एक बार धर्ममूर्ति तपस्वी धर्मघोष मुनिराज एक माह के उपवास करके चंपापुरी नगरी में पारणा के पश्चात् लौटते समय रास्ता भ्रमित हो गये । ज्यादा चलने से उन्हें तृषा वेदना उत्पन्न हो गई अतः वे गंगा के किनारे आकर एक छायादार वृक्ष के नीचे बैठ गये कि तभी गंगादेवी उनकी व्याकुलता देख जल से भरा लोटा लाकर बोली. हे तपस्वी योगीराज । मैं ठण्डा जल लाई हूँ आप इसे पीकर अपनी वेदना शांत करें। उन्होंने उसके भक्ति युक्त शब्दों को सुना और ध्यानारुढ़ हो गये । यह देख देवी चकित हुई और विदेहक्षेत्र जाकर समवशरण में प्रश्न किया कि उन मुनि महाराज ने जल ग्रहण क्यों नहीं किया। तब पूज्य गणधर महाराज ने कहा दिगम्बर जैन मुनि महाराज न तो असमय में और न अनेक बार भोजन-पानी ग्रहण करते हैं तथा देवों द्वारा भी दिया गया आहार जल ग्रहण नहीं करते। ऐसा उनका दृढ़ संकल्प रहता है, देवी प्रभावित हुई, ऐसा सुनकर प्रसन्न हो उसने उनके चारों ओर सुगंधित जल की वर्षा प्रारंभ कर दी, अतः सही कहा गया कि-
“लोकद्वये पराः पूजाः, प्राप्यंते कुर्वातः तपः !
आवर्ज्यन्तेऽखिला देवाः, पुरन्दरः पुरः सराः !!
सम्यक् तप करने वाले साधु इहलोक एवं परलोक में भी सातिशय पूजा प्राप्त करते तथा तप के माहात्म्य से इन्द्र जिनके आगे हैं ऐसे सर्व देव उन्हें प्रणाम करते हैं आदर-सत्कार करते हैं और वे मुनिराज आत्मा के अनुपम सुख के रसास्वाद द्वारा कर्मोत्पन्न तृषा वेदना पर विजय प्राप्त कर, चार घातिया कर्मों का नाश कर केवली हुये। इस प्रकार सम्यक तप की महिमा होती है।
卐卐卐
एक बार की बात है आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज का कटनी नगर में चतुर्मास हो रहा था। उस समय आचार्य श्री घड़ी, पहने हुये व्यक्ति से आहार नहीं लेते थे इसलिये चौके वाले घड़ी, अगूंठी आदि पहले से उतार कर रख देते थे। एक बार आचार्य श्री ने नियम ले लिया कि जो घड़ी के द्वारा पड़गाहन करेगा उसके यहाँ आहार लेंगे अन्यथा नहीं। इस प्रतिज्ञा को लिये आचार्य श्री को तीन दिन व्यतीत हो गये पूरे नगर में आचार्य श्री की विधि कहीं भी नहीं बनी। चौथे दिन आचार्य श्री पुनः चर्या के लिए निकले। नगर के दो चक्कर लग चुके थे अभी भी विधि नहीं बन रही थी, तब पंडित जगन्मोहनलाल जी शास्त्री का भी चौका लगा हुआ था। उस दिन पंडित जी मंदिर से आये।
और चौके में पड़गाहन को खड़े हो गये किन्तु अपने हाथ की घड़ी उतार कर दुकान पर रख दी जब तीसरे चक्कर में आचार्य श्री के आने की खबर मिली तो उसके पूर्व क्या हुआ कि जब महाराज दो बार लौट गये अब नहीं आयेंगे ऐसा सोचकर दुकान पर रखी हुई घड़ी उठा कर हाथ में ले ली कि इतने में पुनः आचार्य श्री आ गये, इसलिये पड़गाहने खड़े हो गये। आचार्य श्री ने पंडित जी के हाथ में घड़ी देखी और खड़े हो गये, विधिपूर्वक पड़गाहन किया। आहार के बाद पंडित जी ने महाराज जी से पूछा-महाराज आपकी किस चीज की विधि थी जो तीन दिन तक विधि नहीं मिली। तब आचार्य श्री ने कहा कि-जो हाथ में घड़ी लेकर पड़गाहेगा उसके यहाँ आहार करेंगे। पंडित जी को आश्चर्य हुआ कि घड़ी तो मेरी दुकान पर थी, हाथ में घड़ी कहाँ से आ गई। तब आचार्य श्री ने कहा कि घड़ी के पड़गाहने से ही आया हूँ भैया, ये है कठोर तप कि कई दिन तक आहार आदि के न होने पर भी अपनी तपस्या से साधु विचलित नहीं होते हैं।
卐卐卐