श्री पल्लीवाल जैन डिजिटल पत्रिका

अखिल भारतीय पल्लीवाल जैन महासभा

(पल्लीवाल, जैसवाल, सैलवाल सम्बंधित जैन समाज)

जैसलमेर का ‘चादर महोत्सव’ जुलूस — भक्ति का त्योहार या काले धन का नंगा प्रदर्शन?

जैन समाज को इस बात पर गर्व है कि वे अहिंसा के पालन में दुनिया भर में अग्रणी हैं। लेकिन, वास्तविकता में समाज के अधिकांश कार्य इसके बिल्कुल विपरीत होते हैं। अगर कोई अहिंसा के सिद्धांतों को पूरी तरह टूटते हुए देखना चाहता है, तो उसे जैन त्योहारों को देखना चाहिए — खासकर पर्युषण और चातुर्मास के दिनों में, या पंच-कल्याणक / अंजनशलाका समारोह, विधान और पूजन आदि अवसरों पर। इन अवसरों के दौरान, एक इंद्रिय से लेकर पाँच इंद्रिय तक के जीवों की हिंसा से बचने पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। इसके अलावा भूमि प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, प्रकाश प्रदूषण आदि से पर्यावरण को होने वाले नुकसान पर भी कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। अपरिग्रह व्रत का तो खुलेआम और बेशर्मी से मज़ाक बनाया जाता है।

गैर-ज़रूरी मूर्तियों और मंदिरों का निर्माण बहुत ज़्यादा हो गया है। एक ओर, जैन आबादी कम हो रही है, जैन धर्म को मानने वालों की संख्या भी घट रही है; वहीं दूसरी ओर जैन मंदिरों और मूर्तियों की गिनती दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। भारत में बीस हज़ार से ज़्यादा जैन मंदिर हैं, जिनमें मूर्तियों की कुल संख्या जैन आबादी से ज़्यादा है। ध्यान रहे, अनावश्यक मंदिर और मूर्ति निर्माण में भी हिंसा होती है। समाज का पैसा व्यर्थ के कामों में बर्बाद हो रहा है।

हाल ही में, जैसलमेर में 6 से 8 मार्च 2026 तक एक बड़ा ‘चादर महोत्सव’ आयोजित किया गया। इसकी विस्तृत जानकारी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर खूब साझा की गई। जैसलमेर में चादर महोत्सव के अंतर्गत निकाले गए जुलूस (वरघोड़ा) में सम्मिलित लोगों और सामग्री की सूची नीचे दी गई है। इसे देखकर यह भ्रम हो गया कि यह एक धार्मिक कार्यक्रम है या एक चलती-फिरती सांस्कृतिक प्रदर्शनी।इस शोभायात्रा में सम्मिलित पशु, ढोल, नगाड़े, बैंड, नर्तक, फ्लोट्स और ड्रोन प्रदर्शन आदि सभी थे। उनका विवरण निम्न प्रकार है —

पशु

▪ 21 घोड़े
▪ 21 ऊँट
▪ 2 हाथी

ढोल, नगाड़े और संगीत बैंड

▪ 10 शंख वादक
▪ 10 बठिंडा बैंड
▪ 25 नासिक ढोल वादक
▪ 4 तुरही वादक
▪ 5 शहनाई वादक
▪ 15 पंजाबी ढोल वादक
▪ 15 खनकवाड़ी ढोल बजाने वाले
▪ देसी ढोल बजाने वाले
▪ 15 बाबू बैंड, 108 बेड़ा टीम
▪ 6 नगाड़े
▪ राजेंद्र बैंड

नर्तक

▪ 4 कच्छी घोड़ी नर्तकियाँ
▪ 10 गेर नृत्य मंडलियाँ
▪ 10 कालबेलिया नर्तक
▪ 8 कथकली मंडलियाँ
▪ 30 लुधियाना भांगड़ा मंडलियाँ
▪ 32 लंगा नर्तक

फ्लोट्स और ड्रोन शो

▪ 6 कठपुतली शो
▪ 2 पुष्प ड्रोन
▪ 4 राजवाड़ी झाँकियाँ
▪ 2 देव विमान
▪ विशेष रथ, दादा गाड़ियाँ
▪ 10 एयर कार्टून
▪ 3 विंटेज कारें
▪ 8 काठियावाड़ी मंडलियाँ
▪ फ्रेम के साथ चादर महोत्सव के झंडे ले जा रही एटीवी बाइक
▪ 41 शासन ध्वज
▪ 700 साफा धारक

वाह! यह 21वीं सदी का चादर महोत्सव है। यह धार्मिक शोभायात्रा कम और रिपब्लिक डे परेड ज़्यादा लगती है। इतने सारे घोड़े, हाथी और ऊँट तो गणतंत्र दिवस परेड में भी नहीं होते हैं। यह इन पाँच इंद्रियों वाले बेबस जानवरों के लिए बहुत बड़ा टॉर्चर है, जिन्हें अत्यधिक डेसिबल शोर सहना पड़ता है; वैसे तो यह जानवरों और इंसानों दोनों के लिए ही टॉर्चर है। कई बार अधिक आवाज़ से हाथी विचलित हो जाते हैं और सड़कों पर उत्पात मचाते हैं। फिर उन्हें कंट्रोल में लाने के लिए त्रिशूल चुभाया जाता है।

जयपुर के हमारे एक एनिमल एक्टिविस्ट मित्र, जस्टिस देवेंद्र मोहन माथुर जी ने हमें बताया कि प्रायः इन सभी जानवरों के साथ बुरा व्यवहार किया जाता है। उन्हें पूरे दिन पूरा भोजन नहीं दिया जाता ताकि वे ऐसे जुलूस में नियंत्रण में रहें और आसानी से हिस्सा ले सकें। घोड़ों को सुंदर दिखाने के लिए उन्हें ऑयल पेंट से रंग दिया जाता है। यही ऑयल पेंट उनकी त्वचा में खिंचाव पैदा करता है, जिससे उन्हें बहुत दर्द होता है।

जब भक्ति के नाम पर इतने सारे ब्रास बैंड, ड्रम बजाने वालों की कई टोलियाँ, भांगड़ा ग्रुप, कालबेलिया डांसर, कथकली कलाकार, एटीवी बाइक और विंटेज कारें हों, तो सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि हम अहिंसा और अपरिग्रह का लक्ष्य पाने जा रहे हैं या गलत तरीके से कमाए गए धन को दिखाने वाले किसी मेले में जा रहे हैं। वस्तुतः यह काले धन का नंगा प्रदर्शन है।

कोई भी समझदार जैन व्यक्ति, जिसके पास मात्र मेहनत से कमाया हुआ धन है, वह ऐसी फ़िजूलखर्ची नहीं कर सकेगा। 700 पगड़ियों की सजावट से यह साफ़ पता चलता है कि यह नज़ारा सच्ची श्रद्धा से कम और सिर्फ़ दिखावे या सजावट से ज़्यादा जुड़ा है। 108 वॉलंटियर्स की टीम — बेड़ा टीम और 41 से ज़्यादा झंडे, इस बात का पर्याप्त सबूत हैं कि आस्था अब सिर्फ़ नंबरों और दिखावे से मापी जा रही है; जितनी ज़्यादा संख्या, उतनी ज़्यादा भक्ति! इस प्रकार के प्रदर्शन गरीब और अन्य समाज के लोगों में ईर्ष्या का भाव पैदा करते हैं। कुछ वर्षों पहले राजस्थान के अनूप मंडल से हुए विवाद को हम देख चुके हैं।

ढोल-नगाड़ों आदि की गूँज से युक्त यह इवेंट कई परेशान करने वाले सवाल पैदा करता है और हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या सादगी स्वयं शर्मसार होने लगी है? क्योंकि धर्म का अर्थ तो सादगी, त्याग और मन की शांति है। मन में यह प्रश्न भी उठता है कि क्या हम चुपचाप घर में बैठे रहें, या बाहर निकलकर जुलूस में शामिल हो जाएँ। लेकिन एक पल रुककर सोचो — क्या आस्था की असली ऊँचाई हाथियों के कद से मापी जाती है, या दिल की विनम्रता से? समारोह में सम्मिलित होने पर क्या हमें हिंसा और परिग्रह की अनुमोदना का पाप नहीं लगेगा?

कुछ विचार करने का समय

• एक सादे और आध्यात्मिक समारोह की आड़ में यह ड्रामा एक तमाशा बन गया। अगर इस पर रोक नहीं लगाई गई, तो यह तेज़ी से बढ़ेगा।
• क्या किसी की अंतरात्मा को कोई चिंता हुई, या बस जैन धर्म के पतन का आनंद लिया गया?
• “अहिंसा परमोधर्मः” और “प्रधानम् सर्व धर्माणाम्, जैनम् जयति शासनम्” जैसे आदर्श वाक्य कहाँ हैं?
• चतुर्विध संघ का क्या हुआ और आम लोगों तथा भिक्षुओं पर चेक और बैलेंस की क्या भूमिका थी?
• क्या हम सभी को इसकी कड़ी निंदा नहीं करनी चाहिए और इन तथाकथित अहंकारी साधुओं को संदेश नहीं देना चाहिए कि उनके इस व्यवहार से खुलेआम अहिंसा, अचौर्य और अपरिग्रह के महाव्रतों की अवहेलना हो रही है?
• यह व्यवहार समाज में एक कैंसर है और इसके लिए बड़ी सर्जरी की ज़रूरत है। हमें आज ही एक्शन लेना होगा, इसे कल के लिए नहीं छोड़ा जा सकता, नहीं तो यह जैन धर्म के लिए घातक नासूर बन जाएगा।

जैन धर्म का भविष्य उसके मूल मूल्यों के प्रति हमारी निष्ठा पर निर्भर करता है। उत्सव तभी सार्थक होते हैं, जब वे भौतिक प्रदर्शन के बजाय आध्यात्मिक विकास को प्रेरित करते हैं। आइए, हम सादगी, करुणा और आत्म-संयम जैसे जैन धर्म के शाश्वत आदर्शों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनः दोहराएँ और यह सुनिश्चित करें कि हमारी भक्ति का आकलन उसकी भव्यता से नहीं, बल्कि हृदय की पवित्रता से किया जाए।

डॉ. अनिल कुमार जैन, जयपुर 
डॉ. सुलेख सी. जैन, (USA)

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