शिक्षक का लक्ष्य शिक्षा के माध्यम से एक स्वस्थ, सुसंस्कृत तथा उत्तरदायी नागरिक का निर्माण करना है। लेकिन आज जेन जी जेन, अल्फा जिनके हृदय मे शिक्षा का अर्थ केवल डिग्री प्राप्त करना, आर्थिक संपन्नता प्राप्त करना मात्र रह गया है। उनके लिए नैतिकता, कर्तव्य बोध, राष्ट्र भावना अर्थ नहीं रखती।परीक्षा का परिणाम ही अंतिम लक्ष्य नहीं होता । इस परिस्थिति में शिक्षक का दायित्व और भी बढ़ जाता है। बच्चो के सर्वतोमुखी विकास हेतु शिक्षा तंत्र की महत्वपूर्ण कड़ी शिक्षक ही होता है । शिक्षक जब-जब अपने काम के प्रति वफादार रहा तब तक दुनिया आगे बढ़ी। वर्तमान स्थिति में शिक्षा की मूल्य विहिनता के लिए शिक्षकों के सामने विद्यार्थी का समग्र विकास और अस्तित्व एक चुनौती बन गया है।
*व्यक्तित्व विकास पर फोकस:-*
शिक्षक की भूमिका विद्यार्थियों को सिर्फ पुस्तक की ज्ञान करने तक सीमित नहीं है बल्कि उनके व्यक्तित्व को निखारने, उनका पर्सनालिटी डेवलपमेंट करने की भी है । नॉलेज केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं है। शिक्षक का रोल केवल जानकारी देना नहीं वरन सही तरीके से समझाना, एनालिसिस करना है, जो छात्रों के जीवन में काम में आए। शिक्षा केवल डिग्री पाने का जरिया मात्र नहीं है वह तो जीवन जीने की कला है। शिक्षक वह कड़ी है जो शिक्षा को छात्रो के जीवन और समाज को जोड़ता है, वैल्यूज डालता है, ईमानदारी का पाठ पढ़ाता है,अनुशासन सिखाता है तथा संवेदनाएं भरता है। यदि इस तरह की शिक्षा न दी गई तो विद्यार्थी अधूरा एवं अपूर्ण रह जाता है।
*मेंटर और मोटीवेटर बने*
आज के दौर में शिक्षा का उद्देश्य अधिक से अधिक अंक लाना रह गया है। लेकिन इतने अंकों के बाद भी उच्च शिक्षा, प्रोफेशनल शिक्षा और रोजगार के अच्छे अवसरो से वंचित रह जाते हैं। यदि शिक्षा का उद्देश्य एवं संपूर्ण फोकस समग्र विकास पर हो, ज्ञान के साथ स्किल, क्रिएटिविटी लीडरशिप, टीमवर्क तथा मूल्य परक हो तभी ऐसी स्थिति से उबार सकते हैं। अतः शिक्षा केवल एकेडेमिक वाली न होकर आत्मविश्वास जगाने वाली व्यक्तित्व का विकास करने वाली, आत्मनिर्भर बनाने वाली हो। शिक्षक को केवल अध्यापक ही नहीं बल्कि एक कुशल मेंटर तथा मोटिवेटर भी बनना है। जिससे बच्चे सही मार्गदर्शन और मोटिवेशन पाकर असाधारण उपलब्धियां प्राप्त कर सके। इस प्रकार शिक्षक का दायित्व केवल मेधावी छात्रों को आगे बढ़ाना ही नहीं बल्कि प्रत्येक बच्चे को उनकी क्षमता एवं रुचि के अनुसार दिशा बोध देना भी है।
*जरूरी है भावनात्मक संतुलन:-*
आज बच्चों को डिजिटल स्किल और इमोशनल बैलेंस दोनों सिखाना जरूरी है। जहां एक और तकनीकी उन्हें नए अवसर देती है वहीं दूसरी और मानसिक दबाव और प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में शिक्षक एवं शिक्षा व्यवस्था का फोकस केवल पढ़ाई तक न होकर मानसिक स्वास्थ्य, जीवन शैली और जीवन कौशल पर होने की आवश्यकता है। बच्चे जब संतुलित और आत्मनिर्भर बनते हैं तभी वे समाज और राष्ट्र हेतु अपनी पूरी क्षमता के साथ योगदान कर पाते हैं।
*उचित वातावरण :-*
आज का युग भले ही AI और डिजिटल हो गया हो लेकिन शिक्षक की भूमिका फिर भी महत्वपूर्ण है। तकनीकी ज्ञान केवल एक टूल मात्र है, लेकिन इंसानियत, संवेदनाएं ,प्रेरक उद्बोधन, इंस्पिरेशन ,केवल एक योग्य शिक्षक ही दे सकता है। शिक्षक ही विद्यार्थी का गाइड और जीवन निर्माता है। क्योंकि गुरु के बिना ज्ञान नहीं, ज्ञान के बिना जीवन नहीं । अत:शिक्षक छात्रों को ऐसा वातावरण दे जिससे उनमें कम्युनिकेशन स्किल जो क्रिटिकल सोच से आती है, प्रॉब्लम सॉल्विंग जो टीमवर्क से तय होती है, डिजिटल नॉलेज जो लीडरशिप सिखाती है, तथा क्रिएटिविटी जो अडेपटेबिलिटी से आती है । इन सब के लिए प्रैक्टिकल , व्यावहारिक प्रयोग जो केवल शिक्षक ही दे सकता है। इसलिए आज के परिपेक्ष में शिक्षक की बहुत महति आवश्यकता है।
आज के समय में अभिभावकों और शिक्षकों के बीच गहरे एवं मजबूत संवाद की आवश्यकता है। इसी से विद्यार्थियों के लिए बेहतर एवं उचित माहौल एवं वातावरण तैयार होता है। इसी से उनकी प्रगति कई गुना बढ़ जाती है। शिक्षा केवल स्कूल की चारदीवारी तक सीमित न होकर प्रकृति, परिवार, और समाज से जुड़े और शिक्षा पद्धति का अभिन्न अंग बने।
*सकारात्मक बदलाव:-*
शिक्षा केवल पैसा या व्यवसाय नहीं वरन् समाज को दिशा देने का सबसे महत्वपूर्ण साधन है। इसी से बच्चा केवल एक अच्छा विद्यार्थी ही नहीं बल्कि एक जिम्मेदार इंसान, एक क्रिएटिव थिंकर, और एक समाज का सकारात्मक बदलाव लाने वाला नागरिक बन सकता है । यही शिक्षा , शिक्षक और स्कूल का लक्ष्य बने ।
*भविष्य निर्माता:-*
द स्कोर नेशन के विशेषज्ञों के अनुसार शिक्षक अपने अनुभव और मार्गदर्शन से विद्यार्थियों को न केवल कठिनाइयों पर विजय पाना सीखते हैं बल्कि सफलता की ओर बढ़ने का सही रास्ता दिखाते हैं। वह न केवल विद्यार्थियों के भविष्य को गढते हैं बल्कि राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इस प्रकार शिक्षक दिवस एक औपचारिक उत्सव नहीं वरन ऐसी नींव है जिस पर भविष्य की इमारत खड़ी होती है। शिक्षक दिवस याद दिलाता है कि असली राष्ट्र निर्माता कक्षाओं में खड़े हुए गुरु ही है जो छात्रों में सपनों के बीज बोते हैं और मेहनत से उन्हें हकीकत में बदलते हैं । इसके लिए आवश्यक है कि वह अध्यापन के साथ अच्छे मेंटर और मोटीवेटर बने ,अच्छा माहौल उन्हें दे, जो विद्यार्थियों को पुस्तकों से बाहर लेकर आए तथा व्यावहारिक धरातल पर उनके व्यक्तित्व का निर्माण और विकास कर सके।
डॉ. पदम चन्द गाँधी
मो. 9414 967 294
जयपुर