिंसा है। यदि ड्राइवर सावधान होता तो उक्त घटना टाली जा सकती थी।

तीसरी ओर डाक्टर को कोई अपराधी नहीं कहता, अपितु “डाक्टर साहब तो अन्तिम क्षणों तक बचाने की कोशिश में लगे रहे”, यह कहकर उनकी सराहना की जाती है। पुलिस और अदालत भी उसका कुछ नहीं करते। रोगी के सम्वन्धी भी यही कहते हैं कि “डाक्टर साहब ने तो बहुत प्रयत्न किया, लेकिन क्या करें, हमारा तो भाग्य ही ऐसा था।” हिंसा और अहिंसा की उक्त धारणा से स्पष्ट है कि हिंसा और अहिंसा हमारे भावों पर ही निर्भर है। द्रव्य हिंसा ही हिंसा नहीं, वस्तुतः भाव हिंसा ही वास्तविक हिंसा है। आशय यह है कि किसी को कष्ट पहुँचाने या घात होने पर भी कोई व्यक्ति तब तक हिंसक नहीं कहा जा सकता जब तक कि उसका वैसा अभिप्राय नहीं हो अथवा असावधानी न हो। इसके विपरीत यदि किसी का अभिप्राय किसी के घात करने का हो तथा बहुत कोशिश करने पर भी वह उसका कुछ अनिष्ट न कर सका हो तो वह जीव हिंसक ही माना जायेगा। दूसरों का अहित चाहने वाला सबसे पहले अपना अहित करता है। कहा भी है-

स्वयमेवात्मात्मानं हिनस्त्यात्मा प्रमादवान्।
पूर्व प्राण्यन्तराणां तु पश्चाद् स्याद् न वा वधः।।’

इसीलिये जैन धर्म में हिंसा को द्रव्य हिंसा और भाव हिंसा के भेद से दो भागों में विभाजित किया गया है। जब किसी का घात हो जाता है तब वह द्रव्य हिंसा कहलाती है तथा किसी को मारने या सताने के अभिप्राय अथवा असावधानी के भाव को भाव हिंसा कहते हैं। वस्तुतः भाव हिंसा ही हिंसा है। भाव हिंसा से सम्बन्ध होने पर ही द्रव्य हिंसा, हिंसा कहलाती है, किन्तु द्रव्य हिंसा के होने पर भाव हिंसा अनिवार्य नहीं। अतः हमारे भावों के अनुसार ही हिंसा और अहिंसा का समीकरण बनता है।

भावों पर आधारित हिंसा और अहिंसा की उक्त व्याख्या से स्पष्ट है कि पूर्ण सावधानी से प्रवृत्ति करने वाले, हिंसा की भावना से रहित मनुष्य के द्वारा यदि किसी जीव का घात हो जाता है तो वह उसके पाप का भागीदार नहीं है। अतः अहिंसा को अव्यवहार्य नहीं कहा जा सकता। हमारा तो यही कर्तव्य है कि हम अपने स्वार्थ से प्रेरित होकर किसी को कष्ट पहुँचाने का कभी भाव न करें, तथा हमारी प्रवृत्ति से जीवों का कम से कम घात हो, इस बात को ध्यान रखकर अपने जीवन का निर्वाह करें। हमारी प्रवृत्ति में जितनी साबधानी होगी हम उतने ही अहिंसक होंगे।

क्रमशः

१०८ मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज

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