गौतम गणधर स्वामी वृहद प्रतिक्रमण में कहते है “अभावयं भावेमि, भावयं ण भावेमि।”
अर्थात् हे भगवन्! मैंने आज तक जो नहीं पाया वह पाना चाहता हूँ और अनादि से जो पाया है जो भाव पाये है वह नहीं पाना चाहता, उसकी भावना नहीं करता। अनादि की राग-द्वेष, मोह की बातों से मैं थक चुका हूँ और अब उसका बोझा ढोने का साम्य अब मुझसे नहीं है। इन बातों को भाने से मात्र संसार वर्द्धन ही हुआ है। इन बातों को न भाना चाहता हूँ, न सुनना चाहता हूँ। अब पाना जो है वह तत्त्व है, आज तक अतत्त्व को भाया, पाया, सुना व चाहा। आत्मा में अनादि के संस्कार ऐसे है जो अतत्त्व पर शीघ्र पहुँच जाते है। उदाहरण के लिये यदि यहाँ प्रवचन सभा में तत्त्वचर्चा, स्वाध्याय चल रहा है और पीछे से झगड़े की आवाज आ जाए तो विरला ही कोई होगा जिसकी दृष्टि पीछे न पहुँचे। यद्यपि पीछे माईक भी नहीं है। फिर भी कान शीघ्रता से catch कर लेते है और तत्त्वचर्चा माईक से हो रही हो तो वह भी सुन नहीं पाते। यदि प्रवचन के बाद पूछा जाए महाराज ! ने क्या कहा वह तो मालूम नहीं। परन्तु 2 मिनिट का झगड़ा याद है कि अमुक-अमुक का झगड़ा हुआ था। अनादि के संस्कार, राग-द्वेष के सहज संस्कार आत्मा में है। सुनाने वाला झगड़े की बात बड़े उपयोग से सुनाता है तथा सुनने वाला रस ले लेकर सुनता है। प्रवचन व तत्त्वचर्चा की बात न तो कहने वाला मिलेगा न सुनने वाला। झगड़े को सुनने का भाव अतत्त्व रुचि है। यही मिथ्यादर्शन है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि किसी धार्मिक व्यक्ति का accident हो गया बेचारा hospital पहुँच गया परन्तु मन महाराज के प्रवचन में लगा है। बड़े-बड़े sound box होते है जिनसे आवाज आप तक पहुँच रही है और व्यक्ति कान लगाकर सुनता है, कदाचित् सुनाई न दे तो दुःखी होता है। सम्यग्दृष्टि गुरु के एक-एक शब्द को अंतरात्मा में संजोकर रखता है और उस तत्त्वोपदेश का पान सबको कराता है। परन्तु मिथ्यादृष्टि के अंदर जिज्ञासा ही नहीं होती। यदि कोई बताये भीकि शास्त्र में यह बात निकली थी तो वह कहता है बस बस रहने दो तेरे प्रवचन मुझे नहीं सुनना। यह अतत्त्व रुचि है। जो सुनना चाहिए उसमें मन नहीं लगता। जबकि श्रद्धालु कान लगा लगा कर सुनता है। सम्यग्दर्शन आत्मा की परिणति है। सम्यग्दृष्टि को लौकिक ख्याति, पूजा, लाभ की भावना नहीं रहती। वह तो मोक्षमार्ग को आत्महित का रास्ता मानता है। तत्त्व मिल गया यानि अमूल्य निधि मिल गई। तत्त्व नहीं मिला तो कोरे के कोरे रह गये। पंडित दौलतराम जी कहते है-
“दौल समझ सुन चेत सयाने काल वृथा मत खोवे।
यह नरभव फिर मिलन कठिन है जो सम्यक् नहीं होवे ।।”
पंडित दौलत राम जी कह रहे है हे दौल! अपने आपको स्वयं संबोधित कर रहे है, कि हे दौलत राम! तत्त्वोपदेश को समझों, सुनो व सावधान हो जाओ। बहुत सुन्दर बात है कि पंडित जी स्वयं के लिए कह रहे है कि तत्त्व के उपदेश को समझो, सुनो। जब तत्त्व की बात को सुनकर, समझने का प्रयास करोंगे तभी सावधानता तुम्हारे जीवन में आयेगी। ‘सुन’ यह शब्द Alert करने वाला है। सुनिए फिर समझिये और सावधान हो जाइए। पहले के समय में ज्येष्ठ, श्रेष्ठ लोगों को ‘सयाना’ कहा जाता है। हर व्यक्ति ‘सयाना’ नहीं है जो समझे, सुने व चेत यानि सावधान हो जाए वह सयाना है। हे सयाने। अपने काल को वृथा मत खोना। प्राणों को स्वाहा होने में पल भर भी नहीं लगता। “पल में परलय होत है”
प्रलय होने के लिए 1 पल, 1 क्षण ही काफी है, 1 पल का भी भरोसा नहीं कल की क्या सोचना। कल भूत है। भूत की तो मृत्यु हो गई। अब भूत को गुनगुनाने से लाभ नहीं। भविष्य अजन्मा है। अभी जन्म ही नहीं हुआ। इसलिये भूत को भूलो, भविष्य को छोड़ो और वर्तमान में जियो क्योंकि वर्तमान ही तुम्हारा अपना है। उसी की कीमत है। उसका मूल्यांकन कीजिए। जो वर्तमान को संभाल लेता है उनका भविष्य तो फिर संभला, संभलाया ही है इसलिये वर्तमान के 1-1 पल की कीमत कीजिए। हे भव्य। यदि तुमने आज गुरु चरण शरण पायी, जिनवाणी को पाया, जिनकुल पाया यदि तुमने अनुकूलता में सम्यग्दर्शन को पाने का प्रबल पुरुषार्थ नहीं किया तो यह नरभव यूं ही वृथा चला जायेगा और यदि यह नरभव गया तो दुबारा मिलेगा कि नहीं कोई भरोसा नहीं। एक बार एक व्यक्ति कोमैंने कहा इस पंचम काल में अधिकांश मनुष्य नरक जायेगे तो वह घबरा गया। बोला महाराज ! क्या कहते है मुझे तो घबराहट हो रही है। मैंने कहा- मुझे भी हुई थी जब मुझे पता चला था फिर आपने क्या किया? बस घर छोड़ा और निकल पड़ा मुक्ति के पथ पर। क्योंकि दीक्षा लेने पर स्वर्ग का टिकिट मिल जाता है परन्तु उस टिकिट को विषय चोर चुरा न ले इसलिये पाँच महाव्रत व पाँच समिति के loker में उस टिकिट को रखना पड़ता है। अन्यथा विषय कषाय रुपी चोर चुरा ले जायेगे। महाराज! बात समझ में आ गई।
यही बात दौलत राम जी कह रहे है यदि तुम सम्यग्दर्शन को पाने पुरुषार्थ न करोगे तो नरक, तिर्यंच आदि दुर्गतियों में नियम से जाना ही पड़ेगा। इसलिये कम से कम श्रद्धा को तो समीचीन बना ही लो। यदि वर्तमान को संसार भ्रमण में, खाने-पीने में, घूमने-फिरने में गंवा दिया तो फिर कुछ नहीं मिलेगा। हाथ के पानी को फेक आगे कुये की तलाश करना मूर्खता है। पंडित जी कह रहे है लौकिक संसार को छोड़ परमार्थ पर बढ़ जाओं।
आप भी दौलतराम बनो, आत्म संबोधन करों और बढ़ जाओं मुक्ति पथ की ओर। अनादि के संस्कारों को बदल दो, मिथ्या अंधकार से सम्यक्त्व के प्रकाश में आ जाओं तो असीम सुख को पा जाओगे।